प्रो. (डॉ.) महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट उन वैज्ञानिकों में हैं, जिन्होंने विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं, शोधपत्रों और विश्वविद्यालयों की कक्षाओं तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने विज्ञान को समाज, प्रकृति और भविष्य की सुरक्षा से जोड़ा। उनके लिए हिमालय कोई निर्जीव पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, जीवंत और निरंतर बदलता हुआ तंत्र था, जिसे समझने और बचाने की जिम्मेदारी वैज्ञानिकों पर है।

लगभग चार दशकों के शोध अनुभव और तीन दशकों के शिक्षण कार्य के दौरान उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, हिमनदीय जोखिम, जल संसाधन, भू-आकृतिक परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे जटिल विषयों पर गहन अध्ययन किया। उनका शोध केवल अकादमिक महत्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने नीतिगत फैसलों और ज़मीनी समझ को दिशा दी।
नंदा देवी बायोस्फियर रिज़र्व के प्रबंधन प्लान (2002–2007) से लेकर उत्तराखंड में ग्लेशियरों के पीछे हटने और वनस्पति परिवर्तन (2008–2012) के अध्ययन तक उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

उन्होंने यह स्पष्ट किया कि हिमालय में हो रहे छोटे-छोटे बदलाव भविष्य की बड़ी आपदाओं के संकेत होते हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना विनाश को आमंत्रण देने जैसा है। जब केदारनाथ आपदा (2013) ने पूरे देश को झकझोर दिया, तब प्रो. बिष्ट ने बिना किसी दबाव के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखी। इसके बाद ऋषिगंगा त्रासदी (2021) और जोशीमठ भू-धंसाव (2023) जैसे मामलों में भी उनके आकलन ने यह साबित किया कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बिगड़ने का खामियाजा समाज को भुगतना पड़ता है।

उनकी खासियत यह थी कि जब कई लोग चुप्पी साध लेते थे, तब वे तथ्यों और तर्कों के साथ सच बोलने का साहस दिखाते थे। उनका ज्ञान सत्ता और तंत्र के लिए कभी-कभी असहज हो सकता था, लेकिन समाज के लिए वह बेहद जरूरी था। वे मानते थे कि वैज्ञानिक की जिम्मेदारी केवल आंकड़े प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उसके परिणामों को आम लोगों तक पहुंचाना भी है।
प्रो. बिष्ट ने यह सिखाया कि विज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसमें मानवीय संवेदना न हो। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश छोड़ता है कि सच्चा वैज्ञानिक वही है, जो प्रकृति, समाज और भविष्य तीनों के प्रति जवाबदेह हो। उत्तराखंड और पूरा हिमालय उनके समर्पण, ईमानदारी और दूरदृष्टि के लिए सदैव उनका ऋणी रहेगा।




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