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फूलदेई के दिन सुबह-सुबह छोटे-छोटे बच्चे अपनी रिंगाल की टोकरियों में बुरांश और फ्योंलि के फूल रख कर घर-घर जाते हैं। सबके दरवाजे पर फूल चढ़ाकर फूलदेई के गीत गाते हैं। फूलदेई छम्मा देई और लोग उन्हें बदले में चावल, गुड़ और पैसे देते हैं। देवताओं का स्वरूप बच्चे सभी की देहरी में फूल डाल कर समृद्धि की कामना करते हैं।
READ MOREजन मान्यताओं के अनुसार इस दिन गांव के हर व्यक्ति को एक पौधा अवश्य लगाना होता है। जब हरेला पौधों को किसी के शीश पर रखा जाता है तो इस दौरान एक सुंदर से आशीर्वचन के रूप में कुमाऊंनी बोली की कुछ पंक्तियां कही जाती हैं…।
READ MOREलॉकडाउन से रीचार्ज हो गई प्रकृति, लॉकडाउन का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कई किलोमीटर दूर से पहाड़ों के मनोरम दृश्य एक नई दुनिया का आभास करा रहे हैं। ऐसा लग रहा जैसे प्रकृति रीचार्ज हो गई है।
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फूलदेई के दिन सुबह-सुबह छोटे-छोटे बच्चे अपनी रिंगाल की टोकरियों में बुरांश और फ्योंलि के फूल रख कर घर-घर जाते हैं। सबके दरवाजे पर फूल चढ़ाकर फूलदेई के गीत गाते हैं। फूलदेई छम्मा देई और लोग उन्हें बदले में चावल, गुड़ और पैसे देते हैं। देवताओं का स्वरूप बच्चे सभी की देहरी में फूल डाल कर समृद्धि की कामना करते हैं।
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जन मान्यताओं के अनुसार इस दिन गांव के हर व्यक्ति को एक पौधा अवश्य लगाना होता है। जब हरेला पौधों को किसी के शीश पर रखा जाता है तो इस दौरान एक सुंदर से आशीर्वचन के रूप में कुमाऊंनी बोली की कुछ पंक्तियां कही जाती हैं…।
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