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जीत सिंह नेगी: शिखर का सुर शून्य में शांत

जीत सिंह नेगी ने अपने अधिकतर गीत खुद ही लिखे। गीत गंगा, जौंली मगरी, छम घुंघुरू बाजला मलेथा की कुल, भारी भूल जैसी गीत-संगीत और नाटिकाएं उन्होंने खूब लिखी। मैं उन दिनों आकाशवाणी नजीबाबाद में था। उनसे कई बार मिलना होता था। सामान्य बात करने में कई बार अटकाव भी महसूस होता था, लेकिन गायकी में माधुर्य ही माधुर्य होता।

  • पार्थसारथि थपलियाल

एक सप्ताह भी नहीं हुआ उत्तराखंड के प्रख्यात लोकस्वर हीरा सिंह राणा को गए हुए, उनके बाद उत्तराखंड के शिखरों की एक और सजीव आवाज़ शून्य में समा गई। गढ़वाली लोक संगीत के भीष्म पितामह जीत सिंह नेगी हमारे मध्य नहीं रहे। 95 वर्ष की आयु में उत्तराखंड का यह लोकस्वर अनंत हो गया।

उनका जन्म 2 फरवरी 1925 को पौड़ी गढ़वाल में पैडुलस्यूं पट्टी के अयाल गांव में हुआ था। उनकी आरंभिक पढ़ाई बर्मा में हुई जहां उनके पिताजी सर्वे ऑफ इंडिया के ऑफिस में नौकरी करते थे। माध्यमिक शिक्षा देहरादून में हुई। जीत सिंह नेगी को बचपन से ही लोकगीत गाने का बहुत शौक था। इसके अलावा रामलीलाओं और नाटकों में उनकी जबरदस्त भूमिका होती थी। उस दौर में फिल्मों में के एल सहगल प्रमुख गायक थे। सहगल की गायकी का प्रभाव जीत सिंह नेगी पर भी पड़ा। गायकी का यह अंदाज़ गढ़वाली लोककलाकारों में सिर्फ उन्हीं का था। सहज भाव की गायकी, बिना अतिरिक्त जोर दिए लो पिच पर स्पष्ट गायकी, उन्हें कई अन्य कलाकारों से अलग करती रही।

जीत सिंह नेगी प्रथम गढ़वाली लोककलाकार थे जिनका पहला ग्रामोफोन रिकॉर्ड एचएमवी कंपनी ने 1947 में निकाला था। वह दौर आज की तरह नही था। आज की तुलना में मैं उस काल को प्राचीन काल कह सकता हूं। यातयात के साधन बहुत कम होते थे। एक बात तब जरूर थी, जो अब नहीं है- वह थी ईमानदारी। रिकॉर्डिंग करने का साहस उन्होंने किया और सफल हुए। उनका गाया सर्वाधिक प्रसिद्ध गढ़वाली गीत था…

तू होली बीरा, उची निसि डांडियों मा,
होली घसियारियों का भेष मा।
खुद मा तेरी रून्दू छों बीरा
सडकियों मा प्रदेश मा।

1958-60 के आस पास गढ़वाल के लोग नौकरियों के लिए बाहर निकलने लग गए थे। सेना में भी बहुत लोग जाने लगे थे। परदेस जाने वाले लोगों के दिलों को ये गीत रिझा भी देता और भिगा भी देता। ससुराल में मायके के दिन गिन रही बेटियों के मन में खुद के उमड़ते घुमड़ते बादल कब टपक पड़े कुछ पता न चलता। तब तक गढ़वाली लोकगीत सुनने का कोई अन्य माध्यम भी न था। बाद में जब आकाशवाणी लखनऊ से उत्तरायण कार्यक्रम शुरू किया गया तब बहुत से कलाकारों को आकाशवाणी लखनऊ से गाने का मौका मिला। उनमें जीत सिंह नेगी भी शामिल थे।

बौडी-बौडी ऐ गे ब्बे देख पूसा मैना।
गोंकी बेटी ब्वारी ब्बे मैंत चलि गेन।।

जीत सिंह नेगी ने अपने अधिकतर गीत खुद ही लिखे। गीत गंगा, जौंली मगरी, छम घुंघुरू बाजला मलेथा की कुल, भारी भूल जैसी गीत-संगीत और नाटिकाएं उन्होंने खूब लिखी। मैं उन दिनों आकाशवाणी नजीबाबाद में था। उनसे कई बार मिलना होता था। सामान्य बात करने में कई बार अटकाव भी महसूस होता था, लेकिन गायकी में माधुर्य ही माधुर्य होता।

जीत सिंह नेगी जी को अनेक सम्मान और पुरस्कार जीवनभर मिलते रहे। उनमें “गढरत्न”, उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नागरिक परिषद देहरादून द्वारा नागरिक अलंकरण, मोहन उप्रेती लोकसंस्कृति पुरस्कार। चार-पांच साल पहले उनसे मिलने धर्मपुर उनके कार्यस्थल पर गया था। ये मुलाकात लगभग 35 वर्ष बाद हुई, लेकिन उनके उत्साह में, प्रेम में वही अपनत्व का भाव था। उस समय बातों-बातों में कुछ बातें निकल आई थी जिन्हें मैंने संजो लिया था। वे काफी समय से वृद्धवस्था की बीमारियों से ग्रस्त थे। 20 जून 2029 को समाचार मिला जीत सिंह नेगी नहीं रहे। आनेवाले दिनों में उनसे मुलाकात भी कल्पना में बदल गई। ईश्वर दिवंगत आत्मा को बैकुंठ लोक में शरण दें, यही कामना है।

(लेखक आकाशवाणी के पूर्व कार्यक्रम अधिकारी रहे हैं।)

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