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उत्तराखंड के लिए नई विकास रणनीति की जरूरत

भविष्य के दृष्टिगत उत्तराखंड विभीषिका हमें अपनी नीतियां, योजना, विकास व गवर्नैंस दुरुस्त करने का एक अतिरिक्त मौका उपलब्ध करवाती है।

Flood in Chamoliपीड़ादायक सवाल है: इस पर्वतीय राज्य में प्रकृति के कोप व अप्रत्याशित मानवीय त्रासदी का कारण क्या था? विनाशलीला के बाद चली राजनीति का अंग बनने का मेरा कोई इरादा नहीं। वैसे जान और माल की व्यापक तबाही के नए आंकड़े अभी भी राष्ट्र के सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि ओछी बातों पर उलझने वाले हमारे नेता और उनकी बेलगाम जुबान जनता के हौसले को प्रकृति के कोप की अपेक्षा अधिक नुक्सान पहुंचाती है।

यह उलाहना भी कोई कम प्रासंगिक नहीं कि इस असाधारण विनाशलीला में आपदा प्रबंधन के व्यावहारिक स्तर पर केन्द्र और राज्य सरकार के नेतृत्व की गुणवत्ता बहुत ही घटिया स्तर की थी। चारधाम से जुड़े इस पूरी तरह चैपट खेल में केवल भारतीय वायुसेना के योद्धाओं के प्रयास ही गर्व की बात है। भारतीय वायुसेना ने अपने माऊंटेन डिवीजन के 8500 जवान, पैराट्रूपर और मैडीकल कोर को तैनात करके आई.टी.बी.पी. के जवानों और अधिकारियों की सहायता से अब तक का सबसे बड़ा बचाव अभियान चलाया जिसमें मौसम की बेरहमी और दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र के बावजूद भी जान पर खेल कर फंसे हुए तीर्थयात्रियों को राहत पहुंचाई गई और उनकी जिंदगियां बचाई गईं। हमारे ये योद्धा पूरे देश द्वारा अभिनंदन के हकदार हैं जो युद्ध और शांति दोनों में ही जरूरतमंद लोगों के दोस्त सिद्ध होते हैं।

TAWAGHAT SECTORउत्तराखंड की त्रासदी भी युद्ध की विभीषिका से किसी प्रकार कम चुनौतीपूर्ण नहीं थी लेकिन हमारी सशस्त्र सेनाएं जानती हैं कि देश को दरपेश विकटतम संकट की बेला में कैसा व्यवहार करना है। काश! हमारे नेता सेना के अफसरों व जवानों की अपेक्षा पांचवां हिस्सा ही कुशल होते। मतदाताओं के लिए यह हितकर ही होगा कि वे इस त्रासदी से सबक लेते हुए ऐसे व्यक्तियों को चुन कर सत्ता की कुर्सियों पर बैठाएं जो उनके प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता का भाव व्यक्त करें।

बांध निर्माण एवं बिजली उत्पादन, आधारभूत ढांचा विकास, पुनर्वास योजनाओं एवं सड़क नैटवर्क के पुनर्निर्माण के लिए हमें नई पहुंच और रणनीति अपनाने की अत्यधिक जरूरत है। नए विकास खाके के साथ-साथ हमें देवभूमि में तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों के प्रबंधन की ओर गम्भीरता से ध्यान देना होगा। इस पर्वतीय राज्य की भौगोलिक एवं क्षेत्रीय विशेषताओं की प्रकृति को नए सिरे से समझना होगा। सत्तारूढ़ कुलीन वर्ग को ईमानदारी से आत्ममंथन करना होगा कि गलती कहां और कैसे हुई है?

