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5000 किलोमीटर तक की उड़ान भरकर उत्तराखंड पहुंचे सुर्खाब, कोसी बैराज और हाथीडगर जलाशय में बढ़ी रौनक

उत्तराखंड में सर्दियों की दस्तक के साथ ही विदेशी प्रवासी पक्षियों का आगमन शुरू हो गया है। नैनीताल जिले के रामनगर स्थित कोसी बैराज और हाथीडगर जलाशय में बर्फीले देशों से सुर्खाब पक्षियों के जोड़े पहुंचने लगे हैं। हर साल सर्दियों के मौसम में हजारों किलोमीटर की लंबी और चुनौतीपूर्ण यात्रा कर यहां आने वाले इन खूबसूरत पक्षियों की मौजूदगी से जलाशयों की रौनक बढ़ गई है। वन्यजीवों और प्राकृतिक जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध रामनगर अब इन प्रवासी पक्षियों का भी पसंदीदा ठिकाना बन रहा है।

 

बर्फीले देशों में ठंड बढ़ने पर करते हैं पलायन

सुर्खाब पक्षी मुख्य रूप से तिब्बत, लद्दाख, रूस के साइबेरिया, ईरान के कैस्पियन क्षेत्र, मंगोलिया और नेपाल के बर्फीले पहाड़ी इलाकों से भारत पहुंचते हैं। सर्दियों के दौरान इन क्षेत्रों में तापमान काफी नीचे चला जाता है। कई स्थानों पर तापमान शून्य से 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे पहुंच जाता है। इससे नदियों, झीलों और जलाशयों का पानी जमकर बर्फ में तब्दील हो जाता है।

पानी जमने के कारण इन पक्षियों को भोजन के लिए जरूरी मछलियां और अन्य जलीय जीव आसानी से नहीं मिल पाते। इसके अलावा अत्यधिक ठंड में इनके प्रजनन की परिस्थितियां भी अनुकूल नहीं रहतीं। अंडों को सेने के लिए अपेक्षाकृत गर्म तापमान की आवश्यकता होती है। ऐसे में ये पक्षी सर्दियों के दौरान भारत के गर्म क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं।

नवंबर से मार्च तक रहता है प्रवास

ये प्रवासी पक्षी अक्टूबर और नवंबर के दौरान भारत के अलग-अलग जलाशयों में पहुंचने लगते हैं। मार्च के बाद मौसम अनुकूल होने पर इनकी अपने मूल क्षेत्रों की ओर वापसी शुरू हो जाती है। इनकी प्रवास यात्रा की दूरी लगभग एक हजार से पांच हजार किलोमीटर तक हो सकती है।

पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार रामनगर के कोसी बैराज और हाथीडगर क्षेत्र में सुर्खाब सामान्य समय से करीब 15 दिन पहले पहुंच गए हैं। वर्ष 2024 में कोसी बैराज में इनकी संख्या 422 दर्ज की गई थी, जबकि वर्ष 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 486 पहुंच गया था।

22 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर भरते हैं उड़ान

सुर्खाब पक्षियों की भारत तक की यात्रा बेहद चुनौतीपूर्ण होती है। लंबी दूरी तय करते समय ये लगातार उड़ान नहीं भरते, बल्कि रास्ते में झीलों और जलाशयों पर रुककर आराम करते हैं और भोजन जुटाते हैं। ये समुद्र तल से 22 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर भी उड़ान भरने में सक्षम होते हैं।

चार हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन का स्तर काफी कम हो जाता है। ऐसे में लगातार उड़ान भरना इनके फेफड़ों और मांसपेशियों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। रास्ते में इन्हें तेज हवाओं और बर्फीले तूफानों का भी सामना करना पड़ता है।

जलाशयों का संरक्षण जरूरी

पक्षी विशेषज्ञ महेंद्र पवार के अनुसार, जलाशयों में पानी की कमी, खेती में कीटनाशकों और रसायनों का इस्तेमाल प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक आवास और भोजन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

वहीं, रामनगर वन प्रभाग के उप प्रभागीय वनाधिकारी अंकित बडोला ने बताया कि सुर्खाब का पहुंचना क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र के लिए अच्छा संकेत है। उन्होंने कहा कि पक्षियों को शिकार से बचाने के लिए वन कर्मियों को नियमित गश्त और निगरानी के निर्देश दिए जाएंगे। उन्होंने बताया कि इन पक्षियों को दिशाओं का बेहतर ज्ञान होता है और ये सामान्यतः अपना रास्ता नहीं भटकते।

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