उत्तराखंड में आगामी जनगणना की तैयारियों के तहत 25 अप्रैल से राज्यभर में मकानों की गणना और सूचीकरण का कार्य शुरू किया जा रहा है। इस अभियान के तहत सरकारी टीमें घर-घर जाकर प्रत्येक मकान का रिकॉर्ड तैयार करेंगी और उसकी स्थिति से जुड़ी विस्तृत जानकारी जुटाएंगी।
यह प्रक्रिया केवल मकानों की संख्या दर्ज करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इससे यह भी पता चल सकेगा कि किस घर में लोग रह रहे हैं और कौन-से मकान लंबे समय से खाली पड़े हैं। सर्वे के दौरान यदि किसी घर में लगातार एक महीने तक कोई व्यक्ति नहीं मिलता और घर बंद रहता है, तो उसे आधिकारिक तौर पर ‘लॉक्ड / खाली’ श्रेणी में दर्ज किया जाएगा।
जनगणना की तैयारी का अहम चरण
सरकार के अनुसार मकानों की गणना और सूचीकरण आगामी जनगणना प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस दौरान हर घर की बुनियादी जानकारी जैसे — मकान का प्रकार (पक्का, कच्चा या मिश्रित), उसमें रहने वाले परिवारों की संख्या, पानी, बिजली और शौचालय जैसी सुविधाएं, मकान में कोई रहता है या वह खाली है जैसी जानकारियां एकत्र की जाएंगी। इससे भविष्य की जनगणना के लिए आधारभूत डाटा तैयार किया जाएगा।
पलायन की सच्चाई भी आएगी सामने
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पिछले कई दशकों से पलायन एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बन चुका है। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग पहाड़ों से मैदानों या दूसरे राज्यों की ओर जा चुके हैं।
इसका असर गांवों में साफ दिखाई देता है। कई गांवों में मकान तो बने हुए हैं, लेकिन उनमें रहने वाला कोई नहीं है। कुछ गांवों में तो स्थिति ऐसी है कि कभी चहल-पहल से भरे रहने वाले घर अब सालों से बंद पड़े हैं।
कई गांवों में बच गए हैं सिर्फ बुजुर्ग
राज्य के कई दूरस्थ गांवों में अब मुख्य रूप से बुजुर्ग आबादी ही रह गई है। युवा पीढ़ी रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुकी है।
इस कारण कई गांवों में खेती-बाड़ी भी प्रभावित हुई है और पारंपरिक सामाजिक जीवन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है। स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने से कई विद्यालय बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
‘घोस्ट विलेज’ की बढ़ती संख्या
उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे गांवों की संख्या भी बढ़ी है जिन्हें अक्सर ‘घोस्ट विलेज’ कहा जाता है। ये वे गांव हैं जहां कभी दर्जनों परिवार रहते थे, लेकिन अब वहां कोई स्थायी निवासी नहीं बचा है।
मकानों की गणना और सूचीकरण के इस अभियान से पहली बार राज्य में ऐसे गांवों और खाली पड़े मकानों की वास्तविक संख्या स्पष्ट रूप से सामने आ सकती है।
रिवर्स माइग्रेशन के दावों की भी होगी पड़ताल
राज्य सरकार समय-समय पर ‘रिवर्स माइग्रेशन’ यानी पलायन कर चुके लोगों को वापस गांवों में बसाने की योजनाओं की बात करती रही है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी कई लोगों के पहाड़ लौटने की खबरें सामने आई थीं।
लेकिन यह सर्वे यह स्पष्ट कर सकता है कि इन प्रयासों का जमीनी असर कितना हुआ। जिन गांवों में मकान तो हैं लेकिन उनमें कोई नहीं रहता, उनके आंकड़े यह बता देंगे कि वास्तव में पहाड़ों में बसावट बढ़ रही है या गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं।
नीति निर्माण में मददगार होगा सर्वे
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सर्वे केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि इससे मिलने वाला डाटा भविष्य की नीतियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
इससे सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि किन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, किन गांवों में आबादी तेजी से घट रही है और कहां विकास योजनाओं की सबसे ज्यादा जरूरत है।
पहाड़ों का भविष्य बताएंगे आंकड़े
25 अप्रैल से शुरू होने वाला यह अभियान एक तरह से उत्तराखंड के पहाड़ों की वर्तमान स्थिति का आईना साबित हो सकता है।
जब राज्यभर में मकानों का रिकॉर्ड तैयार होगा और खाली पड़े घरों की वास्तविक संख्या सामने आएगी, तब यह साफ हो सकेगा कि पहाड़ों में जीवन फिर से बस रहा है या पलायन की वजह से गांव धीरे-धीरे सन्नाटे में बदलते जा रहे हैं।
यह सर्वे शायद पहली बार इतने स्पष्ट रूप में दिखा सकेगा कि उत्तराखंड के पहाड़ों का भविष्य किस दिशा में बढ़ रहा है।








