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वृक्षारोपण का नया अवतार ‘बीजबम’

बीजबम को खुले में फेंक दिया जाता है, जो स्वतः ही पौध के रूप में तैयार हो जाता है। इस प्रक्रिया ने अब तक दो लाख पौध तैयार किए हैं।इन पौधों के पीछे ना तो कोई बजट खर्च हुआ है। ना ही इन पौधो की कोई सीमा है।

प्रेम पंचोली

आमतौर पर जब बम का नाम आता है तो लोग दहशत में पड़ जाते है। आजकल तो उतराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भी एक बम की चर्चा तेज है। ‘बीजबम’ नाम लोगों की मुखजुबानी हो गया है। बीजबम कोई अजूबा नहीं है। यह एक प्रकार से वृक्षारोपण का नायाब तरीका है। अक्टूबर 2018में शुरू हुआ बीजबम अभियान दो लाख लोगो तक पंहुच चुका है। 200 स्थानों पर बीजबम गिरने की वजह से लगभग तीन लाख नर्सरी पौध तैयार हो चुकी है। इस बात का प्रमाण यह है कि अकेले उतरकाशी जिले के कमद इंटरमीडिएट कालेज के 200 छात्रों ने अंयारखाल और बूढ़ाकेदार के जंगलो में बीजबम छोड़े थे, जो उस क्षेत्र में नर्सरी पौध के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

‘बीजबम’ मौजूदा समय की मांग बन गई है। वन विभाग और अन्य संस्थान बीजबम अभियान को वृक्षारोपण के विकल्प के तौर हाथोंहाथ ले रहे है। उतराखंड राज्य की राज्यपाल बेबीरानी मौर्य भी बीजबम अभियान की सराहना कर चुकी हैं। वह कहती हैं कि वृक्षारोपण को अब इस नए प्रयोग के हिसाब से करना होगा। उत्तराखंड के मुख्य सचिव उत्पलकुमार भी अधिकारियों को कह चुके हैं कि बीजबम का कॉन्सेप्ट ज्यादा टिकाऊ लग रहा है। भविष्य में वृक्षारोपण को बीजबम के हिसाब से करना होगा। इधर बीजबम के जनक द्वारिका प्रसाद सेमवाल अब अभियान को देशव्यापी बनाने की तैयारी कर रहे हैं। वे बताते हैं कि 25 जुलाई से वह ‘बीजबम पखवाड़ा’ मनाने जा रहे हैं। इस अभियान से सरकारी एंव गैर सरकारी संस्थान सीधे तौर पर जुड़ रहे हैं। इनमें प्रमुख तौर पर आईआईटी रूड़की, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर, एसएसबी प्रशिक्षण केंद्र श्रीनगर, ग्राम विकास विभाग समेत अनेक संगठन इससे जुड़ रहे हैं। ये संगठन बीजबम को बनाएंगे भी और अपने आसपास के स्थानों पर छोड़ेंगे भी। अनुमान लगाया जा रहा है कि बीजबम पखवाड़े के दौरान अकेले उत्तराखंड में 1000 हजार स्थानों पर यह कार्यक्रम होगा।

बीजबम की खास बात यह है कि यह स्थानीय फलदार बीजो का ही संग्रहण है। जिसमें अमूमन चूलू, खुबानी, मेहल, सहतूत, गुरियाल/कचनार, जैसे फलदार बीज हैं तो दूसरी तरफ कद्दू, लौकी, चौलाई व मंडुवा भी है। ये स्थानीय बीज एक तो आसानी से प्राप्त हो जाते हैं और दूसरी तरफ स्थानीय जंगल व अन्य स्थानों पर उगने में आसनी हो जाती है। बताया जाता है कि यदि इन बीजो से पौध तैयार हो जाती है तो वह ज्यादा समय तक जीवित रहती है। जबकि रोपित पौधे की उम्र इसके आधे में मापी गई है। इस लिहाज से वृक्षारोपण के इस वैकल्पिक कार्यक्रम से लोग स्व-स्फूर्त जुड़ रहे हैं। आईआईटी रूड़की ने तो बाकायदा अपने कैंपस में बीजबम की कार्यशाला आरंभ की है।

