Friday , 4 September 2026
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कन्या भ्रूण हत्या पर गलत पेश की गई उत्तराखंड की तस्वीर

उत्तराखंड की बेटियां एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने का माद्दा रखती हैं। मुश्किल आन पड़ने पर यहां की बेटी अपनों को बचाने की खातिर जंगली गुलदार से भिड़ जाती है। अगस्त के दूसरे हफ्ते का पहला दिन था। जब देहरादून में बहादुर बेटियों को तीलू रौतेली पुरस्कार दिया जा रहा था। गुलदार से भिड़कर अपनी सास को बचाने वाली अल्मोड़ा की गीता जोशी हो या एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली रुद्रप्रयाग की नूतन वशिष्ठ। इन बेटियों को देख आंखों में विजय की चमक थी। इन्होंने सिर्फ अपने मां-बाप का नाम ही नहीं रोशन किया बल्कि पूरे राज्य का नाम रोशन किया है।

कुछ समय पहले उत्तरकाशी के 133 गांवों में बेटियों के जन्म न होने की खबरें परेशान कर रही थीं। समीक्षा बैठक के लिए तैयार की गई आशा कार्यकर्ताओं की इस रिपोर्ट पर देहरादून तक अचंभा छा गया। इस रिपोर्ट को सत्यापित करने के लिए महिला और बाल विकास विभाग ने आंगनबाड़ी केंद्रों के ज़रिये इन गांवों का दोबारा सर्वेक्षण कराया। जिसमें ये पाया गया कि इन गांवों में इस अवधि में 62 लड़कियां भी पैदा हुईं। ये सर्वेक्षण राज्य की महिला सशक्तिकरण और बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के निर्देश पर कराया गया। महिला सशक्तिकरण मंत्री रेखा आर्य ने सभी 133 गांवों में संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों से पिछले तीन महीनों में जन्मे बच्चों का सर्वेक्षण कराने के निर्देश दिए थे।

उत्तरकाशी के जिला कार्यक्रम अधिकारी विक्रम सिंह ने मंत्री को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा कि जिले के छह विकास खंडों में स्थित इन 133 गांवों में संचालित 158 आंगनबाड़ी केंद्रों में पिछले तीन महीने में कुल 222 बच्चे पैदा हुए। जिनमें से 160 लड़के और 62 लड़कियां हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भटवाड़ी और डुंडा विकास खंड में इस अवधि में 12-12 लड़कियां, चिन्यालीसौड में आठ, नौगांव में 19, पुरोला में दो और मोरी में नौ लड़कियां पैदा हुईं। ताजा सर्वेक्षण के नतीजे सामने आने के बाद मंत्री रेखा ने कन्या भ्रूण हत्या की आशंका को भी नकार दिया। उन्होंने कहा, ‘‘इन विकास खंडों में कन्या भ्रूण हत्या की आशंका भी निराधार साबित हुई है क्योंकि वहां बालिकाओं ने भी जन्म लिया।’’ हालांकि उन्होंने कहा कि सरकार इस मामले की तह तक जाने के लिए अपनी जांच जारी रखेगी और ये पता लगाने का प्रयास करेगी कि इन विकासखंडों में पिछले तीन महीने में लिंगानुपात इतना कम क्यों रहा।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी जन्मदर के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019-20 में अप्रैल से जून महीने तक संस्थागत और घरेलू प्रसव में 133 गांवों में 216 लड़के जन्मे। वहीं भटवाड़ी, पुरोला, मोरी, चिन्याली, नौगांव, डूंडा ब्लॉक के 129 गांवों में इसी अवधि के दौरान 180 लड़कियों ने जन्म लिया। इन गांवों में एक भी लड़के का जन्म नहीं हुआ है। इसके साथ ही 163 गांव ऐसे हैं जहां लड़के और लड़कियों दोनों का जन्म हुआ है। इसमें 280 लड़के और 259 लड़कियां शामिल हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018-19 में उत्तरकाशी में कुल 4,166 प्रसव हुए। इनमे 2,210 लड़के और 1,956 लड़कियों ने जन्म लिया।

महिला एवं बाल विकास के उत्तरकाशी में जिला कार्यक्रम अधिकारी विक्रम सिंह कहते हैं कि इन 133 गांवों में से 78 गांव ऐसे हैं, जहां पिछले तीन महीने में सिर्फ एक ही बच्चा पैदा हुआ है, जो लड़का है। 37 गांव ऐसे है जहां 2 बच्चे पैदा हुए हैं, दोनों लड़के पैदा हुए। उनके मुताबिक स्वास्थ्य विभाग भी ये मान रहा है कि ऐसा प्राकृतिक तौर पर हुआ है। इसमें कुछ भी अप्राकृतिक नहीं है। जबकि 17 गांव ऐसे हैं जहां तीन, चार या अधिकतम पांच बच्चे पैदा हुए हैं, ये सभी लड़के हैं। विक्रम सिंह कहते हैं कि इन गांवों में जांच कराई जा रही है कि ऐसा क्यों हुआ।

