Home Uncategorized कार्बेट ने फिर बढ़ाया उत्तराखंड का मान
Uncategorized

कार्बेट ने फिर बढ़ाया उत्तराखंड का मान

हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून

विश्व बाघ दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाघों की गणना की रिपोर्ट जारी की। इस बार बाघों की आबादी में 33 फीसदी का इजाफा हुआ है। सेंट पीटर्सबर्ग डिक्लरेशन के अनुसारये लक्ष्य वर्ष 2022 में हासिल किया जाना था लेकिन भारत ने समयसीमा से पहले हासिल कर लिया है।

वर्ष 2006 में 1,411 बाघ की चिंताओं के साथ जो लक्ष्य शुरू हुआ था वो वर्ष 2014 में 2,226 और वर्ष 2018 में 2,967 के साथ पूरा हुआ है। बाघों की आबादी के लिहाज से आंकड़ों में ये बढ़त अच्छी कही जा सकती है। ये आंकड़े बताते हैं कि हम अपने जंगल में बाघों के लिए अच्छा माहौल देने में कामयाब रहे हैं। 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाघों की गणना की ये रिपोर्ट जारी की। पिछली संख्या की तुलना में इस बार बाघों की आबादी में 33 फीसदी का इजाफा हुआ है। सेंट पीटर्सबर्ग डिक्लरेशन के अनुसार ( लास्ट बेस्ट होप फॉर टाइगर्स) ये लक्ष्य वर्ष 2022 में हासिल करना था। जिसे हमने समय सीमा से पहले हासिल कर लिया है। वर्ष 2006 से 2010 के बीच बाघों की आबादी में 21 प्रतिशत  इजाफा हुआ था और वर्ष 2010 से 2014 के बीच 30 फीसदी। यहां मध्य प्रदेश 526 बाघों के साथ अव्वल रहा, जबकि 524 बाघों के साथ कर्नाटक दूसर नंबर पर और 442 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे स्थान पर रहा।

इस गणना के लिए 44 हज़ार फील्ड स्टाफ ने बाघों की मौजूदगी वाले 20 राज्यों में करीब 3,18,000 बाघों के निवास का सर्वेक्षण किया। जो करीब 381,400 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसे विश्व में सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण माना जा रहा है। इसके साथ ही 139 अध्ययन स्थलों के 26,760 लोकेशन पर कैमरा ट्रैप लगाए गए। जिससे करीब 35 मिलियन तस्वीरें हासिल हुईं। जिसमें 76,523 तस्वीरें बाघों की और 51,337 तस्वीरें गुलदार की थी। रिपोर्ट में बताया गया कि कैमरा ट्रैप में 86 प्रतिशत बाघों के क्षेत्र को कवर किया गया।  इस रिपोर्ट में जो चिंता की बात थी, वो ये कि बाघों के इलाकों में वर्ष 2014 की तुलना में 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। यानी बाघों की संख्या तो बढ़ी लेकिन उनके रहने का इलाका संकुचित हो गया।

शीर्ष टाइगर रिजर्व में शामिल कार्बेट

कार्बेट टाइगर रिजर्व ने इस बार भी उत्तराखंड का मान बढ़ाया। वन्य जीव संरक्षण के लिए की जाने वाली मीटर (मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवोल्यूशन ऑफ टाइगर रिजर्व) रैकिंग में कार्बेट को टॉप रैंक मिली है। इसे दूसरे टाइगर रिजर्व के साथ ही सबसे व्यवस्थित टाइगर रिजर्व में शामिल किया गया है। देश के 50 टाइगर रिजर्व में वन्य जीवों के संरक्षण, सुरक्षा, भोजन की उपलब्धता, पेट्रोलिंग और अन्य बिंदुओं के आधार पर ये रैंकिंग तय की गई है। लेकिन राष्ट्रीय बाघ संरक्षण आयोग ने राजाजी टाइगर रिजर्व को नीची श्रेणी में रखा है, उसे 49 वां स्थान मिला है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व78.91 प्रतिशत रेंटिंग के साथ सबसे बेहतर टाइगर रिजर्व में शामिल हुआ। जबकि देहरादून-हरिद्वार के बीच फैले राजाजी टाइगर रिजर्व को 44.53 प्रतिशत रेंटिंग के साथ 49वें स्थान पर जगह मिली है।

