Friday , 4 September 2026
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बस यही रैबार… मिलकर बढ़ाएं विकास की रफ्तार

त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखंड

रैबार के इस मंच से मैं अनेक प्रवासी उत्तराखंडी अधिकारियों को देख रहा हूं, जो पिछली बार आए थे और वे दोबारा यहां आए हैं, तो इसका सीधा सा मतलब है कि जिस कॉन्सेप्ट को लेकर यह रैबार कार्यक्रम किया जा रहा है, उसे आपने स्वीकार किया है। आपने रैबार की आवश्यकता महसूस की है। यह स्पष्ट दिखाई देता है। पिछली बार यह कार्यक्रम देहरादून में हुआ था, इस बार हमने ऐतिहासिक टिहरी झील को चुना। टिहरी जनपद ऐतिहासिक है, यहां गप्पू चौहान जैसे स्वाभिमानी पैदा हुए।

कहते हैं कि जब लड़ाई में उनकी गर्दन कटी तो धड़ पीछे गिरा था। माधव सिंह भंडारी जैसे योद्धा यहां हुए। कृषि के लिए उनका बलिदान अमूल्य था। आज से 350 साल पहले उन्होंने अपने हाथों और लकड़ी के औजारों से पौने किमी की गूल (धारा) बनाकर से नदी को डायवर्ट कर दिया था। अपने पुत्र की बलि भी दे दी। विक्टोरिया क्रॉस विजेता वीर गबर सिंह की यह धरती आज पूरे उत्तराखंड और देश को प्रेरणा देती है। हम चाहते हैं कि रैबार कार्यक्रम एक प्रेरणा देने का जरिया बने – आओ आपुण घौर आवा। अपने घर आइए, अपने गांव के लिए हम कुछ करें, अपने राज्य के लिए कुछ करें। इसी सोच के साथ पहले भी रैबार कार्यक्रम आयोजित किया गया था और मैं कह सकता हूं कि निश्चित रूप से इसके सकारात्मक परिणाम आए हैं।

आलोक जोशी जी आज यहां हैं, उन्होंने देश का पहला ड्रोन एप्लीकेशन सेंटर इस राज्य को दिया। राजेंद्र सिंह चौहान के प्रयासों से कोस्ट गार्ड का भर्ती केंद्र मिला। यह सोचने वाली बात है कि कहां समुद्र की निगहबानी और कहां पहाड़ी राज्य में कोस्ट गार्ड का भर्ती केंद्र। आज भास्कर खुल्बे जी यहां नहीं हैं, तमाम ऐसी विकास की योजनाएं, डाटा देखने पर पता चलता है कि जो वित्तीय मदद हमें भारत सरकार से मिली है, उसमें बहुत बड़ा योगदान इस रैबार कार्यक्रम का ही रहा है। हम आज अनेक योजनाएं अपने राज्य में ला पाए हैं।

मैं प्रवासी उत्तराखंडी भाइयों और बहनों को बताना चाहता हूं कि हमने दूरस्थ क्षेत्रों के लिए, जिसके लिए उत्तराखंड बना, हमारी मां-बहनों ने अपमान सहा, जिसके लिए हमारे नौजवानों ने बलिदान दिया, आज उन आकांक्षाओं का उत्तराखंड हम बना रहे हैं। मेरा आशय उत्तराखंड के संतुलित विकास से है। पहाड़ों में बड़े उद्योग नहीं लग सकते हैं। बड़े उद्योग को लेकर नारेबाजी तो हो सकती है पर यह संभव नहीं है। हर जिले में औद्योगिक स्थान बना हुआ है लेकिन कहीं पर भी उद्योग स्थापित नहीं हो पाया क्योंकि आज के समय में जब ग्लोबल विलेज की परिकल्पना है, पूरी दुनिया एक मार्केट के रूप में तब्दील हो गई है, ऐसे में बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा हो गई है। इसलिए हमें उस फील्ड में आगे बढ़ना होगा, जिसमें हमारा एकाधिकार हो सकता है।