उत्तरकाशी के एडिशनल सीएमओ डॉ श्रीश रावत का कहना है कि 133 गांवों में बेटी पैदा न होने की रिपोर्ट मीडिया में आ गई लेकिन इसी दौरान 129 गांवों में सिर्फ 180 लड़कियों का जन्म और एक भी लड़के के जन्म न होने की रिपोर्ट सामने नहीं आई। उनके मुताबिक तीन महीने में पैदा हुए बच्चों के लिहाज से सही जन्मदर का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए सैंपल साइज बड़ा होना चाहिए, यानी कम से कम छह महीने या एक साल। फिर पहाड़ों पर बसे गांवों की आबादी भी अधिक नहीं होती। जिस आधार पर ये कह सकें। खबर लिखे जाने तक स्वास्थ्य विभाग भी अपनी पुरानी रिपोर्ट को सत्यापित करा रहा है। एडिशनल सीएमओ के मुताबिक खराब मौसम और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से जिले का सर्वेक्षण आसान नहीं।10 अगस्त को जनपद के सीएमओ डॉ. डीपी जोशी ने कहा कि इस सत्यापित रिपोर्ट के आने में अभी एक हफ्ते का समय और लगेगा।

लैंगिक अनुपात सुधारना होगा

हालांकि लैंगिक अनुपात में गिरावट राज्य सरकार के लिए चिंता का बड़ा कारण है। वर्ष 2011 की जनगणना आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में 6 वर्ष तक की उम्र के बच्चों का लैंगिक अनुपात प्रति हज़ार लड़कों पर 890 लड़कियां है। जबकि वर्ष 2001 में यह संख्या 908 थी। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013-15 के बीच उत्तराखंड का लैंगिक अनुपात प्रति हजार पुरुष पर 844 महिला का है। उत्तराखंड से पीछे 831 के आंकड़े के साथ सिर्फ हरियाणा था। नीति आयोग की रिपोर्ट ये भी कहती है कि राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर किए जाने की सख्त जरूरत है।

शिशु मृत्यु दर भी सुधारनी होगी

देश में उत्तराखंड ही एक मात्र राज्य है जहां शिशु मृत्यु दर में इजाफा हुआ है। इसकी प्रमुख वजह पहाड़ों पर डॉक्टरों का न होना है।जून महीने मे जारी नीति आयोग की रिपोर्ट ( हेल्दी स्टेट प्रोग्रेसिव इंडिया: रिपोर्ट्स ऑन रैंक्स ऑफ स्टेट्स एंड यूनियन टेरेटरी) के मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से उत्तराखंड 21 राज्यों की सूची में पिछले वर्ष के 15वें स्थान से फिसलकर 17वें स्थान पर आ गया है। इसकी मुख्य तौर पर तीन वजहें रहीं। पहला लिंगानुपात, दूसरा शिशु मृत्यु दर और तीसरा नवजात शिशु मृत्यु दर (एनएमआर) यानी प्रति हज़ार जीवित बच्चों के जन्म के बाद से 28 दिन के भीतर होने वाली मौत। 23 इंडिकेटर्स के आधार पर स्वास्थ्य तालिका की गई है। जिसमें उपर दिए गए तीन क्षेत्रों में खराब प्रदर्शन की वजह से राज्य की रैंकिंग बिगड़ी है। सभी बड़े राज्यों में वर्ष 2015-16 के अंतराल में एनएमआर में सुधार हुआ है, जबकि सिर्फ उत्तराखंड में ये 28 से बढ़कर 32 हो गया है। इस श्रेणी में उत्तराखंड को 18वां स्थान मिला है।

इस रिपोर्ट में आधार वर्ष (2015-16) के 45.22 अंकों की तुलना में रेफरेंस इयर (2017-18) में 40.22 अंक हासिल किए। इस आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं में प्रदर्शन में सुधार के लिहाज से राज्य को 19वां स्थान दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तकरीबन सभी इंडीकेटर में राज्य का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। इस रिपोर्ट के मुताबिक लिंगानुपात में राज्य को 19वां स्थान मिला है।

सक्रिय हुआ स्वास्थ्य महकमा

उत्तरकाशी की रिपोर्ट के बाद स्वास्थ्य महकमा सजग हुआ है। इस समय राज्य में बाल जनगणना कराई जा रही है। इससे पहले पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा में गिरते लिंगानुपात को लेकर चिंताएं थीं। लेकिन वहां लगातार जागरुकता अभियान चलाने के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है। अब उत्तरकाशी समेत अन्य जिलों में लिंगानुपात और कन्या भ्रूण हत्या को लेकर जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

वो राज्य जहां की आर्थिकी महिलाओं के हाथ में है। खेत हो या जंगल, जहां महिलाएं निर्णायक भूमिकाओं में हैं। जहां राज्यपाल महिला है, नेता प्रतिपक्ष महिला है। पुलिस-प्रशासन में अहम पदों पर महिलाएं हैं। जो राज्य गंगा-यमुना का मायका हैं, वहां बेटियों के जन्म पर गर्व होना चाहिए, उत्सव होना चाहिए। ये तय है कि राज्य में लैंगिक समानता की दिशा में प्रयास करने होंगे।

‘डाली लगावा-बेटी बचावा’ अभियान

उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के लिए राज्य सरकार ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ मुहिम के साथ एक नया आयाम जोड़ दिया है। अब राज्य में बेटियों को बचाने और पढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण बचाने का भी संदेश दिया जाएगा। इसकी शुरुआत सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पौड़ी के रांसी से की थी। गढ़वाल कमिश्नरी के 50 साल पूरे होने के अवसर पर सीएम त्रिवेंद्र रावत ने रांसी में पौधरोपण किया। ‘डाली लगावा, बेटी बचावा’ योजना के तहत इन पौधों का नाम नवजात बालिकाओं के नाम पर रखा जाएगा। इन पौधों की देखभाल बालिकाओं की माताओं द्वारा की जाएगी।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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