हमारे जीवन में गुरु का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वह हमें शिक्षा देते हैं, हमको सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। ज्ञान वह अमूल्य वस्तु है, जिसे कोई चुरा नहीं सकता। ज्ञान ऐसा कोश है, जिसमें से जितना व्यय करो वह उतना ही बढ़ता जाता है। गुरु ही हमारे जीवन का मार्गदर्शन करता है।
उत्तराखंड के दो शिक्षकों प्रदीप नेगी और कौस्तुभ चंद्र जोशी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शिक्षा मंत्रालय देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों को पुरस्कार प्रदान करने के लिए हर साल पांच सितंबर को विज्ञान भवन में एक समारोह आयोजित करता है।
देश के विभिन्न भागों से इस वर्ष पुरस्कार के लिए 46 शिक्षिकों को शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए चुना गया है। जिनके नाम इस प्रकार से हैं। खुर्शीद अहमद- उत्तर प्रदेश से, प्रदीप नेगी और कौस्तुभ चंद्र जोशी- उत्तराखंड से, सुनीता और दुर्गा राम मुवाल- राजस्थान से, नीरज सक्सेना और ओम प्रकाश पाटीदार- मध्य प्रदेश से, सौरभ सुमन और निशि कुमारी- बिहार से, जी पोंसकरी और उमेश टीपी- कर्नाटक से, माला जिगदल दोरजी और सिद्धार्थ योनज़ोन- सिक्किम से, युद्धवीर, वीरेंद्र कुमार और अमित कुमार- हिमाचल प्रदेश से, हरप्रीत सिंह, अरुण कुमार गर्ग और वंदना शाही- पंजाब से, शशिकांत संभाजीराव कुलठे, सोमनाथ वामन वाके और कविता सांघवी- महाराष्ट्र-से, कंडाला रमैया, टीएन श्रीधर और सुनीता राव- तेलंगाना से, अंजू दहिया- हरियाणा से, रजनी शर्मा- दिल्ली से, सीमा रानी- चंडीगढ़ से, मारिया मुरेना मिरांडा- गोवा से, उमेश भरतभाई वाला- गुजरात से, ममता अहर- छत्तीसगढ़ से, ईश्वर चंद्र नायक- ओडिशा से, बुद्धदेव दत्ता- पश्चिम बंगाल से, जाविद अहमद राथर- जम्मू और कश्मीर से, मोहम्मद जाबिर- लद्दाख से, मिमी योशी- नागालैंड से, नोंगमैथेम गौतम सिंह- मणिपुर से, गमची टिमरे आर मारक- मेघालय से, संतोष नाथ- त्रिपुरा से, मीनाक्षी गोस्वामी- असम से, शिप्रा- झारखंड से, रंजन कुमार विश्वास- अंडमान और निकोबार से, अरविंदराजा- पुदुचेरी से, रामचंद्रन- तमिलनाडु से तथा रवि अरुणा- आंध्र प्रदेश से हैं।
कबीर दास ने गुरु को भगवान से भी ऊंचा स्थान दिया है। वह कहते हैं-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु अपने गोबिन्द दियो बताय।।
अर्थात गुरु और गोविन्द एक साथ खड़े हों तो किसके पैर स्पर्श करने करना चाहिए, गुरु के अथवा गोविन्द के? ऐसी स्थिति में गुरु के चरणों में शीश झुकाना चाहिए, जिनकी कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।


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