भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान हाल ही में तब चर्चा का केंद्र बन गए, जब वे 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर और अपनी मूल बटालियन 6/11 गोरखा राइफल्स के दौरे के दौरान कर्नल रैंक के बैज पहनकर नजर आए। देश के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी को इस रूप में देखना कई लोगों के लिए आश्चर्य का विषय था, लेकिन भारतीय सेना की परंपराओं को जानने वालों के लिए यह गौरव, अपनत्व और रेजिमेंटल संस्कृति का प्रतीक था।
दरअसल, जनरल अनिल चौहान 11 गोरखा राइफल्स के “रेजिमेंट के मानद कर्नल” हैं। भारतीय सेना में यह एक अत्यंत सम्मानजनक और प्रतिष्ठित औपचारिक पद माना जाता है, जो किसी विशिष्ट और गौरवशाली अधिकारी को उसकी रेजिमेंट के प्रति योगदान, नेतृत्व और विरासत के सम्मान में प्रदान किया जाता है। इसी पद की गरिमा के तहत उन्होंने कर्नल रैंक की इंसिग्निया धारण की।
भारतीय सेना की रेजिमेंटल व्यवस्था केवल सैन्य संगठन नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और परंपराओं की मजबूत नींव है। सेना में सैनिक अपनी रेजिमेंट को अपना दूसरा परिवार मानते हैं। यही कारण है कि “कर्नल ऑफ द रेजिमेंट” की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं होती, बल्कि वह रेजिमेंट की परंपराओं, गौरव, अनुशासन और सैनिकों के कल्याण का संरक्षक माना जाता है।
सेना के वरिष्ठ अधिकारियों और पूर्व सैनिकों के अनुसार, जब कोई शीर्ष अधिकारी अपनी रेजिमेंट के बीच कर्नल रैंक में पहुंचता है, तो वह सैनिकों और नेतृत्व के बीच की औपचारिक दूरी को कम करता है। सैनिक अपने वरिष्ठ अधिकारी को केवल एक कमांडर के रूप में नहीं, बल्कि अपने “रेजिमेंटल परिवार” के सदस्य के रूप में देखते हैं। यही भावना भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के अनुसार, “इस परंपरा का उद्देश्य सैनिकों में आत्मीयता और विश्वास को मजबूत करना है। जब जवान अपने सर्वोच्च अधिकारी को अपनी ही रेजिमेंट की पहचान में देखते हैं, तो संवाद अधिक सहज और मानवीय बन जाता है।”
इस परंपरा की जड़ें ब्रिटिश भारतीय सेना की उस रेजिमेंटल प्रणाली में हैं, जहां रेजिमेंट को सैनिक की पहचान और सम्मान का केंद्र माना जाता था। स्वतंत्र भारत में भी भारतीय सेना ने इस विरासत को सहेजकर रखा है। यही रेजिमेंटल भावना युद्धभूमि में सैनिकों के मनोबल, एकता और बलिदान की भावना को मजबूत करती है।
11 गोरखा राइफल्स भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित और वीरता के लिए प्रसिद्ध इन्फैंट्री रेजिमेंटों में गिनी जाती है। गोरखा सैनिकों की बहादुरी, अनुशासन और युद्ध कौशल की मिसाल पूरी दुनिया में दी जाती है। “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” अर्थात “कायर बनकर जीने से मर जाना बेहतर है” इस रेजिमेंट का मूल मंत्र आज भी हर गोरखा सैनिक के हृदय में जीवित है।
जनरल अनिल चौहान का सैन्य जीवन भी इसी गौरवशाली रेजिमेंट से शुरू हुआ था। ऐसे में उनका 11 गोरखा राइफल्स सेंटर और 6/11 गोरखा राइफल्स में लौटना केवल एक औपचारिक सैन्य दौरा नहीं था, बल्कि अपने घर वापसी जैसा भावनात्मक क्षण था।
रेजिमेंट के पूर्व सैनिकों ने भी इसे गर्व और सम्मान का अवसर बताया। उनके अनुसार, “यह केवल देश के सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का दौरा नहीं था, बल्कि अपने ही परिवार के सदस्य की वापसी थी।”
आज जब आधुनिक युद्ध तकनीक और रणनीतियों का दौर है, तब भी भारतीय सेना की ताकत उसकी मानवीय परंपराओं, भाईचारे और रेजिमेंटल भावना में निहित है। जनरल अनिल चौहान का यह कदम उसी जीवंत परंपरा का प्रतीक बना, जिसने सैनिकों और सेना के शीर्ष नेतृत्व के बीच विश्वास और अपनत्व की भावना को एक बार फिर मजबूत कर दिया।








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