रैबार-2 के मंच से उत्तराखंड के सपूतों को संबोधित करते सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत।

आज आर्गेनिक की बात होती है, बाई डिफॉल्ट उत्तराखंड आर्गेनिक है। आर्गनिक फील्ड में हम आगे बढ़ सकते हैं। हमने पूरे राज्य में इसके क्लस्टर तैयार किए हैं। हमारे कृषि मंत्री बहुत अच्छे तरीके से इस काम को अंजाम दे रहे हैं। हजार क्लस्टर से ज्यादा राज्य में तैयार किए गए हैं। मैं पिछली बार टिहरी आया था तो कहा था तो मैंने कहा था कि पिरूल, चीड़ की पत्तियां जिसको हम अभिशाप मानते हैं, ये हमारे लिए वरदान साबित होने वाले हैं। आज हमारे पिरूल और चीड़ की पत्तियों से बिजली बनाने के 23 प्रोजेक्ट दिए जा चुके हैं। इससे कुछ दिनों में बिजली बनना शुरू हो जाएगी। पिरूल की पत्तियों से पैलेट और इसकी कीमत कुकिंग गैस से एक तिहाई है। 3-4 मिनट में चूल्हा अच्छे तरीके से जलने लगता है, मैंने इसका प्रयोग किया है। इसका प्रोजक्ट दिसंबर 2019 में लॉन्च किया जाएगा। उन्होंने बताया कि 12,000 मीट्रिक टन हर साल पत्तियों से ईंधन बनाएंगे। शादी, होटलों और व्यापारिक इस्तेमाल में हम चीड़ की पत्तियों से ऊर्जा पहुंचाएंगे। इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। जहां वनों में इसे विनाश और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला पौधा माना जा रहा है, यह हमारे विकास का आधार बनने वाला है।

इसी रेजिन से आज इंडोनेशिया 150 से ज्यादा किस्म के आइटम बना रहा है। हमने भी उत्तराखंड में इसकी शुरुआत कर दी है। बैजनाथ बागेश्वर में 11-12 किस्म के आइटम रेजिन से बना रहे हैं। रेजिन के पत्ते से ब्यूटी क्रीम, औषधियों में इस्तेमाल के साथ खाने की चीजें भी बन रही हैं। हमसे लोगों ने कहा कि इस चीड़ को हटाइये, तो हम यह कहना चाहते हैं कि हम इसे हटाएंगे नहीं, बल्कि इसे विकास का जरिया बनाएंगे। कम से कम एक लाख लोगों को रोजगार देने की क्षमता 23 लाख मीट्रिक टन पिरूल, चीड़ की पत्तियों में है। मैं अपने स्थानीय और प्रवासी लोगों से कहना चाहूंगा कि बहुत बड़ा निवेश नहीं, आप लोग आगे आइए, शुरुआत कीजिए। रैबार-1 के बाद हम राज्य में सोलर ऊर्जा समेत 10 नई पॉलिसी लेकर आए थे और 5 योजनाओं में परिवर्तन किए। 13 महीने में राज्य में 18,000 करोड़ के निवेश का रास्ता साफ हुआ है। इससे 50 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। हम इस तरह से लोगों के लिए काम कर रहे हैं।

अब तक पहाड़ों में हम लोग हाइड्रो पर निर्भर थे लेकिन जिस तरह से परिस्थितियां बन रही हैं, उस देखते हुए हमें दूसरी तरफ ध्यान देना पड़ा। हमने अपने किसानों से कहा कि हम खेती नहीं कर पा रहे हैं, इसके अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन हम अपने खेतों में बिजली बड़े आराम से पैदा कर सकते हैं। टिहरी में तो बंदरों और सूअरों से लोग परेशान हैं। मार नहीं सकते, उनको भी जीने का अधिकार है। चुनाव में तो यह मुद्दा भी बन गया था। लोगों ने कहा कि बंदर भगाओ तब वोट देंगे आपको। हमने किसानों से कहा कि हम सोलर एनर्जी पर आएंगे। इसके लिए 600 करोड़ रुपये का निवेश पहाड़ों में आया है। 202 मेगावॉट के अवॉर्ड हमने इन महीनों में किए हैं।

