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पहाड़ की नन्ही मुस्कान, लोक संस्कृति की नई पहचान

गढ़वाल और कुमाऊँ में होली का उल्लास अपने चरम पर पहुँच चुका है। वास्तविक होली से एक दिन पहले ही पहाड़ के गाँवों में उत्सव का रंग साफ दिखाई दे रहा है। शाम ढलते ही चौपालों और मंदिर प्रांगणों में लोग एकत्रित हो रहे हैं और बैठक होली की मधुर स्वर लहरियाँ गूंज रही हैं। ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम की संगत में पारंपरिक होली गीत गाए जा रहे हैं।

पौड़ी गढ़वाल के छोटे से गांव से उठी लोक संस्कृति की आवाज

उत्तराखंड के पहाड़ों में अक्सर कहा जाता है कि यहां की असली पहचान उसकी लोक संस्कृति, बोली और परंपराएं हैं। लेकिन बदलते समय और बढ़ती भौतिकवादी जीवनशैली के बीच यह भी सच है कि पहाड़ की कई परंपराएं धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं। ऐसे समय में जब लोग अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, वहीं एक छोटी सी बेटी अपनी प्रतिभा से पहाड़ की संस्कृति को नई पहचान दे रही है।

यह नन्ही कलाकार पौड़ी गढ़वाल जिले के राठ क्षेत्र के बडेथ गांव से ताल्लुक रखती है। उसका परिवार पैठानी सुपर मार्केट क्षेत्र से जुड़ा है। पहाड़ के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ी यह बच्ची आज अपनी कला और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण के कारण लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है।

बचपन से संस्कृति के रंग

कहा जाता है कि पहाड़ में बच्चों की पहली पाठशाला उनका घर और गांव होता है। लोक गीत, पारंपरिक वेशभूषा, त्योहार और मेलों के बीच पलने वाले बच्चे इन्हीं रंगों से अपनी पहचान बनाते हैं।

इस बेटी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बचपन से ही उसे पहाड़ी लोक गीतों, पारंपरिक नृत्य और अपनी संस्कृति के प्रति गहरा लगाव रहा। जब भी उसे मौका मिलता, वह लोक गीतों पर नृत्य करती या अपनी भाषा और परंपराओं को मंच के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करती।

धीरे-धीरे उसकी प्रतिभा लोगों के सामने आने लगी। गांव से शुरू हुई यह पहचान अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई है।

लोक संस्कृति की नई पहचान

आज जब सोशल मीडिया और आधुनिक मनोरंजन के बीच पारंपरिक कला को जगह बनाना कठिन हो गया है, तब यह छोटी कलाकार पहाड़ की संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रही है।

पारंपरिक पोशाक पहनकर लोक गीतों और नृत्यों को प्रस्तुत करने वाली यह बेटी लोगों को यह याद दिला रही है कि पहाड़ की असली खूबसूरती उसकी संस्कृति में है।

स्थानीय लोग भी उसकी इस कोशिश की सराहना कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह बच्ची न केवल अपनी प्रतिभा दिखा रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है।

प्रेरणा बनती एक छोटी कलाकार

गांव और आसपास के क्षेत्रों में लोग इस बेटी को गर्व के साथ देखते हैं। कई लोग कहते हैं कि बड़े-बड़े सेलिब्रिटी भी इससे सीख सकते हैं कि लोकप्रियता केवल आधुनिक दिखावे से नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति से जुड़कर भी हासिल की जा सकती है।

दरअसल, आज के समय में मनोरंजन की दुनिया में अक्सर ऐसा कंटेंट ज्यादा दिखाई देता है जो परंपराओं से दूर होता जा रहा है। लेकिन यह छोटी कलाकार साबित कर रही है कि लोक संस्कृति भी लोकप्रियता का मजबूत आधार बन सकती है।

आज कई लोग उसे उत्तराखंड की एक उभरती हुई छोटी “सेलिब्रिटी” के रूप में देखने लगे हैं — ऐसी सेलिब्रिटी जो अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है।

संरक्षण की जरूरत

यह कहानी केवल एक प्रतिभाशाली बच्ची की नहीं है। यह उस बड़ी चिंता को भी सामने लाती है, जो आज पहाड़ की लोक संस्कृति को लेकर महसूस की जा रही है।

तेजी से बदलती जीवनशैली और आधुनिकता के कारण कई पारंपरिक कलाएं, लोक गीत और लोक नृत्य धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। कई बुजुर्गों का मानना है कि अगर इन्हें समय रहते संरक्षण नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां इनसे पूरी तरह अनजान हो सकती हैं।

इसीलिए स्थानीय लोग यह सुझाव भी दे रहे हैं कि ऐसे बच्चों को राज्य, जिला और ग्रामीण स्तर पर सम्मानित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। अगर उन्हें आर्थिक सहायता और मंच मिलें, तो वे अपनी प्रतिभा को और आगे ले जा सकते हैं।

भविष्य की उम्मीद

यह नन्ही बेटी आज पहाड़ की उस उम्मीद का प्रतीक बन गई है, जो अपनी संस्कृति को जीवित रखना चाहती है। उसकी मेहनत और लगन यह दिखाती है कि अगर नई पीढ़ी अपनी परंपराओं से जुड़ जाए, तो लोक संस्कृति कभी खत्म नहीं होगी।

उत्तराखंड के पहाड़ों से उठी यह छोटी आवाज शायद पूरे समाज को यह याद दिला रही है। अपनी जड़ों से जुड़कर भी चमका जा सकता है, और अपनी संस्कृति को बचाना भी एक बड़ी जिम्मेदारी है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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