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उत्तराखंड के जानेमाने फोटोग्राफर, घुमंतू पत्रकार दिनेश कंडवाल नहीं रहे, CM ने जताया दुख

पत्रकार और प्रकृति के प्रति अपार स्नेह रखने वाले घुमंतू फोटोग्राफर दिनेश कंडवाल जी अब हमारे बीच नहीं है। उत्तराखंड के लोगों ने अपने पत्रकार के निधन पर गहरा दुख जताया है।

उत्तराखंड के जानेमाने पत्रकार दिनेश कंडवाल (Dinesh Kandwal) का आज निधन हो गया। ‘देहरादून डिस्कवर’ मासिक पत्रिका के संपादक कंडवाल ने ओएनजीसी हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। आपको बता दें कि दो दिन पहले ही आंतों में संक्रमण के कारण उन्हें यहां भर्ती कराया गया था। जैसे ही यह खबर मिली उत्तराखंड के पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पत्रकार दिनेश कंडवाल के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।

उन्होंने लिखा, ‘जाने माने पत्रकार श्री दिनेश कंडवाल जी के निधन का दुःखद समाचार मिलकर मन बहुत व्यथित हुआ। मैं दिवंगत आत्मा की शांति व शोक संतप्त परिवार जनों को धैर्य प्रदान करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। परमपिता परमेश्वर दिनेश जी को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।’ सोशल मीडिया पर पहाड़ के कई लोगों ने उनके निधन पर दुख जताया है। लोगों ने उनके साथ अपने संस्मरण को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी है।

दिनेश कंडवाल ने पत्रकारिता की शुरुआत ऋषिकेश में भैरव दत्त धूलिया के अखबार तरुण हिन्द से बतौर पत्रकार शुरू की। बाद में उन्होंने पार्टनरशिप में एक प्रिटिंग प्रेस भी चलाई और एक अखबार का संपादन भी किया। ओएनजीसी में नौकरी लगने के बाद भी उन्होंने अपना लेखन कार्य जारी रखा। उन्होंने स्वागत पत्रिका, धर्मयुग, कादम्बनी, हिन्दुस्तान, नवीन पराग, संडे मेल सहित दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख छपते रहे।

नार्थ ईस्ट में त्रिपुरा सरकार द्वारा उनकी पुस्तक ‘त्रिपुरा की आदिवासी लोककथाएं’ प्रकाशित की गई जो आज भी वहां की स्टॉल पर दिखाई देती है। ओएनजीसी की त्रिपुरा मैगजीन ‘त्रिपुरेश्वरी’ पत्रिका का उन्होंने वर्षों तक संपादन किया। ट्रेकिंग के शौकीन दिनेश कंडवाल ने नार्थ-ईस्ट से लेकर उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र के विभिन्न स्थलों की यात्राएं कीं, जिन पर उन्होंने बड़े-बड़े लेख भी लिखे।

उनकी यात्राओं में 1985 संदक-फ़ो (दार्जलिंग), संगरीला (12000 फिट सिक्किम), थोरांग-ला पास (18500 फिट) दर्रा, डिजोकु-वैली ट्रैक, मेघालय में लिविंग रूट ब्रिज ट्रैक गढवाल-कुमाऊं में कई यात्राओं में वैली ऑफ़ फ्लावर, मदमहेश्वर, दूणी-भितरी, मोंडा-बलावट-चाईशिल बेस कैंप, देवजानी-केदारकांठा बेस आदि दर्जनों यात्राएं शामिल हैं। उन्होंने लद्दाख में अपनी पत्नी श्रीमती सुलोचना कंडवाल के साथ ‘सिन्दू-जसकार नदी संगम का चादर ट्रैक’ यात्रा की।

2012 में ONGC से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से पहले उन्होंने 2010 में ‘देहरादून डिस्कवर’ नामक पत्रिका का नाम आरएनआई को अप्रूवल के लिए भेजा और 10 अक्टूबर 2011 में उनकी मैगजीन का प्रकाशन शुरू हुआ। 66 साल की उम्र में उनकी अंतिम यात्रा ‘हिमालयन दिग्दर्शन ढाकर शोध यात्रा 2020’ शामिल रही जिसमें उन्होंने 4 दिन की इस ऐतिहासिक शोध यात्रा में लगभग 42 किमी पैदल सहित 174 किमी की यात्रा की।

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