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उत्तराखंड @25 : अब उत्सव नहीं, संकल्प का समय

ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त (पहाड़ी) डंगवाल

उत्तराखंड की 25 वर्षों की यात्रा हमें यह सिखाती है कि राज्य का निर्माण केवल भौगोलिक सीमाओं का पुनर्गठन नहीं होता, बल्कि यह दृष्टि, निष्ठा और दायित्वबोध का पुनर्निर्माण है।

यह वह अवसर है जब हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या हमने उस उत्तराखंड का निर्माण किया है जिसका स्वप्न हमारे शहीद आंदोलनकारियों ने देखा था। या हम फिर उसी ढर्रे पर लौट आए हैं, जहां सत्ता का अर्थ केवल कुर्सी और संसाधनों का दोहन रह गया है।

उत्तराखंड — ऋण, भ्रष्टाचार और आत्ममुग्ध शासन की त्रासदी की कहानी बन गया है। आज उत्तराखंड पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज़ लदा हुआ है, और इस ऋण के ब्याज को चुकाने के लिए भी राज्य को नए-नए लोन लेने पड़ रहे हैं। विकास की आड़ में यह प्रदेश कर्ज़ के दलदल में धंसता जा रहा है।

विधायक निधि के कार्यों में ब्लॉक स्तर से लेकर ऊंचे प्रशासनिक स्तर तक ठेकेदारों से 15% कमीशन का चलन अब एक लिखे-अनलिखे नियम की तरह संस्थागत हो चुका है। जनता का धन लूट का जरिया बन चुका है।

देवभूमि की पवित्र माटी पर आज ऐसे शराब कारखाने फल-फूल रहे हैं जिनके नाम हमारी धार्मिक आस्था से जुड़े देवी देवताओं के नाम पर रखे गए हैं, यह हमारी संस्कृति, श्रद्धा और नैतिकता का क्रूरतम अपमान है।

सरकार और प्रशासन की गिरावट अब नैतिक नहीं, आध्यात्मिक पतन का रूप ले चुकी है। आज उत्तराखंड पूरे देश में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा का पर्याय बन चुका है।

इस राज्य की विफलताओं की सूची इतनी लंबी है कि इतिहास के पन्ने भी उसकी पूरी गाथा लिखने में कम पड़ जाएंगे। और इन सबके बीच, हमारी सरकार प्रदेश की ‘युवा अवस्था’ में प्रवेश का जश्न मना रही है — आत्ममुग्ध, आत्मप्रशंसित और जनता की पीड़ा से सर्वथा विमुख।

क्या यही था हमारे पूर्वजों का सपना? क्या इसी के लिए हमने उत्तराखंड को अलग राज्य बनाया था — ताकि यह देवभूमि कर्ज, कमीशन और भ्रष्टाचार की भूमि बन जाए?

यह केवल विफल शासन की कहानी नहीं, बल्कि उस चेतना की मृत्यु है जिसे कभी ‘उत्तराखंड की आत्मा’ कहा जाता था। अब यह तय करना होगा कि आने वाले दशक में हम कैसा उत्तराखंड चाहते हैं। यदि इस राज्य को सही दिशा देनी है, तो राजनीति को ‘सत्ता के उपभोग’ से ‘सेवा के संकल्प’ की ओर मोड़ना ही होगा। सत्ता केवल शासन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के जीवन में प्रकाश लाने का उपकरण बननी चाहिए।

सच्चा विकास वहीं है जो हर गांव, हर खेत, हर बच्चे, हर परिवार तक पहुंचे — जब गैरसैंण से गंगोत्री तक, मुनस्यारी से चमोली तक, हर नागरिक को यह विश्वास हो कि यह राज्य वास्तव में उसका अपना है; कि उसके श्रम, उसके सपने, और उसकी संतानों का भविष्य इसी धरती पर सुरक्षित है।

पच्चीस वर्ष बाद यह अवसर केवल जश्न मनाने का नहीं, बल्कि नए संकल्प लेने का है, कि हम उस उत्तराखंड का निर्माण करेंगे जो ईमानदार, आत्मनिर्भर, पारदर्शी और संवेदनशील हो। जहां विकास का पैमाना केवल पुल, सड़कें या भवन न हों, बल्कि जनता का विश्वास, सम्मान और मुस्कान जो अच्छी आर्थिकी।

अब समय आ गया है व्यवस्था परिवर्तन का — केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि सोच बदलने का। इसके लिए सैनिक समुदाय और जन समुदाय, दोनों को एक साथ आना होगा — एकजुट, एकमुठ और एकछत्र होकर। हमें राजनीतिक जनमत इस प्रकार बनाना होगा कि उत्तराखंडियत की भावना के विपरीत काम करने वाली इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों — भाजपा और कांग्रेस — को सत्ता से दूर रखा जा सके।

यह स्पष्ट समझना होगा कि इन दलों का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना और संसाधनों का दोहन है, जबकि हमारा उद्देश्य सत्ता में आकर सेवा, सत्यनिष्ठा और सतत-संतुलित विकास का संकल्प निभाना है।

अब बातें कम और एकजुटता पर अधिक ध्यान देने का समय है — क्योंकि यदि आज हमने एकता नहीं दिखाई, तो आने वाला कल हमारे प्रदेश की पहचान, अस्मिता और अस्तित्व — सबको निगल जाएगा। उत्तराखंड अब चौराहे पर खड़ा है — एक ओर अवसर है पुनर्जागरण का, और दूसरी ओर खतरा है पूर्ण बर्बादी का।

आइए, इस 25वीं वर्षगांठ पर हम यह प्रतिज्ञा लें कि अब उत्तराखंड की राजनीति दिल्ली के इशारों पर नहीं चलेगी, बल्कि गढ़वाल और कुमाऊं की मिट्टी से उठे उस जनशक्ति के संकल्प पर चलेगी, जो ईमानदारी, परिश्रम, और समर्पण से इस भूमि को स्वर्ग नहीं, बल्कि एक जीवंत, न्यायपूर्ण और समृद्ध राज्य बनाएगी। यही सच्चा उत्तराखंडी पुनर्जागरण होगा। यही शहीद आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड होगा। और यही हमारी राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है।

यह लेखक के अपने विचार हैं।

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