इधर बीजबम अभियान का मानना है कि वृक्षारोपण में धन और जन की मूल आवश्यकता होती है। पहले गड्ढा बनाओ, उसके तुरंत बाद वृक्षों हेतु नर्सरी का चयन करो, फिर पौध का रोपण करो तत्पश्चात पौध रोपो, इसके बाद पौध जीवित है कि नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जबकि बीजबम को एक बार में ही जंगल में खुले ही छोड़ दो, और अगले वर्ष इसकी पौध तैयार हो जाती है। जहां पर पौधो की संख्या घनी है वहां से जिसको जरूरत है वह पौध उखाड़कर दूसरी जगह रोपित कर सकता है। यानि शून्य बजट और स्व-स्फूर्त कार्यक्रम। बीजबम अभियान को अभी 10 माह का ही समय हुआ है। यथा इस इभियान की आवश्यकता बहुत ही महसूस होने लग गई है। यह इस बात की तस्दीक है कि बीजबम के जनक द्वारिका प्रसाद सेमवाल को उत्तराखंड वन विभाग के प्रमुख वन संरक्षक जयराज ने भी बीजबम पखवाड़े में नैतिक सहयोग देने की स्वीकृति दे दी है।

क्या है बीजबम

बीजबम वृक्षारोपण का दूसरा रूप है। जिसे खुले में फेंक दिया जाता है जो स्वतः ही पौध के रूप में तैयार हो जाता है। इस प्रक्रिया ने अब तक दो लाख पौध तैयार किए हैं। इन पौधों के पीछे ना तो कोई बजट खर्च हुआ है। ना ही इन पौधो के पैदा होने की कोई सीमा बनी है। यानि बिना बजट के असीमित वृक्षारोपण।

कैसे बनता है बीजबम

मिट्टी और कम्पोष्ट या इसके साथ गोबर को मिलाकर आटे के जैसे गूंथ लेते है। फिर इसके गोले बनाए जाते हैं और इसके अंदर किसी भी फलदार या जंगली फलदार पौधों या अन्य फल-फूलों, सब्जियों के तीन-चार बीजों को रख दिया जाता है। जिसे छांव में सुखाते है क्योंकि धूप में सुखाने से बीजबम की नमी में कमी आती है। इस तरह से बीजबम तैयार किया जाता है। अब इन बीजबम के गोलों को जंगल में उड़ेल दिया जाता है।

बीजबम के जनक

इन दिनों सीमांत जनपद उत्तरकाशी के द्वारिका प्रसाद सेमवाल बीजबम के जनक कहलाए जाने लगे है। दरअसल पहली बार द्वारिका ने इस अभियान की शुरूआत उत्तरकाशी के ही कमद इंटर कालेज से की। इस दौरान कालेज के 200 छात्रों ने इस अभियान में हिस्सा लिया है। द्वारिका बताते हैं कि उन्होंने राज्यभर में कई यात्राएं की है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक साइकिल यात्रा भी की है। इस दौरान उन्होंने हजारों गांवो के ग्रामीणों से वार्ता की है। ग्रामीणों का एक ही जबाव था कि उनकी फसल जंगली पशु की भेंट चढ रही है। ये जानवर बसाहट की तरफ आ रहे हैं, जिससे खतरा बढ़ रहा है। उन्हें सुझा कि जंगल में जंगली पशुओं का भोजन खत्म हुआ है, मांसहारी पशु भी गांव की तरफ इसलिए आ रहे हैं कि उन्हे जंगल में वे छोटे पशु नहीं मिल रहे हैं जिन्हें वे शिकार बनाते थे। अर्थात आवश्यकता के जंगल कम हो रहे हैं। इसलिए उन्होंने बीजबम का कान्सेप्ट एक अभियान के तौर पर लिया। इस बीजबम में वे ऐसे बीजो को डालते हैं जो पर्यावरण के लिहाज से भी फलीभूत हों, और इससे विकसित होने वाला जंगल जैवविधिता का भी संरक्षण कर सके। इतना ही नहीं द्वारिका हिमालयन पर्यावरण जड़ी-बूटी एग्रो संस्था के संस्थापक है। उन्होंने संस्थान के माध्यम से गंगोत्री और यमनोत्री धामों में स्थानीय उत्पादों से प्रसाद तैयार किया है, जो देश-दुनिया में लोगों तक पंहुच रहा है। इसके नीमित भी सैकड़ो महिलाऐं स्वरोजगार से जुड़ चुकी है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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