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सेना पर अधिकतर मानवाधिकार के मामले झूठे

Indian Contingent marches aheadभारतीय सेना ने देश के लिए कई युद्ध लड़े हैं इसके अलावा विद्रोह, आतंकवाद और प्राकृतिक आपदा में सेना और अर्द्धसैनिक बलों का अहम योगदान रहा है। जब से देश आजाद हुआ तब से सशस्त्र सेनाएं देश का अंतिम सहारा रही हैं। सशस्त्र सेनाओं ने देश की प्रादेशिक अखंडता और प्रभुसत्ता की रक्षा करने के साथ-साथ शांति तथा सद्भाव बनाए रखने के लिए प्रशासन की मदद करने की जिम्मेदारी स्वीकार की है। इसलिए, चाहे शांति हो या युद्ध काल, सभी प्रकार के आपरेशनों में देश के भीतर असामाजिक तत्वों से निपटना और साथ ही मानवाधिकारों के सिद्धांतों को सर्वोपरि मानना, सशस्त्र सेनाओं का दायित्व है। इतने बड़े देश और इतनी बड़ी सेना में, अपवादों का होना स्वाभाविक है, क्योंकि सैनिक समाज से ही भर्ती होता है।

पिछले कुछ सालों से जम्मू कश्मीर और उत्तरपूर्वी राज्यों में फर्जी मुठभेडों के कारण आरोपों से घिरी सेना और अर्द्धसैनिक बलों के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने बड़ी राहत दी है। आयोग का कहना है कि कई राज्यों में होने वाली फर्जी मुठभेड़ों के लिए सेना से ज्यादा पुलिस जिम्मेदार होती है। पिछले कई सालों से जम्मू कश्मीर और मणिपुर के कई हिस्सों से अफस्पा (सशस्त्र बल विशेष शक्तियां कानून) हटाने की मांग होती रही है। आयोग के सदस्य सत्यब्रत पाल ने कहा, ‘‘अफस्पा के कारण बड़े पैमाने पर नाराजगी पैदा हुई है और यह धारणा है कि इसे वापस लेने, संशोधित करने से फर्जी मुठभेड़ों पर अंकुश लगेगा। लेकिन हमारी जांच में उभरकर आया है कि इस प्रकार की हत्याएं बड़े पैमाने पर राज्यों में पुलिस मुठभेड़ों में होती है और पुलिस को अपनी राज्य सरकारों का संरक्षण मिला होता है’’।

IMG_0840उन्होंने आगे कहा कि पुलिस बल को अनुशासित होना चाहिए और दोषी पुलिस अधिकारियों को दंड देकर ही इस प्रकार के मामलों में कमी लाई जा सकती है। सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का जायजा लेने और फर्जी मुठभेड़ों की शिकायतों को देखने के लिए एनएचआरसी ने हाल ही में कई राज्यों का दौरा किया जिसमें मणिपुर का दौरा भी शामिल था। आयोग ने यहां मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन पाया। पाल के अनुसार 2005 से 2010 के बीच हुई 44 फर्जी मुठभेड़ों की शिकायतों की जांच की, जिसमें पाया गया कि राज्य सरकार ने केवल तीन मामलों में वित्तीय सहायता दी। आयोग के अनुसार फर्जी मुठभेड़ के मामलों में असम और मणिपुर में हालत चिंताजनक है, बाकी अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में हालात सामान्य हैं।

पिछले 20 सालों में सैन्य कर्मियों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के आंकड़ो के विश्लेषण से पता चला है कि इनमें से 96.4 प्रतिशत मामले झूठे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में और मानवाधिकार, नागरिक अधिकार संगठनों और व्यक्तिगत शिकायतों के जरिए 1994 से 2012 के दौरान जम्मू-कश्मीर और उत्तरपूर्व तथा देश के अन्य हिस्सों में दर्ज कराए गए 1618 मामलों में से 1478 मामले पूरी तरह जांच के बाद झूठे या आधारहीन पाए गए। इनमें से अधिकांश – 1178 मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के माध्यम से आए हैं। 55 मामले सही पाए गए, 120 कर्मियों को दोषी पाया गया और उन्हें दंडित किया गया। जम्मू-कश्मीर में 999 और उत्तरपूर्व में 560 मामले दर्ज किए गए और शेष सेना की पश्चिमी कमान, दक्षिणी कमान, मध्य कमान और दक्षिण पश्चिमी कमान में आते हैं। केवल जम्मू-कश्मीर में ही 965 आरोप झूठे या आधारहीन पाए गए। उत्तरपूर्व में यह संख्या 560 थी, जिनसे पता चलता है कि शिकायतें, दुष्प्रचार आदि सोच बदलने के तरीके हैं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षा बलों को कमजोर करने और उनका मनोबल तोड़ने के लिए किया जाता है।

4विगत सालों से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और निजी चैनलों के जरिए दर्ज कराई जाने वाली शिकायतों में भी काफी कमी आई है, सबसे अधिक 79 शिकायतें 2009 में दर्ज हुईं। कुछ समय पहले न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने जम्मू-कश्मीर के अशांत इलाकों और उत्तरपूर्व में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के लागू होने पर चालू विवाद के संदर्भ में सिफारिशें की थीं। उसके बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उन इलाकों से यह अधिनियम हटाने को कहा था, जहां इन सालों में शांति स्थापित हो गई थी लेकिन जल्दी ही मुख्यमंत्री को हकीकत से दो-चार होना पड़ा। एएफएसपीए की मदद से काबू में लाई गई स्थिति, जल्दी ही आईएसआई के इशारे पर पंचायतों के सरपंचों की हत्याओं और उन्हें डराने-धमकाने के सिलसिले और नियंत्रण रेखा पर अचानक संघर्ष-विराम के उल्लंघनों के चलते बिगड़ गई। जिससे कि इस स्थिति को सुधारने में काफी मेहनत करनी पड़ी।

सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम, देश की एकता और अखंडता को कमजोर करने के, खास तौर से सीधे सैन्य टकराव में भारत से युद्ध जीतने में नाकाम रहने वाले पड़ोसी के प्रयासों का दृढ़तापूर्वक सामना करता है। उसके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले छद्म तरीकों और आतंकी चालों के असल स्वरूप – अघोषित युद्ध – को समझा जाना चाहिए और उनका उसी प्रकार सामना किया जाना चाहिए। लेकिन, बजाय इसके उन्हीं लोगों को बदनाम करने की प्रवृत्ति नज़र आ रही है, जिन पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है।

वाई एस बिष्ट

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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