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अल्मोड़ा से हल्द्वानी को जोड़ने वाला एनएच 109 क्वारब के पास लोगों के लिए खतरा बना हुआ है। लोग जान जोखिम में डालकर आवाजाही करने को मजबूर है। वहीं केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री अजय टम्टा ने क्वारब में बंद मार्ग के संबंध में वैकल्पिक मार्ग तलाशने के लिए स्थलीय निरीक्षण किया।
READ MOREसैनिक स्कूल घोड़ाखाल एक बार फिर देश भर के 33 सैनिक स्कूलों के बीच प्रतिष्ठित राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) लिखित परीक्षा में शीर्ष प्रदर्शन करने वाला स्कूल बनकर उभरा है।
READ MOREहीरा सिंह राणा उत्तराखंड लोक संगीत के महान संवाहक व रक्षक रहे हैं। उनके रचे गीतों में तरह तरह के भाव, रस, प्रतीक, विम्बों का प्रयोग हुआ। जो उन्हें आधुनिक संगीत संसार में एक महान गीत रचयिता और गायक की श्रेणी में रखने को काफी हैं।
READ MOREकुमाऊं की पर्वत श्रंखलाएं अपने आंचल में प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना छिपाए जहां पर्यटकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती हैं। वहीं इन पर्वत श्रंखलाओं ने ऐसे कवियों और वीर सपूतों को जन्म दिया है। जिनकी वीर गाथाएं आज भी घर घर बड़े बुजुर्ग नई पीढ़ी को बड़े उत्साह से सुनाया करते हैं।
READ MOREकिसी ने सच ही कहा है मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। हम बात कर रहे है महान क्रांतिकारी नर सिंह धानक और टीका सिंह कन्याल देश को आजाद कराने में प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीदों की कुर्बानी को भुलाया नहीं जा सकता। सालम के महान क्रांतिकारी नर सिंह धानक और टीका सिंह कन्याल ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
READ MOREमुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनपद अल्मोडा की तहसील जैंती के धामदेव में सालम क्रांति दिवस के अवसर पर शहीद स्मारक पर पुष्प चक्र अर्पित कर शहीद नर सिंह एवं टीका सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। स्वतंत्रता सेनानी नर सिंह और टीका सिंह ने अग्रेजो से लड़ते हुए 25 अगस्त 1942 को इस स्थान पर अपना बलिदान दिया था। उनकी बरसी पर हर साल धामदेव में सालम क्रांति दिवस मनाया जाता है।
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सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र द्वारा संस्था के संस्थापक तथा रंगमंच जगत के सुप्रसिद्ध संगीतकार स्व. मोहन उप्रेती के 98वें जन्मदिवस पर संस्था की 58 वर्षों की उपलब्धियों पर आधारित स्मारिका का लोकार्पण तथा उनके द्वारा गीत-नाट्यों और नाटकों का प्रभावशाली एवं मनमोहक मंचन किया गया।
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ऐपण बचपन से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों और पारिवारिक आयोजनों में घर की महिलाओं को पारंपरिक लाल गेरू और चावल के घोल से सुंदर आकृतियां बनाते देख उन्होंने इस कला को सीखा। समय के साथ उन्होंने इसे केवल पारंपरिक आंगन और चौकी तक सीमित न रखकर कैनवास, लकड़ी की प्लेट, दीवार सज्जा, उपहार सामग्री और कॉर्पोरेट गिफ्ट आइटम्स तक विस्तार दिया।
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