जरा सोचिये, अगर किसी नदी का बहता हुआ सारा पानी अचानक बने किसी सिंकहोल यानी बड़े गड्ढे में समाने लगे और किसी को यह भी पता न लगे कि ये पानी कहां जा रहा है। निश्चित तौर पर नदी के आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह दहशत की वजह होगी। कुछ ऐसा ही इन दिनों दक्षिण कश्मीर के कोकरनाग इलाके के साथ हो रहा है। यहां की लाइफलाइन कही जाने वाली ब्रिंगी नदी में अचानक एक बड़ा सिंकहोल हो गया है। आमतौर पर ट्राउट फिश के लिए विख्यात इस नदी का सारा पानी इसी सिंकहोल में जा रहा है।
अभी तक यह पता नहीं लग पाया है कि नदी का पानी कहां जा रहा है। प्रशासन ने लोगों की दहशत को देखते हुए एहतियात के तौर पर इलाके में धारा 144 लगा दी है। इसके साथ ही नदी के पानी का बहाव मोड़ने के लिए जेसीबी भी लगाई गई हैं।
यहां देखें घटना का पूरा वीडियो
इस वीडियो को देखने के बाद मन में कई तरह के सवाल उठते हैं, मसलन सिंकहोल क्या होते हैं? ये कैसे बनते हैं, सिंकहोल का पानी आखिर जाता कहां है या उत्तराखंड में भी क्या इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती है। इन्हीं सब सवालों का जवाब जानने के लिए हमने उत्तराखंड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (यूसेक) के निदेशक और प्रख्यात भू-विज्ञानी प्रो. एमपीएस बिष्ट से बात की। उन्होंने बताया, सिंकहोल मूलतः जमीन के अंदर की चट्टानों में खासतौर पर चूना पत्थर (लाइम स्टोन), गंधक एवं रॉक सॉल्ट (सेंधा नमक) युक्त चट्टानों में पानी का रासायनिक प्रक्रिया द्वारा बने छोटे-छोटे छिद्रनुमा गड्ढे होते हैं, जो बाद में बहुत बड़े गड्ढे का आकार ले लेते हैं। इन्हीं गड्ढों को सिंकहोल कहा जाता है। आगे चलकर ये सिंकहोल जमीन के अंदर गैलरी एडिट सॉफ्ट के माध्यम से बड़ी-बड़ी गुफाओं, कंदराओं के रूप में विकसित हो जाते हैं। जो नदी का भूमिगत मार्ग प्रशस्त करते हैं। सामूहिक रूप से इस तरह की संपूर्ण संरचना को भू-वैज्ञानिक कार्स्टटोपोग्राफ्रिक संरचना कहते हैं।

सवाल – सिंकहोल में जाने का बाद कहां जाता है पानी
ये पानी भूमिगत जल के साथ मिल जाता है और धीरे-धीरे करके निचली घाटियों में आकर जलस्रोत के रूप में बाहरी सतह पर निकल आता है।
सवाल – कितना बड़ा खतरा होता है सिंकहोल
सामान्य तौर पर सिंकहोल की ऊपरी सतह लगातार क्षरण (इरोजन) के कारण काफी कमजोर हो जाती है। इसके कारण सिंकहोल के आसपास के इलाके में भू-धंसाव यानी जमीन धंसने की प्रबल संभावना रहती है। इसका आंकलन जियो फिजिकल सर्वे या ग्राउंड पेनीट्रेटिंग रडार (जीपीआर) के माध्यम से ही किया जा सकता है। उत्तराखंड में इस तरह की घटना अभी तक किसी बड़े रूप में सामने नहीं आई है। जबकि मसूरी, नैनीताल, दुगड्डा क्षेत्र में लाइम स्टोन की प्रचुर मात्रा है।


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