किस गांव से कितना पलायन, हमने बनाया डेटा

हम जब टिहरी में इकट्ठा हुए हैं, हम चाहते हैं कि संतुलित विकास हो। राज्य के साथ-साथ हर जिले की प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी। राज्य जब बना था तो 25,000 प्रतिव्यक्ति आय थी और आज 1 लाख 98 हजार से ज्यादा है लेकिन अगर मैं तुलना करूं कि हरिद्वार, देहरादून, उत्तरकाशी, बागेश्वर की कितनी है तो बहुत बड़ा अंतर समझ में आता है। इसके लिए हमने एक आयोग बनाया। ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग ने एक-एक गांव की स्टडी की। किस गांव में क्या-क्या संसाधन हैं, क्या सुविधाएं हैं, क्या असुविधाएं हैं, कितना पलायन हुआ, किस गति से कहां हुए। उन्होंने कहा कि हमारे पास डेटा नहीं होगा तो हम आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि डेटा फ्यूल है। डेटा हमारे पास है तो हम उसके आधार पर राज्य का नियोजन कर सकते हैं और राज्य को सही दिशा में ले जा सकते हैं।

हमारी कोशिश है कि निवेश दूरस्थ क्षेत्रों में जाए। इन्वेस्टर समिट में मैं मुंबई गया था। मैं फिल्म निर्माताओं से मिला। महेश भट्ट के भाई ने बताया कि वह शूटिंग के लिए साइट देखने रोमानिया गए हैं। मैंने उनसे कहा कि अपने देश में भी रोमानिया है। आप देश का पैसा बाहर ले जा रहे हैं। उन्होंने आश्चर्य से पूछा तो मैंने कहा, हां, अपने देश में ही। मैंने उनसे कहा, जिस उत्तराखंड से मैं आया हूं, उतनी खूबसरती आपको दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी। लोग स्विट्जरलैंड की बात करते हैं, लेकिन इससे बेहतर प्रकृति की सुंदरता कहीं और नहीं है। उत्तराखंड में सबसे सुंदर संसाधन और मानव संसाधन हैं। ऐसे लोग जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं। मेरे राज्य में आप आइए। आज के दिन भी उत्तराखंड में 3 फिल्मों की शूटिंग चल रही है। हिंदी से लेकर मलयाली तक 200 से ज्यादा फिल्में और सीरियल्स शूट हुए हैं। देश में राज्य को बेस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट का अवॉर्ड मिला है। जो कहीं नहीं है, वह हमारे राज्य उत्तराखंड में है।

टिहरी झील में सीएम योगी के साथ बोटिंग करते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री।

16 में से 14 किस्म की जलवायु अपने राज्य में

जैव विविधता महत्वपूर्ण होती है। उत्तराखंड ऐसा राज्य है, जहां देश की 16 किस्म की जलवायु में से 14 प्रकार की अपने स्टेट में है। अगर रेगिस्तानी और समुद्री जलवायु को छोड़ दें तो हमारे यहां सब जलवायु है। संपन्न राज्य के संसाधनों की पहचान करके दोहन और प्रकृति का संरक्षण करते हुए हम आगे बढ़ रहे हैं। 1.61 लाख रुपये प्रतिव्यक्ति आय थी, राज्य की जब मैंने संभाला, आज राज्य की प्रतिव्यक्ति आय 1.98 लाख रुपये हो गई है। जीएसटी में हम कर्नाटक के साथ शामिल हैं।

