‘पिछौड़ा वूमेन’ के नाम से प्रसिद्ध चंपावत की मंजू देश मे विदेश में भी ‘पिछौड़ा’ को मान सम्मान दिलाने में सफल हो रही है। आज उनके द्वारा बनाई गई पिछौड़ा का हर कोई मुरीद हो रहा है। द्वारा बनाई गई पिछौड़ा का हर कोई मुरीद हो रहा है।
समाज का एक अभिन्न हिस्सा होती है महिलाएं। एक बेहतर समाज बनाने में सबसे बड़ा सहयोग इन्ही का होता है। ऐसे ही हमारी उत्तराखंड की नारियां भी हैं। जिन्होंने अपने साहस, हौसलों और हुनर के दम पर पहाड़ को अटल बनाये रखने में सहयोग किया, और इतिहास से लेकर वर्तमान तक पहाड़ का गौरव बढ़ाया। चाहे खेल का मैदान हो या राजनीति की बात, चाहे बॉलीवुड हो या पहाड़ी लोक संस्कृति हर जगह पहाड़ की बेटियों ने अपने नाम के झंडे गाड़े है।
ऐसा ही एक अनोखा काम कर उत्तराखंड का नाम विश्व पटल पर ले जाने में कामयाब हुई है पहाड़ की बेटी मंजू टम्टा। जिन्होंने पहाड़ की पिछौड़ा को देश विदेश में मान दिलाने में सफलता हासिल की है। मंजू टम्टा ने न सिर्फ पिछौड़ा को घर घर पहुंचाया है बल्कि विलुप्त होती संस्कृति को भी बचाया है।
मूल रूप से चंपावत के लोहाघाट की मंजू का जन्म दिल्ली में हुआ। बचपन व शिक्षा शहर में होने के बाद उन्होंने 2 साल नौकरी भी की। पहाड़ से दूर होने के बावजूद भी पहाड़ से उनका जुड़ाव कम नही हुआ। बचपन से ही जब वह अपने माता पिता के साथ गांव आती तो पहाड़ी उत्पादों को लेकर हमेशा उनके मन मे कुछ अलग करने की टीस रहती। इन उत्पादों में सबसे ज्यादा उन्हें भाती ‘रँगीली पिछौड़ा’।
2002 में मंजू की शादी गंगोलीहाट के राजेन्द्र टम्टा से हुई। उनका परिवार अंबाला में रहता था। पहाड़ी होने के बावजूद उनका परिवार पंजाबी रीति-रिवाजों में रचा-बसा था। जिसके कारण मंजू को शादी में पिछौड़ी की जगह पंजाबी चुन्नी ओढ़नी पड़ी। मंजू के मन मे इस बात की टीस हमेशा रही।
फिर जब उन्होंने 2015 में अपने भाई की शादी की दौरान गांव से 3 पिछौड़ा मंगवाने की सोची। लेकिन जब पिछौड़ा उनके पास पहुंची तो उनका मन उदास हो गया। इतने लंबे इंतजार के बाद भी मंजू को उनके मन मुताबिक पिछौड़ा नही मिल पाई। उन पिछौड़ा में आधुनिकता की कमी उन्हें नजर आयी। जिसके बाद उन्होंने ठान लिया कि अब वक्त आ गया है कि इन पर कुछ काम किया जाए
दो वर्ष तक उन्होंने पिछौड़ा के ऊपर गहन अध्ययन किया। नए डिजाइन व नई सोच को बाजार में उतारना आसान नही था। लेकिन कहते है ना जहां चाह वहां राह। मंजू ने गहन चिंत्तन मनन करने के बाद अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर शुरुआत में केवल 30 पिछौड़ा को ही डिजाइन किया। और ‘पहाड़ी-ई-कार्ट’ के नाम से इसे ब्रांड बनाया गया। ऑनलाइन मार्केटिंग एप ऐमजॉन की मदद से उन्होंने मार्किट में इसे उतार दिया।
दिल्ली, बंगलौर व अन्य जगह के प्रवासियों ने जब रंगीली पिछौड़ा को जब ऑनलाइन देखा तो वो इसके मुरीद हो गए। पिछौड़ा आते ही मार्किट में अपना जलवा दिखाने लगी। मार्किट में इसकी डिमांड बढ़ने लगी। बता दें पिछले पांच वर्षो से मंजू टम्टा ने ‘पहाड़ी ई-कार्ट’ नाम से एक ब्राण्ड स्थापित किया है।
यह ब्राण्ड न कि सिर्फ पहाड़ और देश की महिलाओं को रीझाने का काम कर रहा है बल्कि विदेशों में भी इस ब्राण्ड ने धूम मचा रखी है। कह सकते हैं कि पहाड़ी ई-कार्ट नाम का यह ब्राण्ड महिलाओं का फिर से पसन्दीदा पहनावा बनता जा रहा है। देखा जाए तो इसमें सबसे ज्यादा डिमांड में रहती है बद्रीश पिछौड़ी।
बद्रीश पिछौड़ी और पहाड़ी स्टॉल नाम क्यों?
इस पिछौड़ा की एक खास बात है कि इसमें पहली बार पहाड़ी भाषा ‘सदा स्वागिण रै’ की बनी जरी बॉर्डर के साथ साथ भगवान बद्रीनाथ को पहनाए जाने वाले वस्त्र के छोटे से अंश का प्रयोग किया गया है, जिसे भगवान बद्रीनाथ का प्रसाद मानकर हम लोगों ने उपयोग किया है।
इसे बनाते हुए हमें सुखद और आत्मिक अनुभूति हुई हमें उम्मीद है कि जो लोग इसे अंगीकार करेंगे वो खुद महसूस करेंगे कि इसमें भगवान बद्री विशाल का साक्षात आशिर्वाद समाहित है। बता दें कि उत्तराखंड की पहली महिला विधान सभा स्पीकर ऋतु खंडूरी व केबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने अपने कर कमलों से बद्रीश पिछौड़ा को लांच किया।
जिस उत्पाद के संरक्षण की कसम मंजू टम्टा ने अकेली खाई थी अब उनके साथ 40 महिला कारीगर पहाड़ी ई-कार्ट के साथ जुड़कर स्वरोजगार कमा रही है। पहाड़ी ई-कार्ट अर्न्तगत टिहरी की नथ, पिछौड़ा, पहाड़ी स्टॉल, गुलाबन्द, पूजा पोटली, हैण्ड बैग, माता की चुनरी, पूजा आचन, पूजा का थाल व कवर और पुरूषों के पारम्परिक वस्त्र जैसे पहाड़ी टोपी यानि सिखई जिस पर ऐपण बनाया गया है प्रमुख है।
मंजू टम्टा ने न केवल पहाड़ के विलुप्त होते परिधान को नई पहचान दिलाई बल्कि महिलाओं को स्वालंबी व स्वरोजगार की राह भी दिखलाई। मंजू टम्टा आज कई महिलाओं की आदर्श बनती जा रही है। उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि अगर मन से कुछ करने की ठान ली जाए तो बड़ी से बड़ी चुनौती पार की जा सकती है।



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