शीर्ष टाइगर रिजर्व, राज्य और रेटिंग प्रतिशत

पेंच, मध्यप्रदेश 93.75
पेरियार, केरल 93.75
कान्हा, मध्यप्रदेश 92.97
सतपुड़ा, मध्यप्रदेश 90.63
अनामलाई, तमिलनाडु 89.06
बांदीपुर, कर्नाटक 87.50
पारामबिकुलम, केरल 86.72
दानदेली, कर्नाटक 84.38
नागरहोल, कर्नाटक 81.25
पन्ना, मध्यप्रदेश 80.47
सत्यममंगलम, तमिलनाडु 79.69
जिमकॉर्बेट, उत्तराखंड 78.91
तडोबा, महाराष्ट्र 77.34
पेंच, महाराष्ट्र 76.56
काजीरंगा, असम 76.56
मेलघाट, महाराष्ट्र 75.98

बाघों की गणना की इस रिपोर्ट पर ऑपरेशन आई ऑफ द टाइगर संस्था से जुड़े और वन्य जीव विशेषज्ञ  राजीव मेहता कहते हैं कि बाघों का सुरक्षित ठिकाना होना कार्बेट के लिए ये एक बड़ी उपलब्धि है। कार्बेट टाइगर रिजर्व इससे पहले भी वन्य जीव संरक्षण में बेहतर प्रदर्शन करता रहा है। बाघों की संख्या बढ़ने पर उनका कहना है कि इससे पहले राजाजी पार्क, लैंसडोन वन प्रभाग और कार्बेट पार्क में ही कैमरा ट्रैप लगाए जाते थे। इसके साथ ही कम कैमरे भी इस्तेमाल होते थे। वे बताते हैं कि वर्ष 2016-17 तक भी बाघों की गिनती के लिए कम कैमरे इस्तेमाल किए गये।

राजीव मेहता के मुताबिक बाघों की अधिक संख्या इसलिए भी अधिक दिखाई दे रही है क्योंकि इस बार रामनगर डिवीजन, हल्द्वानी डिवीजन, नंधौर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी जैसे क्षेत्रों में भी बाघों की गिनती के लिए कैमरे लगाए गए। इससे पहले इन जगहों पर कैमरा ट्रैपिंग नहीं की गई थी। इसके साथ ही पहले की तुलना में अधिक समय तक और अधिक कैमरे का भी प्रयोग किया गया। पहले एक जगह में 15 दिन कैमरा लगाते थे। लेकिन इस बार अब ज्यादा दिनों तक भी कैमरे लगाए गए और ज्यादा लैंडस्केप कवर किया गया।

इसके साथ ही इस बार एक वर्ष के उपर के बाघों को भी गिनती में शामिल किया गया है। जबकि इससे पहले डेढ़ साल या उससे अधिक उम्र के नर बाघ और दो साल या उससे अधिक की उम्र की मादा बाघ को शामिल किया जाता था।

बिखरे हुए वनक्षेत्र को संरक्षित करने की जरूरत

बाघों पर कार्य करने वाले वन्य जीव विशेषज्ञ राजीव मेहता के मुताबिक एक जंगल से दूसरे जंगल को जोड़ने वाले फ्रेगमेंटेड यानी बिखरे हुए क्षेत्र को भी संरक्षित करना चाहिए। जिसे वन्यजीव अपनी आवाजाही के लिए इस्तेमाल करते हैं। इन जंगहों को वन्यजीवों के लिए सुरक्षित नहीं किया जाएगा तो इससे उनका एक जंगल से दूसरे जंगल जाना मुश्किल हो जाएगा और फिर बाघों के रहने के क्षेत्र भी संकुचित हो जाएगा।

वे कहते हैं कि लैंसडोन डिवीजन कॉर्बेट और राजाजी को जोड़ने के लिहाज से काफी अहम है। यदि हम लैंसडोन का संरक्षण नहीं करेंगे तो कार्बेट के वन्यजीव राजाजी की ओर या राजाजी के वन्यजीव कार्बेट की ओर नहीं आ जा सकेंगे।

बाघों का निवास ज्यादातर यमुना, शारदा, राजाजी, कार्बेट, सितारगंज, खटीमा तक है। यहां सभी बॉटल नेक्स चाहे वो हल्द्वानी का हो, सुरई रेंज का हो, रामनगर डिवीजन हो, लैंसडोन डिवीजन हो, इन सभी को संभालना होगा। साथ ही कार्बेट लैंडस्केप की तर्ज पर राजाजी लैंडस्केप को भी बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए उत्तर प्रदेश के सहारनपुर डिवीजन के साथ मिलकर काम करना होगा, जो राजाजी से जुड़ता है। साथ ही सहारनपुर के जंगल यमुना के किनारे-किनारे हरियाणा के कलेसर में भी जुड़ते हैं। तो यदि राजाजी पार्क के पूर्व और पश्चिम छोर पर कार्य करें और उनके बॉटल नेक्स एरिया को संरक्षित करें, यहां नए कॉरीडोर बनाएं, तो हमें बाघों के लिए जगह कम नहीं पड़ेगी।

