जड़ी बूटियों के जानकार सोनू मर्तोलिया ने हिल-मेल को बताया कि वह सावन के पूरे महीने जंगल में बिताते हैं और वहां पर जड़ी बूटियों को ढूढते रहते हैं। सोनू बताते हैं कि जंगल की ओर जाने से पहले पूजा पाठ किया जाता है और फिर अनेकों जड़ी बूटियों की खोज के लिए कुरीला से तीन दिन का रास्ता तय करने के लिए वह 22 जुलाई 2022 को घर से गांगला के लिए निकले। दूसरे दिन 23 जुलाई को करंगदांग से कुंआखा होते हुए शाम को 5 बजे नासामर्ती पहुंचे और 24 जुलाई को करछीला और आंचरी ताल दुद्यवन सत्याना जगह पर पहुंचे। सोनू बताते हैं कि यहां हमने एक महीना गुजारा, यह जगह पवित्र स्थल है और उत्तराखंड के 33 कुटी देवी देवताओं का निवास भी इन्हीं जगहों पर माना जाता है। उन्होंने बताया कि आंचरी तालाब के बारे में हमारे पूर्वजों का मानना है कि यह अपने आप पर खूबसूरत तालाब है इस तालाब का पानी धरती के अंदर से निकलता है। इस तालाब का नाम आंचरी ताल इसलिए रखा गया क्योंकि यहां आंचरी स्नान करते हैं ऐसा माना गया है। इन जगहों पर कीड़ा जड़ी, कटुकी, गंधरा, शिलाजीत, मासी धूप आदि अन्य कई प्रकार के जड़ी बूटी पाई जाती हैं।

यह पवित्र स्थल चौंदास घाटी नारायण आश्रम से लगभग 50 किमी के बीच की पैदल यात्रा है। यहां पर अनेकों जड़ी बूटियों वाली फूलों की सुंदरता देखने को मिलती है यहां पर रहने के लिए अनेक गुफायें प्रचलित है। जैसे ठांड ओड़ियार, विजय ओडियार, सिद्ध आडियार आदि अन्य कई गुफाएं हैं, यह गुफा इन्हीं नामों से प्रचलित हैं। यहां लोग बकरी चराने, पूजा पाठ करने और जड़ी बूटियों की खोज के लिए आते थे। यहां के आंचरी तालाब को देवी देवताओं का नहाने का कुण्ड माना जाता है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 4200 मीटर के आसपास है। यहां पर गांगला डाक, करंग दांग, बुल्डडांग, सेकुआ खान, नाशामर्ती, करछीला, सागरीमल, आंचरी ताल और दुधवन चेपडु स्थान पड़ते हैं। सोनू मर्तोलिया ने बताया कि इन जगहों में ऊंची आवाजों से बात करना अच्छा नहीं होता है। आज से बारह साल पहले कुछ लोग यहां पर गाना गाते और उधम मचाते हुए हुए देखे गये उसके बाद यह लोग पागल हो गये और इन्हें ऐसी ही स्थिति में घर लाया गया है। यह घटना हमने अपने आंखों से देखी है।

सोनू मर्तोलिया ने बताया कि आंचरी तालाब स्थान के बारे में एक बात कही जाती है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से इस स्थान की पूजा पाठ करता है उसको किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती है और यह सत्य भी है। उन्होंने बताया कि आंचरी तालाब के पास विजय मर्तोलिया (बिजू) पुत्र ख्यूपाल मर्तोलिया ने 20 दिन तक बिना खाये पीये तपस्या की, उनके पास खाना न होने के कारण उन्होंने यहां की जड़ी बूटी खाकर बीस दिन गुजार दिये। इस दौरान उनके पास सुरक्षा के लिए केवल एक चाकू था उन्होंने यहां पर देवी देवताओं की तपस्या की। उन्होंने एक चीमूला की लकड़ी को अपने हाथ से काढ का छोड़ा बनाकर आंचरी तालाब में चढ़ाकर अपनी स्वच्छ मनोकामना से पूजा की। उन्होंने बताया कि यहां पर अनेकों प्रकार की कुदरती धूप पाई जाती है। जैसे गोकुल मासी, जाटा मासी, पमा और मुस्याचियला। इसलिए यहां पर अगरबत्ती की भी जरूरत नहीं पड़ती है।

उत्तराखंड को औषधि प्रदेश, यानी हर्बल स्टेट भी कहा जाता है। यहां पर कई प्रकार की जड़ी बूटियां भी पाई जाती है। जो कि बरसात के मौसम के बाद काफी उग जाती है। इसमें से एक कीड़े जैसी दिखने वाली घास भी होती है और उत्तराखंड के लोग इसे कीड़ा घास कहते हैं। यह घास उत्तराखंड के पिथौरागढ़ एवं चमोली जिले के 3,500 मीटर की ऊंचाई के एल्पाइन बुग्यालों में पाई जाती है। यह औषधि हृदय, यकृत तथा गुर्दे संबंधी बीमारी में इस्तेमाल की जाती हैं। शरीर के जोड़ों में होने वाली सूजन व दर्द, अस्थमा, फेफड़े के रोगों में इसका प्रयोग लाभकारी होता है। इसका प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

बज्रदंती उच्च हिमालयी क्षेत्रों में दो से तीन हजार मीटर के मध्य पाई जाती है। उत्तराखंड में उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ व मुन्स्यारी में ये ज्यादा मात्रा में मिलती है। इस पौधे की जड़ों व पत्ती का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। जड़ का उपयोग मसूड़ों व दांतों के अलावा पेचिस, जलने के घाव भरने व मूत्र रोगों में होता है। उत्तराखंड राज्य में कई ऐसी प्राकृतिक जड़ी बूटियां मौजूद है जिसका अगर सही इस्तेमाल किया जाये तो उससे हमें कई रोगों से मुक्ति मिल सकती है। इन जड़ी बूटियों के खाने से वह हमारे शरीर को रोगों से लड़ने के लिए मजबूत बना देता है।


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