हमने जिलाधिकारियों से कहा है कि आप अपने जिले की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाइए तब मानेंगे कि राज्य का संतुलित विकास हो रहा है। हम यह नहीं मान सकते कि एक हाथ कमजोर, एक पैर कमजोर है तो हम शरीर को स्वस्थ नहीं कह सकते हैं भले ही वजन काफी हो। राज्य को हम तभी स्वस्थ और विकसित मानेंगे जब हमारे राज्य में गांव और शहर उत्पादक और ग्राहक की इनकम बढ़ेगी। उत्पादन हो रहा है लेकिन ग्राहक की जेब में भी पैसा होना चाहिए और ग्राहक गावों में है। उत्पादक शहरों में है। दोनों बढ़ना चाहिए तभी हम अपने राज्य की आर्थिक प्रगति कर सकते हैं। मैं अपने राज्य के सभी अधिकारियों से यह बात करता हूं।

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ईमानदार सरकार चाहिए। भ्रष्टाचार ने हमको खोखला किया है। देश में सबसे पहले और लगातार हमें भ्रष्टाचार पर प्रहार करने की जरूरत है। हम दावे के साथ कह सकते हैं 2.5 वर्षों में हमने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया और 70 से 80 लोगों को जेल के अंदर डाला है। इसमें छोटे अधिकारियों लेकर आईएएस तक को सस्पेंड किया है।

शादी हो या कार्यक्रम, घर जरूर आइए

मैं अपने आगंतुकों से कहना चाहूंगा कि अपने घर शादी या दूसरे कार्यक्रमों में जरूर आइए। घर की सफाई हो जाएगी। 3 दिन 5 दिन रुकिए। सालभर में अगर 15 दिन भी आप अपने गांव में रहते हैं तो यह बहुत बड़ा योगदान होगा। स्थानीय लोगों से भी मैं कहना चाहता हूं कि मैंने आज इस कार्यक्रम में अलग कपड़े पहने हैं। कई साथियों ने इस पर पूछा भी। मैं आपको बताना चाहता हूं कि दुनिया में सबसे ज्यादा जिस कपड़े की डिमांड है वह है भांग के रेशे से बना हुआ कपड़ा। दूसरे नंबर पर कंडाली, बिच्छू घास की डिमांड है।

आज जो मैंने जैकेट पहनी है वह उत्तराखंड के बिच्छू घास की बनी हुई है। मेरा कुर्ता भांग के रेशे से बना है। जो जूता पहना है, वह भी सौ फीसदी भांग से बना है। अगली बार टोपी भी वैसी पहनकर आऊंगा। भांग से 500 किस्म के आइटम बनते हैं और यह नशा नहीं है। कुछ लोग जाने-अनजाने भ्रम फैलाने का प्रयास करते हैं। यह उत्तराखंड के बंजर पड़े खेतों में उद्योग लगाने का अवसर देता है। अजंता और एलोरा की गुफाओं में भी भांग का इस्तेमाल हुआ है।

अगर भांग की खेती की जाए तो हमारी आय बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि हमारे पास बीज है, पूरा प्लान है आप लेकर इसकी खेती कर सकते हैं। आप अपने गांवों के लिए यह योगदान कर सकते हैं। देश का पहला राज्य उत्तराखंड है, जहां भांग के लिए परमिट किया गया है लेकिन यह गांव वाली भांग नहीं है। उसमें नशा है। इसमें कोई खतरा नहीं है। इसमें पानी भी कम लगता है।

देवभूमि की शपथ
हम देवभूमि उत्तराखंड के बेटे-बेटियां आज जब रैबार ‘आवा आपुण घौर’ के मंच पर यहां टिहरी झील के किनारे एकत्रित हुए हैं, यह शपथ लेते हैं कि हम उत्तराखंड के विकास विशेष रूप से प्रवासी युवाओं को उत्तराखंड और यहां की समृद्ध संस्कृति से जोड़ने के लिए प्रेरित करेंगे। यह हमारा सामूहिक प्रयास होगा कि देवभूमि में विकास की यह पवित्र गंगा लोककल्याणकारी बनकर निरंतर आगे बढ़ती रहे और हमारे चार धाम, मां गंगा और हमारी संस्कृति का देवत्व बना रहे। हम सब प्रगति के नए पथ पर आगे बढ़ रहे उत्तराखंड के लिए अपने-अपने अनुभव साझा करेंगे। हम अपनी जन्मभूमि के लिए हर संभव योगदान देंगे।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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