कीवी की खेती से आत्मनिर्भरता की मिसाल बने सगत सिंह मेहरा

कीवी की खेती से आत्मनिर्भरता की मिसाल बने सगत सिंह मेहरा

बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति की सोच और साहस से होती है। उम्र या परिस्थितियां कभी भी सपनों के रास्ते में दीवार नहीं बन सकतीं। उनकी कहानी उत्तराखंड के युवाओं को यह समझाती है कि केवल नौकरी ही जीवन का लक्ष्य नहीं है, बल्कि कृषि, उद्यमिता और नवाचार भी सम्मानजनक और स्थायी विकल्प हो सकते हैं।

उत्तराखंड के 90 वर्षीय किसान सगत सिंह मेहरा, जिन्हें आज पूरे देश में “कीवी मैन” के नाम से जाना जाता है, इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि सोच में बदलाव और निरंतर मेहनत से पहाड़ों की खेती भी लाभ का साधन बन सकती है। जब लोग कीवी जैसे विदेशी फल को अपनाने से हिचकिचाते थे, तब उन्होंने साहस दिखाया और इसकी खेती की शुरुआत की। विषम जलवायु, सीमित संसाधनों और शुरुआती असफलताओं के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं छोड़ी।

आज उनकी मेहनत रंग लाई है। उनकी कीवी खेती न केवल आर्थिक रूप से सफल हुई है, बल्कि सैकड़ों किसानों के लिए प्रेरणा भी बनी है। उन्होंने अनेक किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने की दिशा दिखाई है और पहाड़ी क्षेत्रों में वैकल्पिक कृषि की नई राह खोली है।

वर्तमान में उनकी नर्सरी में लगभग 6,000 ग्राफ्टेड तथा 15,000 बीज से तैयार कीवी के पौधे उपलब्ध हैं। ये पौधे नागालैंड, मणिपुर, सिक्किम और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ नेपाल तक भेजे जा रहे हैं। वे बताते हैं कि पहले जहां कीवी की मांग सीमित थी, वहीं आज इसके स्वास्थ्य लाभों के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इसकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ रही है।

सगत सिंह मेहरा का जीवन यह संदेश देता है कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति की सोच और साहस से होती है। उम्र या परिस्थितियां कभी भी सपनों के रास्ते में दीवार नहीं बन सकतीं। उनकी कहानी उत्तराखंड के युवाओं को यह समझाती है कि केवल नौकरी ही जीवन का लक्ष्य नहीं है, बल्कि कृषि, उद्यमिता और नवाचार भी सम्मानजनक और स्थायी विकल्प हो सकते हैं। यह कहानी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा है कि वे आगे बढ़ें, आत्मनिर्भर बनें और नेतृत्व करें।

सगत सिंह मेहरा की यात्रा पहाड़ के युवाओं और महिलाओं दोनों के लिए आशा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। वे वास्तव में आत्मनिर्भर उत्तराखंड और आत्मनिर्भर भारत की सशक्त प्रेरणा हैं।

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