राजाजी टाइगर रिजर्व को क्यों नहीं मिली अच्छी रैंकिंग

राजाजी टाइगर रिजर्व को एनटीसीए ने सबसे खराब टाइगर रिजर्व में शुमार किया गया है। इस पर राजीव मेहता का कहना है कि ये रैकिंग राजाजी के मौजूदा प्रदर्शन को लेकर नहीं दी गई है बल्कि पिछले 4-5 प्रदर्शन के आधार पर दी गई है। कुछ ही महीने पहले राज्य में नए वाइल्ड लाइफ वॉर्डन की नियुक्ति हुई है। इसके साथ ही राजाजी के डायरेक्टर ने भी कुछ ही महीनों पहले जिम्मा संभाला है।

पार्क से जुड़े इससे पहले के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं। वन विभाग ने भी उन पर विभागीय जांच बिठाई थी। भ्रष्टाचार की वजह से राजाजी को बेहतर बनाने पर कार्य नहीं किया जा सका।

राजाजी पार्क को लेकर एनटीसीए ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पार्क में अधिकारी या कर्मचारियों को विश्वास में नहीं लिया गया। पेट्रोलिंग ठीक से नहीं हुई। यही वजह है कि राजाजी की रेटिंग बहुत अच्छी नहीं आई। यहां ये भी ध्यान रखना होगा कि राजाजी वर्ष 2013 में टाइगर रिजर्व बना है। इस लिहाज से ये काफी नया भी है।

क्या मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ेगा

जुलाई महीने में पीलीभीत में ग्रामीणों ने एक बाघिन को डंडे से पीट-पीटकर मार डाला था। वो तस्वीरें परेशान करने वाली थीं। राजीव मेहता कहते हैं कि बाघों की आबादी इंसानों के लिए खतरा नहीं है बल्कि इंसानों की बढ़ती आबादी वन्यजीवों के लिए खतरा है। उत्तराखंड में भी कार्बेट पार्क की तरफ मानव-वन्यजीव संघर्ष उतना नहीं है, जितना राजाजी पार्क की तरफ है। राजाजी पार्क के अंदर से हाईवे भी गुज़रते हैं। नज़दीक ही रेलवे लाइन भी है। राजाजी के नजदीक बसे गांव के लोग अब भी जंगल से लकड़ियां लेने या मवेशी चराने जाते हैं। जुलाई में ही रायवाला क्षेत्र में जंगल में मवेशी चराने गई एक महिला को गुलदार ने मार डाला।

इसके लिए जंगल के अंदर मानवीय आवाजाही और हस्तक्षेप कम करना होगा। जंगल वन्य जीवों के लिए संरक्षित क्षेत्र में आता है। जहां जाना दंडनीय अपराध है। लोगों को ये समझना होगा कि वे वन्यजीवों के घर में बिना इजाजत दाखिल हो रहे हैं। फिर जब कोई जंगली हमला करता है तो लोग उसे नरभक्षी घोषित करने की मांग करने लग जाते हैं।

फिलहाल बाघों की बढ़ी आबादी के साथ अब उनके लिए जगह कम न पड़े, इसकी चिंता करनी होगी। कार्बेट टाइगर रिजर्व को अपनी श्रेष्ठता बचाए रखने के लिए कार्य करना होगा तो राजाजी टाइगर रिजर्व के सामने अभी कड़ी चुनौती है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

HillMail Magazine – September 2026

HillMail Sep 2026
पत्रिकाओं के सभी अंक देखें

Related Articles

पहाड़ पर रेल टैªक का पहला पड़ाव करीब

2020  की शुरुआत में न्यू ऋषिकेश रेलवे स्टेशन अस्तित्व में आ जाएगा।...

शिक्षा में बदलाव की बयार है…

शिक्षक भविष्य निर्माण करता है। यह बात जितनी सहज है, उतना ही...

वृक्षारोपण का नया अवतार ‘बीजबम’

बीजबम को खुले में फेंक दिया जाता है, जो स्वतः ही पौध...

सूख रही गंगा-यमुना की ‘लाइफलाइन’

उत्तराखंड विधानसभा में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण में आ...