उत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक ने ऐसे फैसले लिए हैं, जो सीधे उत्तराखंड के आम परिवारों तक अपनी गर्माहट और असर लेकर पहुँचेंगे। सबसे बड़ा फैसला वही था, जिसकी चर्चा लंबे समय से होती रही है, अब महिलाएँ रात में भी दुकानों और प्रतिष्ठानों में काम कर सकेंगी। यह सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पहाड़ की उस बेटी की जीत है, जो आज तक काम के अवसरों के सीमित दायरों में कैद रही। नौकरी करने वाली युवतियों के लिए यह फैसला उम्मीद का नया दिया है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी सरकार ने खुद उठाई है। नियोक्ताओं को सुरक्षित परिवहन और सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध कराना अब कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।

उत्तराखंड की पहाड़ियाँ उन लोगों की कहानियों से भरी हैं जो वन्यजीव संघर्ष में अपनी जान गंवा देते हैं कभी खेतों में, कभी जंगल के रास्ते में। धामी सरकार ने यह दर्द समझा और मुआवजा बढ़ाकर सीधे 10 लाख रुपए कर दिया। किसी का जाना वापस नहीं आ सकता, लेकिन यह मदद उन परिवारों के लिए सहारा बन सकती है, जिनके घर का चिराग अचानक बुझ जाता है। यह फैसला पहाड़ की कठिन भौगोलिक और सामाजिक वास्तविकताओं को स्वीकार करने जैसा है।
कैबिनेट ने शिक्षा विभाग से जुड़ा एक अहम कदम भी उठाया शिक्षकों के चयन और वेतनमान से जुड़े विवादित प्रस्ताव को वापस लेना। वर्षों से कई अभ्यर्थी इस मुद्दे पर आंदोलन कर रहे थे। उम्मीदें और नाराज़गी दोनों साथ चल रही थीं। प्रस्ताव की वापसी उनके लिए राहत की सांस है, और आने वाले समय में नई व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाने की दिशा में यह पहला कदम माना जा रहा है। इसके अतिरिक्त चार जिलों पौड़ी, चमोली, नैनीताल और उत्तरकाशी में सहायक अभियोजन अधिकारी (APO) के 46 नए पदों का सृजन भी किया गया। यह न सिर्फ न्याय व्यवस्था में गति लाएगा बल्कि युवा कानून स्नातकों के लिए नए अवसर भी खोलेगा। न्यायालयों में लंबित मामलों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा, जिससे आम जनता को समय पर न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ेगी।

मीटिंग का एक भावनात्मक पहलू भी था। कैबिनेट ने पूर्व मंत्री स्वर्गीय दिवाकर भट्ट को याद किया। राजनीति की उठापठक में जहाँ चेहरों को जल्दी भुला दिया जाता है, वहीं कैबिनेट का यह कदम उत्तराखंड की राजनीतिक स्मृतियों को सम्मान देता है। दिवाकर भट्ट पहाड़ के दर्द, पलायन और लोक संस्कृति के मुद्दों को हमेशा आवाज देते रहे। उन्हें नमन करना, पहाड़ के विचारों को नमन करने जैसा ही है। इन सबके बीच अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, रोजगार और न्याय चारों दिशा में फैसलों का असर साफ देखा जा सकता है। महिलाएँ जब रात में भी काम कर सकेंगी, तो रोजगार का दायरा बढ़ेगा। वन्यजीव संघर्ष में मौत पर बढ़ा मुआवजा पहाड़ की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करेगा। शिक्षा विभाग में प्रस्ताव वापसी से विवाद कम होंगे। न्याय व्यवस्था में नए पद बनने से अदालतों में लंबित मामलों का बोझ घटेगा।
ये फैसले अलग-अलग दिख सकते हैं, लेकिन एक धागा उन्हें जोड़ता है एक ऐसा उत्तराखंड, जहाँ सुरक्षा, अवसर और संवेदनशीलता एक साथ चलें। कैबिनेट की यह बैठक सिर्फ नियम बदलने की प्रक्रिया नहीं थी; यह पहाड़ की रोजमर्रा की जिंदगी को समझने की कोशिश थी। और शायद यही किसी सरकार की असली पहचान होती है जब फैसले फाइलों से निकलकर लोगों के दिल तक पहुँचते हैं। यह बदलावों की शुरुआत है। रात में काम करती महिलाएँ, न्याय पाते ग्रामीण, सुरक्षित महसूस करता समाज और सम्मानित लोकनायक यही वो तस्वीर है, जिसकी ओर उत्तराखंड धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा है।


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