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देवभूमि उत्तराखंड का दिव्य पंचम धाम: नागों में ‘अनंत’ भगवान श्री नागराजा का इतिहास, मान्यता और रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कहा गया—“मैं नागों में अनंत हूं”—और इसी दिव्य स्वरूप की पूजा उत्तराखंड में हजारों वर्षों से होती आ रही है। द्वापर युग से जुड़े सेम मुखेम के नागराजा मंदिर को देवभूमि का “पांचवां धाम” माना जाता है। कालिया नाग की कथा, नागवंश का इतिहास और नागराजा की डोली परंपरा आज भी इस भूमि की आस्था और संस्कृति की पहचान है।

“मैं नागों में अनंत (शेष नाग) हूं।” — श्रीकृष्ण
भक्तों को दिव्यता का यह संदेश देते हुए भगवान स्वयं बताते हैं कि नागराजा कोई साधारण देव नहीं, बल्कि उनके ही एक अनंत स्वरूप हैं। देवभूमि उत्तराखंड को यूं ही दिव्य नहीं कहा जाता। यहां हर पर्वत, हर नदी, हर पत्थर में ईश्वर का वास माना जाता है। ऐसी ही अपार आस्था से जुड़ा है — भगवान श्री नागराजा, जिन्हें उत्तराखंड में श्रीकृष्ण के ही रूप में पूजा जाता है। पुराणों के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने कालिया नाग का दमन किया, तब कालिया नाग उनकी भक्ति में लीन हो गए। श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में एक ऐसी भूमि होगी जहां उनकी पूजा के साथ कालिया नाग की भी पूजा होगी — और वह भूमि है उत्तराखंड। इसी कारण देवभूमि के लगभग हर गांव में नागराजा की देव डोली की परंपरा आज भी कायम है। इन डोलियों के भीतर भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति विराजती है, जो बताती है कि नागराजा वास्तव में श्रीकृष्ण का ही दिव्य रूप हैं।

 

नागवंश: भारत की प्राचीन शक्ति

इतिहास में नागवंश अत्यंत शक्तिशाली माने गए। एक समय भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित विस्तृत क्षेत्र पर नाग राजाओं का शासन था। तक्षक, तनक, तुश्त जैसे प्रमुख नागवंशी राजाओं ने भारत के बाहर तक अपनी विजय पताकाएं फहराईं। कुषाणों के पतन के बाद नागवंशियों का उदय हुआ और उन्होंने गंगा घाटी को मुक्त करवाया। किंतु जब वे अत्याचारी बने, तो देवभूमि के लोगों ने नागराजा की डोलियां बनाकर अपने गांवों की रक्षा की। उनकी आस्था देखकर नागवंशी लौट जाते थे — और यह परंपरा आज भी जीवित है।

उत्तराखंड का पांचवां धाम: सेम मुखेम नागराजा मंदिर

चार धाम — यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ — के साथ, उत्तराखंड में एक और पौराणिक धाम है, जिसे “पांचवां धाम” कहा जाता है — श्री सेम मुखेम नागराजा मंदिर। द्वापर युग की कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण सेम मुखेम आए और राजा गंगू रमोला से भूमि मांगी। राजा के इनकार से नाराज़ होकर उन्होंने रमोला की गायों को पत्थर बना दिया। रानी के क्षमा मांगने पर कृष्ण प्रसन्न हुए और नागराजा के रूप में वहीं निवास करने का निर्णय लिया। आज भी मंदिर के आसपास पत्थर की सैकड़ों शिलाएं इस कथा का प्रतीक हैं। हर तीसरे वर्ष यहां भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों भक्त शामिल होते हैं। लंबे समय से सेम मुखेम को आधिकारिक रूप से “उत्तराखंड का पांचवां धाम” घोषित करने की मांग चल रही है।

भगवान श्री नागराजा की पूजा केवल आस्था नहीं, बल्कि उत्तराखंड की प्राचीन संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक धरोहर का सजीव रूप है।
और जैसा श्रीकृष्ण ने कहा—
“मैं नागों में अनंत हूं।”
देवभूमि उत्तराखंड आज भी इस वचन को अपने हृदय में संजोए हुए है।

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Hill Mail

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