पहले माल्टा के प्रसंस्करण के बाद बचने वाले छिलकों को अनुपयोगी मानकर फेंक दिया जाता था। इससे कचरा बढ़ने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन भी व्यर्थ चला जाता था। लेकिन अब इन्हीं छिलकों को ‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल के तहत मूल्यवान उत्पादों में बदला जा रहा है। इस पहल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का काम किया है।
जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया के निर्देशन में उमंग स्वायत्त सहकारिता द्वारा संचालित बेडू एवं फल प्रसंस्करण इकाई में ग्रामीण महिलाएं माल्टा पील फेस पैक, फेस स्क्रब और हर्बल उबटन जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों को बनाने में माल्टा के छिलकों के साथ मुल्तानी मिट्टी, चंदन, गुलाब पाउडर, हल्दी, बेसन और नीम जैसे प्राकृतिक तत्वों का उपयोग किया जाता है। पूरी तरह हर्बल और केमिकल-फ्री होने के कारण इन उत्पादों की बाजार में मांग भी लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि माल्टा के छिलकों में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और त्वचा को पोषण देने वाले तत्व मौजूद होते हैं, जो त्वचा की देखभाल के लिए बेहद लाभकारी हैं। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर तैयार किए जा रहे ये उत्पाद लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। प्राकृतिक उत्पादों की बढ़ती मांग के बीच यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रही है।
ग्रामोत्थान परियोजना के तकनीकी मार्गदर्शन में संचालित इस प्रयास ने कई महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। जो महिलाएं पहले केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं, वे अब उत्पाद निर्माण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन जैसे कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है।
ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि इस पहल ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनने का अवसर दिया है। अब वे अपने परिवार की आय में योगदान देने के साथ-साथ स्वयं की पहचान भी बना रही हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होने से गांवों से पलायन की समस्या को कम करने में भी मदद मिल रही है।
यह पहल केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। जिन छिलकों को पहले कचरा समझकर फेंक दिया जाता था, वे अब मूल्यवान उत्पादों के रूप में बाजार तक पहुंच रहे हैं। इससे अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या कम होने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो रहा है।
पौड़ी की यह पहल आज उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय जिलों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। स्थानीय संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग और महिलाओं की भागीदारी से ग्रामीण विकास की नई कहानी लिखी जा रही है। माल्टा के छिलकों से तैयार हो रहे हर्बल उत्पाद यह साबित कर रहे हैं कि यदि सोच और प्रयास सकारात्मक हों तो बेकार समझी जाने वाली चीजें भी समृद्धि और आत्मनिर्भरता का आधार बन सकती हैं। पौड़ी की महिलाएं आज इसी बदलाव की सशक्त मिसाल बनकर उभर रही हैं।


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