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माउंट एवरेस्ट… दुनिया का सबसे ऊंचा शिखर। इस चोटी को छूने की आस लेकर सैकड़ों पर्वतारोही हर साल इस जोखिम भरे अभियान पर निकलते हैं। इनमें से कुछ ही सफलता हासिल कर पाते हैं। लेकिन दो नाम ऐसे भी हैं, जिन्होंने भले ही एवरेस्ट के शिखर को न छुआ हो लेकिन दोनों ही पर्वतारोहण की दुनिया के शिखर पुरुषों से कम नहीं हैं। ये कहानी है बहुगुणा ब्रदर्स की। एक को पर्वतारोहण के लिए अर्जुन पुरूस्कार और पद्मश्री मिला और दूसरे को कीर्ति चक्र, सेना मेडल और दो बार विशिष्ट सेवा मेडल। दोनों पहली बार में एवरेस्ट के बेहद करीब पहुंचे और दूसरी बार के अभियान में जान गंवा दी। वो भी एक ही जगह…लेकिन 14 साल के अंतराल पर। ये कहानी है मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा और मेजर जयवर्धन बहुगुणा की।
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माउंट एवरेस्ट… दुनिया का सबसे ऊंचा शिखर। इस चोटी को छूने की आस लेकर सैकड़ों पर्वतारोही हर साल इस जोखिम भरे अभियान पर निकलते हैं। इनमें से कुछ ही सफलता हासिल कर पाते हैं। लेकिन दो नाम ऐसे भी हैं, जिन्होंने भले ही एवरेस्ट के शिखर को न छुआ हो लेकिन दोनों ही पर्वतारोहण की दुनिया के शिखर पुरुषों से कम नहीं हैं। ये कहानी है बहुगुणा ब्रदर्स की। एक को पर्वतारोहण के लिए अर्जुन पुरूस्कार और पद्मश्री मिला और दूसरे को कीर्ति चक्र, सेना मेडल और दो बार विशिष्ट सेवा मेडल। दोनों पहली बार में एवरेस्ट के बेहद करीब पहुंचे और दूसरी बार के अभियान में जान गंवा दी। वो भी एक ही जगह…लेकिन 14 साल के अंतराल पर। ये कहानी है मेजर हर्षवर्धन बहुगुणा और मेजर जयवर्धन बहुगुणा की।
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