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गढ़वाल हिमालय के जंगलों में पेड़ों की अगली पीढ़ी पर संकट, 41 प्रजातियों में सिर्फ 34.25% का अच्छा पुनर्जनन

गढ़वाल हिमालय के समशीतोष्ण जंगलों में पेड़ों की अगली पीढ़ी के अस्तित्व पर मानवीय गतिविधियों का असर पड़ रहा है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन में सामने आया है कि जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप और विभिन्न प्रकार के व्यवधान बढ़ने से पेड़ों के नवांकुर, पौध और प्रजातीय विविधता प्रभावित हो रही है। अध्ययन को 28 सितंबर को ‘डिस्कवर फारेस्ट्स’ में प्रकाशित किया गया है।

 

वनस्पति विभाग के शोधकर्ताओं ओम प्रकाश तिवारी और यशवंत सिंह राणा ने भागीरथी जलग्रहण क्षेत्र में 1500 से 3000 मीटर की ऊंचाई के बीच अध्ययन किया। उत्तरकाशी और टिहरी जिलों के 24 वन क्षेत्रों में 240 नमूना क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर पेड़, पौध और नवांकुर की स्थिति दर्ज की गई। इस दौरान 41 पेड़ प्रजातियों के पुनर्जनन का आकलन किया गया।

अध्ययन के अनुसार केवल 34.25 प्रतिशत प्रजातियों में अच्छा पुनर्जनन पाया गया। वहीं 22.60 प्रतिशत प्रजातियों में बिल्कुल पुनर्जनन नहीं मिला, जबकि 16.10 प्रतिशत में कमजोर पुनर्जनन दर्ज किया गया। करीब 14.73 प्रतिशत प्रजातियां नए क्षेत्रों में उभरती हुई मिलीं और 12.33 प्रतिशत में मध्यम स्तर का पुनर्जनन पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार जिन प्रजातियों के वयस्क पेड़ मौजूद हैं, लेकिन उनके नवांकुर और पौध नहीं मिल रहे हैं, उनके भविष्य में घटने या समाप्त होने का खतरा बढ़ सकता है।

मानवीय गतिविधियां बनीं बड़ी चुनौती

शोध में पेड़ों की कटाई, शाखाएं काटना, पशु चराई, पत्तियां और वन-बिछावन हटाना, जंगल की आग, लकड़ी के अस्थायी ढांचे और राल निकालने जैसी गतिविधियों को प्रमुख व्यवधान माना गया। कम ऊंचाई वाले तथा मानव बस्तियों के आसपास स्थित जंगलों में इनका दबाव अधिक पाया गया।

शोधकर्ताओं के मुताबिक चारा, ईंधन और लकड़ी के लिए जंगलों पर निर्भरता का सीधा असर बीज स्रोत और नई पौध पर पड़ सकता है। इससे पेड़ों की प्राकृतिक पुनर्जनन प्रक्रिया प्रभावित होती है और जंगलों की अगली पीढ़ी कमजोर हो सकती है।

कई हिमालयी प्रजातियों पर चिंता

अध्ययन में देवदार, हिमालयी नीला चीड़, बांज, अखरोट, हिमालयी यू समेत कई प्रजातियों में अलग-अलग क्षेत्रों में पुनर्जनन की कमी सामने आई। अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेप वाले एक वन क्षेत्र में हिमालयी सिल्वर फर के नवांकुर पूरी तरह अनुपस्थित मिले। इसके विपरीत ऊंचाई वाले और कम प्रभावित क्षेत्रों में इसी प्रजाति के 3200 नवांकुर तथा 1152 पौधे प्रति हेक्टेयर तक दर्ज किए गए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि वन संरक्षण के लिए केवल पौधरोपण पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि मौजूदा पेड़ पर्याप्त बीज पैदा कर रहे हैं, नवांकुर सुरक्षित रह रहे हैं और पौधे वयस्क पेड़ों में विकसित हो पा रहे हैं। कमजोर पुनर्जनन वाले क्षेत्रों में स्थानीय और उपयुक्त प्रजातियों की मदद से प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा देना जरूरी है।

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Hill Mail

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