Saturday , 5 September 2026
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रायपुर में अपने बनाए ग्रोथ सेंटर पर जाकर महिला समूह का त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बढ़ाया हौसला, बोले – वोकल फॉर लोकल मुहिम से ऐसे प्रयासों को मिलती है हिम्मत

अपने लगाए पौधे को बड़े होकर फलदार होते देखना किसी भी बागवान के लिए सबसे सुकून भरा लम्हा होता है। दो साल पहले जब उत्तराखंड के सीएम रहते त्रिवेंद्र सिंह रावत ने एलईडी ग्रोथ सेंटर योजना को आगे बढ़ाया तो यह सवाल सबके जेहन में था कि क्या महिलाएं इस तरह के काम में रूचि दिखाएंगी। लेकिन शुक्रवार को देहरादून के रायपुर विकास खंड की कोटी मयचक ग्राम पंचायत में महिलाओं को बड़े इत्मिनान से स्वदेशी झालरों की सोल्डरिंग करते देखना एक अलग अनुभव रहा। खुद त्रिवेंद्र सिंह रावत इन महिलाओं का हौसला बढ़ाने पहुंचे और उनसे एलईडी ग्रोथ सेंटर के बारे में जानकारी ली। उन्होंने कहा कि वोकल फॉर लोकल की जो मुहिम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही है, उसने इस तरह के प्रयासों को बड़ी हिम्मत दी है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इन महिलाओं से दीपावली के लिए झालरें भी खरीदीं।

दरअसल, ग्रोथ सेंटर योजना पर उत्तराखंड सरकार ने काफी काम किया। इससे ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं की झिझक टूटी और उन्होंने अलग-अलग तरह के कामों में रुचि दिखाई। आज इनके पास स्थानीय बाजार से कापी अच्छे ऑर्डर हैं। ये महिलाएं यहां चार से पांच घंटे देकर महीने में अपने लिए 4-5 हजार रुपये कमा लेती हैं। यह उनकी छोटी-छोटी जरूरतों के लिहाज से बड़ी आमदनी है।

खुद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि जब यह काम शुरू किया गया था तब ये गांव की महिलाओं के लिए एकदम नया काम था। उसके बाद अगर इनके काम को देखा जाए तो इनमें क्वालिटी आई है। जिस मैटेरियल का ये लोग इस्तेमाल कर रहे हैं वो भी बहुत ही अच्छा है, क्योंकि रॉ मैटेरियल यहां पर नहीं बनता है। ये लोग गुजरात से इसे ला रहे हैं, जिसके कारण इनको लागत ज्यादा आती है और सामान का इंतजार भी करना पड़ता है। बावजूद इसके इन महिलाओं की प्रोग्रेस काफी अच्छी है। अब जरूरत है कि इस काम में कुछ एक्सपर्ट भी जुड़ें, जैसे मार्केटिंग, डिजाइनिंग एक्सपर्ट, इलेक्ट्रॉनिक के जानकार, ताकि इनके काम को और बढ़ाया जा सके।

वह कहते हैं कि मेरी कल्पना इस ग्रोथ सेंटर के पीछे यही थी कि क्या यह हमारे घर-घर का उद्योग बन सकता है? क्या यह एक कुटीर उद्योग बन सकता है। इस कल्पना के साथ हमने इस तरह के ग्रोथ सेंटर बनाए हैं। मुझे लगता है कि यहां महिलाएं हिम्मत से काम करती रहेंगी तो आगे बहुत अच्छा होगा। कोई भी व्यवसाय शुरू में बहुत अच्छा प्रॉफिट नहीं देता है, लेकिन नुकसान नहीं होना चाहिए जिससे हम आगे बढ़ते चले जाते हैं। मैं इन बहनों से यही कहना चाहूंगा कि आप सब सहयोग के लिए मुझे बोलते रहिए, सहयोग लेते रहिए और हिम्मत के साथ काम करिए, क्योंकि कोई भी काम जब हम शुरू करते हैं तो मार्केट में कंपटिशन होता है, ईर्ष्या भी होती है तो इस तरह की कई बातें सामने आती हैं। इसलिए शुरू में हमें यह मानकर चलना चाहिए कि यह काम हम कर रहे हैं तो बाधाएं भी आती रहेंगी। इन बाधाओं को हमें पार करना है। भविष्य में भी यह महिलाएं अच्छा काम करेंगी, ऐसी मैं आशा करता हूं।

