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कारगिल विजय दिवस पर भारतीय सेना के अदम्य साहस व शौर्य को नमन

26 जुलाई को हम हर साल ‘कारगिल विजय दिवस’ के रूप में मनाते हैं। इस दिन भारतीय सेना ने कारगिल की पहाडियों पर कब्जा जमाए पाकिस्तानी आतंकियों के वेश में घुस आए सैनिकों को मार भगाया था। इस युद्ध में भारत के 527 सैनिक अपनी मातृभूमि की रक्षा करते शहीद हुए, 1363 सैनिक घायल हुए। शहीद हुए सैनिकों में 75 सैनिक उत्तराखंड से थे। पाकिस्तान के भी 453 सैनिक मारे गये और 700 के लगभग घायल हुए। इस युद्ध का महत्वपूर्ण कारण बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित घुसपैठियों का ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर घुस आना था। इनका उद्देश्य कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल करना और सियाचिन ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा करना था। दो महीने से भी अधिक समय तक चले इस युद्ध में भारतीय थलसेना व वायुसेना ने ‘लाइन ऑफ कंट्रोल’ पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे घुसपैठियों को मार भगाया था।

कारगिल युद्ध के बारे में प्रथम सूचना मोर्चे पर तैनात सैनिकों को मिली कि कुछ दुर्गम पहाड़ी शिखरों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा कर लिया है। कारगिल का क्षेत्र लगभग 168 किलोमीटर के इलाके में फैला हुआ है और इसका 80 किलोमीटर का इलाका बर्फ से ढका रहता है। मारपोला, विमबाट और चोरबाटला को छोड़कर इस क्षेत्र में सर्दी के दिनों में जवान तैनात नहीं रहते थे। सेना की चौकियों के बीच बड़े-बड़े फासलों का लाभ उठाकर पाकिस्तानी सेना तथाकथित मुजाहिदीनों का भेष धारण करके यहां घुस आयी और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन बर्फ से ढकी हुई चोटियों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। 

दो महीने तक चले साहसिक जवाबी हमलों द्वारा भारतीय सेना ने एक के बाद एक पहाड़ियां पर कब्जा कर लिया। शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि घुसपैठिये कश्मीरी मुजाहिदीन नहीं थे जैसा कि पाकिस्तान बार-बार कह रहा था। वह तो पाकिस्तान की नियमित सेना की नॉर्दन लाइट इन्फेंट्री के जवान थे। पाकिस्तानी सैनिकों की उपस्थिति के ठोस प्रमाण डायरियों, पे बुकों, पत्रों एवं अन्य दस्तावेजों के रूप में उपलब्ध होते गये। इन प्रमाणों से स्पष्ट हो गया कि यह एक सुनियोजित सैन्य आक्रमण था।

कारगिल की बर्फीली चोटियों पर पाकिस्तान की नार्दर्न लाइट इन्फैंटरी की यूनिटों का पता लगने के कुछ महीने पहले, भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लाहौर में मिले थे। जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वार्ता की गर्मजोशी के माहौल का आनंद ले रहे थे। उसी समय पाकिस्तान की सेना ने कारगिल में घुसपैठ करके हमला कर दिया। दरअसल प्रधानमंत्री की लाहौर बस यात्रा का मकसद मई 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद दोनों देशों द्वारा आपसी संबंधों को सामान्य करना था। जब दोनों देशों के प्रधानमंत्री संबंधों को सुधारने के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे थे, तभी पाकिस्तान आर्मी, भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की योजना बना रही थी।

कारगिल की लड़ाई में तोलोलिंग की पहाड़ी पर अत्यंत भीषण युद्धु हुआ। इसकी कई गाथाएं हमने सुनी हैं। इन्हीं में से अदम्य साहस और देश के लिए प्रतिबद्धता की गाथा है 197 फील्ड आर्टिलरी रेजिमेंट की। पुणे में रह रहे रिटायर्ड मेजर जनरल आलोक देब कहते हैं कि उनकी 197 फील्ड आर्टिलरी रेजिमेंट को द्रास सेक्टर में तोलोलिंग की चोटी से घुसपैठियों का कब्जा हटाने में जुटे सैनिकों को तोपखाना का कवर देने के लिए लगाया गया। उस रेजिमेंट के वह कमांडिंग अफसर थे। चोटियां इतनी दुर्गम थी कि तोपखानों को पहुंचाना असंभव सा था। हमारे जवानों ने भारत में बने तोपों के नट-बोल्ट खोलकर उन्हें छोटे हिस्सों में बांटा और कंधों पर ढोकर सीधी चढ़ाई वाले मोर्चे तक ले गए।

मेजर जनरल देब कहते हैं कि भारत में बनी बने स्वदेशी तोपों के मामले में ऐसा करना आसान था। खासकर एक बैट्री यूनिट, जिसमें छह छोटी तोप होती हैं, उन्हें इसी तरह हम ऊंचाइयों पर पहुंचाते रहे। इस तरह हम बंकरों को ध्वस्त करते हुए अधिक से अधिक ऊंचाई पर मोर्चे जमाते रहे। महीने भर बाद दुश्मन के हमले बंद हो चुके थे। उनके आखिरी बंकर भी ध्वस्त हो चुके थे, लेकिन इस बीच आलोक देब के साथ साये की तरह रहने वाले रेडियो आपरेटर बलिदान हो गए। देब कहते हैं कि काफी समय तक साथ रहे साथी की मौत का सदमा बहुत गहरा होता है। कई ऐसे मौके भी आए, जब उन्हें लगा कि परिस्थतियां विकट हो रही हैं। तोलोलिंग विजय की समय-सीमा खिंचती जा रही थी। आखिरकार वह समय भी आया जब यह असंभव सा दिखने वाला लक्ष्य संभव हुआ। पूरे देश ने इसका उत्सव मनाया।

