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उत्तराखंड न्यूज़रुद्रप्रयाग

टूट रही समाज की बंदिशें, बेटी ने पिता को दी मुखाग्नि, क्रिया पर भी बैठी

uttarakhand daughter performed final rituals after fathers death

बदलते वक्त के साथ समाज की वर्जनाएं भी टूट रही हैं। बेटियों को श्मशान पर जाने की अनुमति न देने वाले इसी समाज में अब बेटियां अपने पिता को मुखाग्नि देने जैसे केवल पुत्रों के लिए कहे गए फर्ज को भी निभा रही हैं।

हिंदू धर्म में इंसान के देह छोड़ने पर उसके पुत्र द्वारा मुखाग्नि देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पुत्र नहीं तो परिवार का ही कोई पुरुष यह धार्मिक क्रिया संपन्न करता है लेकिन अब यह वर्जनाएं टूट रही है। जी हां, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले से ऐसी ही खबर आई है। यहां के शेरसी गांव की उर्मिला सेमवाल ने अपने पिता को देहांत के बाद, न सिर्फ मुखाग्नि दी बल्कि अन्य क्रिया कर्म भी विधिवत तरीके से पूरा कर रही हैं।

45 साल की उर्मिला की छह बहनें हैं और उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा के लिए शादी नहीं की। वह आंगनबाड़ी में काम करती हैं। 80 साल के उनके पिता का देहरादून में 17 मार्च को निधन हो गया था। उन्हें इलाज के लिए वहां ले जाया गया था। अंतिम संस्कार की क्रिया हरिद्वार में पूरी की गई। अब अन्य क्रियाएं गांव में रही हैं। धार्मिक क्रियाओं के तहत वह अपना खाना अलग बना रही है और पूरी परंपरा निभा रही है। उनकी मां 70 साल की हैं। एक बेटी के अपने पिता के अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी करने की यह बात इलाके में चर्चा की विषय बनी हुई है।

uttarakhand daughter performed final rituals after fathers death

(आगे की धार्मिक क्रियाएं भी खुद कर रहीं उर्मिला)

आइए समझते हैं कि हिंदू धर्म में मृत्यु के संबंध में वह नियम या परंपरा क्या है, जिसमें अबतक बेटियों को इस अधिकार से वंचित रखा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि मृत व्यक्ति का पुत्र है तो मुखाग्नि उसे ही देना है, ऐसा विधान है।

मृतक चाहे स्त्री हो या पुरुष अंतिम क्रिया पुत्र ही संपन्न करता है। इस संबंध में शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि पुत्र पुत नामक नरक से बचाता है यानी पुत्र के हाथों से मुखाग्नि मिलने के बाद मृतक को स्वर्ग प्राप्त होता है। इसी मान्यता के आधार पर पुत्र होना कई जन्मों के पुण्यों का फल बताया जाता है।

बेटियों या महिलाओं को तो श्मशान आने का अधिकार भी नहीं दिया गया है। हालांकि अब यह वर्जनाएं टूट रही हैं और बेटियां न सिर्फ श्मशान में कदम रख रही हैं बल्कि अपने माता-पिता को मुखाग्नि भी दे रही हैं। कुछ हद तक समाज भी इसे स्वीकार करने लगा है। उत्तराखंड की यह तस्वीर अपने आप में पूरी कहानी कहती है।

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Hill Mail

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