उन्होंने कहा, यह उत्पाद हमारी बहु-बेटियां, बहनें बना रही हैं, यह उत्पादन लोकल हैं। आज सभी कंज्यूमर गुड्स पर चाइना का कब्जा है, पूजा की सामग्री हो या लक्ष्मी की मूर्ति सब चाइना से बनकर आ रही हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें अपने लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि उन लोगों को लाभ मिल सके। मैं सन् 1979 से स्वदेशी की मुहिम से जुड़ा हुआ हूं और मेरी कोशिश यही है कि कपड़ा, पेन, कागज यह सब स्वदेशी हो। ताज्जुब की बात है कि भारत में जितना बॉस पेपर है, वो सब चाइना से आता है। मैं धन्यवाद करना चाहूंगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कि उन्होंने बांस को एक क्रॉप में सम्मिलित किया, पहले यह वन संपदा मानी जाती थी। जिस कारण उसकी कटिंग में बहुत समस्या आती थी और 135 करोड़ वाले भारत में जहां कागज की इतनी आवश्यकता होती है वहां इसका पूरा उद्योग बंद हो गया था। आज पीएम मोदी ने उन उद्योगों को दोबारा शुरू किया है। जिससे लोकल उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा, किसानों को फायदा होगा। इसी तरह जब हम स्वदेशी का इस्तेमाल करते हैं तो जो पैसा विदेशों में जा रहा है, हम उसे रोक सकते हैं। मैं सबसे यही कहूंगा कि स्वदेशी उत्पादनों का ही इस्तेमाल करें और देश को मजबूती दें।

ग्रोथ सेंटर में काम करने वाली महिलाओं ने अपने अनुभव बांटते हुए कहा कि उन्हें यहां काम करके अच्छा लगा। उनके काम का सफर उतार-चढ़ाव वाला रहा। लेकिन नुकसान और फायदे को न देखते हुए, उन्हें काम करना है और आगे बढ़ना है। सरकार की तरफ से ग्रोथ सेंटर बनाकर दिए गए हैं और सेटअप लगाकर दिया गया है। इसके अलावा रॉ मैटेरियल खुद के संसाधनों से जुटा रहे हैं। इसके साथ ही उनके प्रोडक्टस् को मार्केट में पिछले साल के मुकाबले इस साल ज्यादा अच्छा रिस्पांस मिला है। इस ग्रोथ सेंटर में 45 महिलाएं काम कर रही हैं। इसके साथ ही कुछ महिलाएं घर से भी काम करती हैं।

उन्होंने बताया कि एलईडी ग्रोथ सेंटर के चलते वे घर से बाहर निकलकर नया काम सीख रही हैं। कहा जाता था कि लाइट्स बनाने का काम पुरुषों का होता है लेकिन जब हमने इसे बनाने की ट्रेनिंग ली तो यह पता चला कि यह काम कोई भी कर सकता है। हम बिजली के काम करने से डरते थे लेकिन अब हम इस काम को बड़े आसानी से कर रहे हैं। हम यहां चार से पांच घंटे काम करते हैं। हमारे लिए यहां बिजली का काम करना काफी चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि बिजली का काम है पहले हर महिला इस काम को करने में डरती थी। लेकिन इस काम को अब सभी महिलाएं अच्छे से कर रही हैं। पिछले साल सीजन में हमने यहां पूरे दिनभर काम किया था। लेकिन इस बार हमें अनुभव है तो हमने पहले से ही काम करना शुरू कर दिया था।

पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का यह ग्रोथ सेंटर ड्रीम प्रोजेक्ट भी था ऐसे में वह पहली बार यहां आए, हमारा हौसला बढ़ाया, हमें बहुत अच्छा लगा। हमें उनका सपोर्ट मिलेगा और कुछ नया सीखने का मौका भी मिलेगा। इस बार अभी तक हमारे पास साढ़े तीन हजार लाइट्स का प्रोडक्शन हो चुका है। जिसमें कुछ बिक भी चुका है और कुछ स्टॉक किया है। इन लड़ियों की डिमांड बाहर भी है। पिछले साल लाइट्स की डिमांड दिल्ली, उत्तरकाशी, टिहरी सहित देहारदून में थी। इस साल भी काफी जगहों पर इनको भेजा गया है।

ये महिलाएं सजावट के लिए प्रयोग में आने वाली LED झालरें, दुकानों, कार्यालयों या भवनों के अंदर की LED डाउन लाइटिंग, LED स्ट्रीट लाइट्स एवं विभिन्न पावर के LED बल्ब्स भी बना रही हैं। इन लाइटों को न सिर्फ बनाती हैं बल्कि रिपेयर वर्क भी कर सकती हैं। त्रिवेंद्र सिंह सरकार के दौरान ही ये निर्णय लिया गया था कि सरकारी विभागों द्वारा रु 5 लाख तक के आर्डर स्थानीय संस्थाओं, उत्पादों को प्रदान किए जाएंगे। यदि सरकार से इन्हें यह सपोर्ट मिल जाए तो ऐसी अनेक संस्थाओं, स्वयं सहायता समूहों के जीवन में बड़ा बदलाव आना तय है।

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Hill Mail

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