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श्रीदेव सुमन: टिहरी की धरती का अमर क्रांतिकारी, जिसने अत्याचार के आगे नहीं झुकाया सिर

उत्तराखंड की वीरभूमि ने अनेक ऐसे सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने अपने साहस, त्याग और संघर्ष से इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम अमर शहीद श्रीदेव सुमन का है। उनकी जयंती केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष, जनअधिकारों की रक्षा और लोकतंत्र के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान को याद करने का अवसर है।

श्रीदेव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को टिहरी गढ़वाल के जौल गांव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम श्रीदत्त बडोनी था, लेकिन साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय होने के बाद वे “श्रीदेव सुमन” नाम से प्रसिद्ध हुए। बचपन से ही उनमें देशभक्ति और सामाजिक चेतना की भावना गहरी थी। उस समय टिहरी रियासत में राजशाही का शासन था, जहां जनता को मूल अधिकारों से वंचित रखा जाता था। अत्याचार, करों का बोझ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध आम बात थी।

युवावस्था में ही श्रीदेव सुमन स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरणा लेकर अहिंसा और सत्याग्रह का मार्ग अपनाया। वे टिहरी रियासत में जनता के अधिकारों की आवाज बने। उन्होंने “टिहरी राज्य प्रजा मंडल” के माध्यम से लोगों को जागरूक किया और राजशाही के दमन के खिलाफ आंदोलन तेज किया। उनके भाषणों और लेखों ने युवाओं में नई चेतना पैदा की।

श्रीदेव सुमन ने टिहरी रियासत में लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग उठाई। वे चाहते थे कि जनता को बोलने की स्वतंत्रता मिले और शासन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो। लेकिन राजशाही को उनका यह संघर्ष नागवार गुजरा। वर्ष 1943 में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। जेल में उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

जेल में रहते हुए श्रीदेव सुमन ने अन्याय के विरोध में 84 दिनों तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। यह संघर्ष केवल उनके व्यक्तिगत अधिकारों के लिए नहीं था, बल्कि पूरी टिहरी की जनता की आवाज था। आखिरकार 25 जुलाई 1944 को उन्होंने जेल में अंतिम सांस ली। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद भी राजशाही इतनी भयभीत थी कि उनके शव को जनता को सौंपने के बजाय चुपचाप नदी में बहा दिया गया। उनका बलिदान टिहरी राज्य में जनक्रांति की प्रेरणा बना।

आज भी उत्तराखंड के गांव-गांव में श्रीदेव सुमन को स्वतंत्रता, साहस और जनसंघर्ष के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनकी जयंती पर विभिन्न स्थानों पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम, विचार गोष्ठियां और सांस्कृतिक आयोजन किए जाते हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में युवाओं को उनके संघर्ष और विचारों से परिचित कराया जाता है।

श्रीदेव सुमन का जीवन हमें यह संदेश देता है कि अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना ही सच्ची देशभक्ति है। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर यह साबित कर दिया कि सत्य और अधिकारों की लड़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती। आज जब लोकतंत्र और संविधान की बात होती है, तब श्रीदेव सुमन जैसे बलिदानियों का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ियों के लिए श्रीदेव सुमन केवल इतिहास का एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और बलिदान की जीवित प्रेरणा हैं।

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Hill Mail

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