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देर से ही सही, मौसम मेहरबान हुआ पहाड़ों पर

बर्फबारी बनी हिमालय और मां गंगा के लिए वरदान

देर से ही सही, लेकिन इस बार मौसम ने आखिरकार पहाड़ों पर अपनी मेहरबानी दिखाई है। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में जहां लगातार बारिश हो रही है, वहीं ऊंचाई वाले इलाकों में जमकर बर्फबारी जारी है। हिमालय की चोटियां एक बार फिर सफेद चादर से ढक गई हैं। बर्फ केवल हिमालय का सौंदर्य ही नहीं, बल्कि उसका आभूषण है और मां गंगा जी का दिव्य श्रृंगार भी।

हिमालय के पर्यावरण के लिए जीवनदायिनी बर्फ

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के अनुसार, यह बर्फबारी हिमालय के पर्यावरण, पारिस्थितिकी संतुलन और दीर्घकालीन सेहत के लिए अत्यंत आवश्यक है। बर्फ हिमालय में विद्यमान ग्लेशियरों, नदियों, झरनों, तालाबों, प्राकृतिक जलस्रोतों, जल-जंगल, जड़ी-बूटियों, फल-फूलों, बुग्यालों और पर्वतीय फसलों के लिए जीवनरेखा का काम करती है।

बर्फ पिघलकर धीरे-धीरे नदियों में परिवर्तित होती है, जिससे साल भर जल उपलब्धता बनी रहती है। यही कारण है कि हिमालय की बर्फ को पूरे उत्तर भारत के लिए जल सुरक्षा का आधार माना जाता है।

नवंबर-दिसंबर की बर्फबारी क्यों है जरूरी

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नवंबर और दिसंबर में होने वाली बर्फबारी ही हिमालय की सेहत के लिए सबसे अधिक अनुकूल होती है। इस दौरान गिरने वाली बर्फ हिमालय और उसके ग्लेशियरों पर परत-दर-परत जमती है, जो आने वाले गर्म महीनों में सुरक्षा कवच का काम करती है।

इन परतों की मोटाई कई स्थानों पर 2 से 12 फीट तक होती है, जो मई-जून से लेकर सितंबर तक ग्लेशियरों को पिघलने से बचाती है।

बिगड़ता ऋतुचक्र बना चिंता का कारण

पिछले डेढ़ दशक से पूरी दुनिया में ऋतुचक्र असंतुलित हो गया है। हिमालयी राज्यों में पहले जहां सर्दियों की शुरुआत में बर्फबारी होती थी, अब वह जनवरी से मार्च तक खिसक गई है। यह बदलाव हिमालय और उसके पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

जनवरी में सूर्य के मकर रेखा पर आने के बाद तापमान में बढ़ोतरी शुरू हो जाती है। ऐसे में फरवरी और मार्च की बर्फबारी पहले से मौजूद बर्फ को बचाने के बजाय उसे और तेज़ी से पिघलाने में सहायक बन जाती है।

तेजी से पिघलते ग्लेशियर

हिमालय में बर्फ पिघलने की गति लगातार बढ़ रही है। यहां मौजूद ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। मां गंगा का उद्गम स्रोत गौमुख (गंगोत्री ग्लेशियर) भी सबसे तेजी से पिघलने वाले ग्लेशियरों में शामिल हो चुका है।

कई स्थानों पर वर्षभर बर्फ से ढका रहने वाला हिमालय अब नंगा दिखाई देने लगा है। जगह-जगह बर्फ हटने के बाद धरती झांकती नजर आ रही है, जो एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी है।

फटती नहीं, उधड़ती बर्फ की चादर

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में अब बर्फ की चादरें केवल फट नहीं रही हैं, बल्कि उधड़ रही हैं। फटने का इलाज प्रकृति और मानव दोनों के पास होता है, लेकिन उधड़ने का इलाज न प्रकृति के पास है और न ही मानव के पास। यह स्थिति हिमालय के भविष्य के लिए बेहद चिंताजनक है।

मां गंगा का श्रृंगार और मानव की जिम्मेदारी

बर्फ ही हिमालय का सौंदर्य है, आभूषण है और मां गंगा जी का पावन श्रृंगार भी। गंगोत्री से लेकर पूरे हिमालय क्षेत्र में हो रही यह बर्फबारी हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव का सबसे बड़ा धर्म है।

यदि समय रहते हिमालय और उसके पर्यावरण की रक्षा नहीं की गई, तो इसके दुष्परिणाम केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे देश को प्रभावित करेंगे।

– लोकेन्द्र सिंह बिष्ट, उत्तरकाशी

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