हमें लगातार यह बात ध्यान में रखनी होगी कि हिमालयी पर्वतीय शृंखला बहुत नाजुक और किसी भी जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील है। ऐसे में बेसमझी भरी मानवीय छेड़छाड़ यहां के पर्यावरण को बहुत नुक्सान पहुंचा सकती है। इस क्षेत्र में बिना सोचे-समझे स्थापित की जा रही परियोजनाएं भूकम्प, चट्टानों के फटने और पहाडियां खिसकने जैसी आपदाओं को जन्म दे सकती हैं। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि 70 जल विद्युत परियोजनाएं, जिनमें से 37 चट्टानें खिसकने वाले क्षेत्र में स्थित हैं, पर्वतीय ढलानों को अस्थिर करने के लिए जिम्मेदार हैं।

Picture23हमें भावनाओं को एक तरफ रख कर विपदा और इसके प्रभावों का विश्लेषण करना होगा। सबसे पहली बात यह है कि नदियों की तलहटियों पर अंधाधुंध अतिक्रमण के परिणाम बहुत भयावह हैं। दूसरी बात, निहित स्वार्थों द्वारा व्यापक स्तर पर जंगलों की कटाई का इस पर्वतीय क्षेत्र को भारी मोल चुकाना पड़ा है। विकास के नाम पर पैसा कमाने के बेलगाम लालच ने इस स्थिति को जन्म दिया है।

तीसरी बात यह कि भागीरथी और अलकनंदा नदियों पर बिना सोचे-समझे कुकरमुतों की तरह ढांचागत एवं जल विद्युत परियोजनाएं स्थापित होने से पहाड़ों को पहुंचने वाले नुक्सान में वृद्धि ही हुई है जिसके परिणामस्वरूप आने वाली अचानक बाढ़ से हजारों लोगों की जान गई है और उनके घर-बार एवं रोजी-रोटी के संसाधन हजारों-लाखों टन मलबे के नीचे दब गए हैं।

उल्लेखनीय है कि जिस ‘कैग’ को बदनाम करने का सरकार ने कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया, उसने केन्द्र और उत्तराखंड सरकार को 3 वर्ष पूर्व प्रस्तुत की गई अपनी पर्यावरण आकलन रिपोर्ट में अधिकारियों को अंधाधुंध विकास की आंधी के बारे में गम्भीर नतीजों की चेतावनी दी थी।

हमारे राजनीतिज्ञों की समस्या यह है कि वे सत्ता में हों या सत्ता से बाहर हों, उनकी निगाहें सदा ही अधिक से अधिक शक्ति और पैसा बटोरने पर टिकी रहती हैं। ऐसा करने के लिए वे लोगों को खुशहाली के सपने दिखाते हैं परन्तु इसके एवज में लोगों के पल्ले तबाही ही पड़ती है। जब तक हम भ्रष्टाचार पर प्रभावी ढंग से रोक नहीं लगाते और जनता को बेहतर तथा जवाबदेह गवर्नैंस की पारदर्शी प्रणाली उपलब्ध नहीं करवाते, यह कुचक्र बार-बार चलता रहेगा।

Flood Relief in Utrakhand18विनाशलीला से उचित सबक ग्रहण करते हुए मैं पुनर्निर्माण और पुनर्वास के सबसे जरूरी मुद्दे पर आता हूं। इस पर्वतीय राज्य, इसके स्थानीय वासियों और लाखों की संख्या में आने वाले मौसमी पर्यटकों व तीर्थयात्रियों का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि अधिकारी दरपेश समस्याओं का क्या हल पेश करते हैं?

मैं सावधानी के तौर पर यह कहना चाहूंगा कि कुछ भी ऐसा न किया जाए कि 16-17 जून की भयावह घटनाओं की पुनरावृत्ति हो। आवासों और कारोबारों के लिए अब अधिक ऊंची और सुरक्षित जगह तलाश की जानी चाहिए। यह पूरी कवायद प्रोफैशनल लोगों द्वारा अंजाम दी जानी चाहिए जिनकी सहायता के लिए विभिन्न क्षेत्रों से ऐसे लोग उपलब्ध करवाए जाएं जिनके पास विशेषज्ञता के साथ-साथ सामान्य बुद्धि (कॉमन सैंस) भी हो।

हमें बिल्डरों और उनके राजनीतिक व नौकरशाह सहयोगियों की लालसा के प्रति भी आगाह रहना होगा जो मानवीय त्रासदी में भी अपना उल्लू सीधा करने से बाज नहीं आते।

हरि जयसिंह

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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