मेजर जनरल देब कहते हैं कि हमारी लड़ाई केवल दुश्मन के हथियारों से ही नहीं थी। हम प्रकृति से भी युद्ध लड़ रहे थे। भयानक सर्दी के बीच जरा सा रास्ता भटकते ही हमारे जवान दुश्मन के निशाने पर आ जाते थे। चट्टानों के दरकने और भूस्खलन का खतरा अलग था। हमारे पास जो नक्शे थे, उन पर जगह-जगह अज्ञात लिखा था, यानी हम नहीं जानते थे कि आगे कहां पर्वत है और कहां खाई। अज्ञात….अनजान…..अंधकार की बाधाओं को पार करते हुए भारतीय सेना ने जिद से जीत हासिल की। कारगिल युद्ध में थल सेना को 4 परमवीर चक्र, 10 महावीर चक्र, 55 वीर चक्र और वायुसेना को 2 वीर चक्र मिले।

जम्मू में 24 जुलाई, 2022 को ’कारगिल विजय दिवस’ के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत एक मजबूत और आत्मविश्वासी राष्ट्र बन चुका है, जो अपने लोगों को बुरी नजर डालने की कोशिश करने वालों से बचाने के लिए पूरी तरह तैयार है। स्वतंत्रता सेनानियों और सशस्त्र बलों के जवानों, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद से राष्ट्र की सेवा में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय गौरव की भावना उनके मूलभूत मूल्य थे, जिन्होंने भारत की एकता और अखंडता की रक्षा की। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का एकमात्र उद्देश्य राष्ट्र के हितों की रक्षा करना है और इसने एक आत्मनिर्भर रक्षा परितंत्र विकसित करने के लिए कई कदम उठाए हैं जो भविष्य के सभी प्रकार के युद्धों से लड़ने के लिए सशस्त्र बलों को स्वदेशी और अत्याधुनिक हथियार और उपकरण उपलब्ध कराता है।

भारत के सामने आई चुनौतियों पर अपने विचार रखते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि 1948, 1962, 1965, 1971 और 1999 के युद्धों के दौरान जब दुश्मनों ने बुरी नजर डालने की कोशिश की, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख का पूरा क्षेत्र मुख्य रणभूमि बन गया था, लेकिन उनके मंसूबों को बहादुर भारतीय सैनिकों ने विफल कर दिया। उन्होंने 1948 में ब्रिगेडियर उस्मान और मेजर सोमनाथ शर्मा के वीरतापूर्ण कार्यों; 1962 में मेजर शैतान सिंह की वीरता; 1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक जीत और कारगिल के वीर कैप्टन विक्रम बत्रा तथा कैप्टन मनोज पांडे का योगदान, जिन्होंने भारत की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी और लोगों, विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणा बने रहे। उन्होंने गलवान घाटी की घटना के दौरान अभूतपूर्व बहादुरी का प्रदर्शन करने वाले और यह सुनिश्चित करने वाले कि भारतीय तिरंगा निरंतर आसमान में ऊंचा फहराता रहे, भारतीय सैनिकों के प्रति भी सम्मान प्रकट किया।

रक्षा मंत्री ने राष्ट्र को यह आश्वासन देते हुए कि सशस्त्र बल भविष्य की सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है – कहा कि 1965 और 1971 के प्रत्यक्ष युद्धों में हार का सामना करने के बाद पाकिस्तान ने छद्म युद्ध का रास्ता अपनाया। दो दशकों से भी अधिक समय से उसने हजारों घाव देने के साथ भारत का खून बहाने की कोशिश की है। लेकिन, बार-बार हमारे बहादुर सैनिकों ने यह साबित किया है कि कोई भी भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को भंग नहीं कर सकता है।

कारगिल विजय दिवस के अवसर पर सीएम पुष्कर सिंह धामी ने भी भारतीय सेना के असदम्य साहस, शौर्य और वीरता को नमन किया और अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध में बड़ी संख्या में उत्तराखंड के सपूतों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुती दी। राज्य सरकार सैनिकों, पूर्व सैनिकों एवं उनके परिजनों के कल्याण के लिये वचनबद्ध है।

सीएम धामी ने कहा कि भारत की सेना ने अपने शौर्य और पराक्रम से हमेशा देश का मान बढ़ाया है। हमें अपने जवानों की वीरता पर गर्व है। भारतीय सेना के अदम्य साहस व शौर्य का लोहा पूरी दुनिया मानती है। भारतीय सेना के वीर जवानों ने कारगिल में विपरीत परिस्थितियों में भी दुश्मन को भागने पर मजबूर किया था। कारगिल युद्ध में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए वीर सैनिकों के बलिदान को राष्ट्र हमेशा याद रखेगा।

Written by
Hill Mail

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