पिथौरागढ़ से सहयोगी देवेंद्र सिंह मर्तोलिया ने शिलाजीत तैयार किए जाने की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी साझा की है। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों से निकलने वाले गाढ़े पदार्थ को एकत्र करने के बाद इसे सीधे उपयोग में नहीं लाया जाता। इसे कई चरणों से गुजारकर साफ और संसाधित किया जाता है, ताकि अशुद्धियों को अलग किया जा सके और उपयोग योग्य उत्पाद तैयार हो सके।
शिलाजीत को सामान्य तौर पर पहाड़ी चट्टानों और खनिजयुक्त क्षेत्रों से प्राप्त प्राकृतिक पदार्थ के रूप में जाना जाता है। गर्मियों के दौरान ऊंचाई वाले क्षेत्रों में चट्टानों से निकलने वाले इस पदार्थ को पारंपरिक रूप से एकत्र किया जाता है। इसके बाद इसे छानने, साफ करने और शुद्ध करने जैसी प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है। शुद्धिकरण की प्रक्रिया में गुणवत्ता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है।
आयुर्वेदिक परंपरा में शिलाजीत का उपयोग शरीर में ऊर्जा और ताकत से जुड़े विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। इसमें फुल्विक एसिड सहित कई जैव सक्रिय घटक पाए जाते हैं। इसके एंटीऑक्सीडेंट गुणों को लेकर भी चर्चा होती है। आम तौर पर इसे थकान कम करने, ऊर्जा बढ़ाने और शारीरिक क्षमता को बेहतर बनाए रखने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इसके स्वास्थ्य लाभों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण सीमित और मिश्रित हैं, इसलिए इसका सेवन विशेषज्ञ की सलाह से ही किया जाना उचित है।
पिथौरागढ़ जैसे सीमांत और पर्वतीय जिले में शिलाजीत से जुड़ी गतिविधियां स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की संभावनाओं के बीच ऐसे प्राकृतिक उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, शिलाजीत के संग्रहण में पर्यावरणीय संतुलन और निर्धारित नियमों का पालन बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार बाजार में उपलब्ध शिलाजीत की गुणवत्ता अलग-अलग हो सकती है। इसलिए उपभोक्ताओं को बिना जांचे-परखे उत्पाद खरीदने से बचना चाहिए। शुद्धता, स्रोत और प्रसंस्करण की जानकारी के साथ विश्वसनीय उत्पाद का चयन करना महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक या आयुर्वेदिक होने का दावा अपने आप में किसी उत्पाद को सुरक्षित या प्रभावी साबित नहीं करता।
पिथौरागढ़ के पहाड़ों से सामने आई शिलाजीत तैयार करने की प्रक्रिया इस बात को रेखांकित करती है कि उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान में रोजगार तथा स्थानीय उत्पादों के विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। जरूरत है कि इन संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण, परीक्षण और उपयोग किया जाए, ताकि प्रकृति और स्थानीय आजीविका दोनों के हित सुरक्षित रह सकें।


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