एक मंदिर ऐसा जहां 68 वर्षों से चल रहा है पुराण सप्ताह

एक मंदिर ऐसा जहां 68 वर्षों से चल रहा है पुराण सप्ताह

द्वाराहाट से लगभग 10-11 कि.मी. की दूरी पर नागार्जुन (नगार्झण) गांव में स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मंदिर उत्तराखंड के उन प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों में परिगणित है, जिसका उल्लेख स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखंड’ में भी मिलता है। उत्तराखंड के पौराणिक भूगोल की दृष्टि से यही स्थान ‘सुरभि’ नदी का उद्गम स्थान है, जो दक्षिण की ओर बहती हुई विभांडेश्वर क्षेत्र में ‘नंदिनी’ नदी से संगम करती है।

डॉ. मोहन चंद तिवारी

समूचे उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल के अंतर्गत द्वाराहाट स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मंदिर एक ऐसा मंदिर है, जहां विगत 68 वर्षों से नागार्जुन ग्रामवासी मिलकर प्रतिवर्ष नियमित रूप से भाद्रपद मास में 2 गते से पुराण ‘सप्ताह’ का आयोजन करते आए हैं, जिसमें अठारह पुराणों में से किसी एक पुराण की कथा का प्रवचन प्रतिवर्ष किया जाता है।

‘श्री विष्णु मन्दिर निर्माण एवं भागवत कथा समिति’, ग्राम नागार्जुन द्वारा आयोजित इस कथा-सप्ताह के व्यासाचार्य चनोली ग्राम के प्रसिद्ध कथावाचक श्री गणेशदत्त शास्त्री, साहित्याचार्य विशारद हैं, जो पिछले अनेक वर्षों से नागार्जुन’ के कथा सप्ताहों में व्यासाचार्य का दायित्व निर्वहन करते आए हैं। इसी पुराण सप्ताह के दौरान शास्त्री जी ने भागवतपुराण, देवीपुराण, शिवपुराण, वामन पुराण आदि विभिन्न पुराणों की कथाओं का प्रवचन किया है।

द्वाराहाट से लगभग 10-11 कि.मी. की दूरी पर नागार्जुन (नगार्झण) गांव में स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मंदिर उत्तराखंड के उन प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों में परिगणित है, जिसका उल्लेख स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखंड’ में भी मिलता है।

उत्तराखंड के पौराणिक भूगोल की दृष्टि से यही स्थान ‘सुरभि’ नदी का उद्गम स्थान है, जो दक्षिण की ओर बहती हुई विभांडेश्वर क्षेत्र में ‘नंदिनी’ नदी से संगम करती है। मान्यता है कि इस पवित्र स्थान में विष्णु भगवान् ‘नागार्जुन’ नाम से विराजमान रहते हैं।

स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखंड’ में नागार्जुन पर्वत की स्थिति पश्चिमी रामगंगा ‘रथवाहिनी’ नदी के बाईं ओर बताई गई है जहां प्राचीन काल में ‘अर्जुन’ नामक नाग की पूजा होती थी इसलिए इसे ‘नागार्जुन’ कहा जाता है।

लोकप्रचलित किंवदन्ती के अनुसार प्राचीन काल में यहां घना जंगल था। एक ग्वाला प्रतिदिन अपनी गायों को चराने इस जंगल में आया करता था मगर उसकी एक गाय ऐसी थी जो इस जंगल में स्थित एक शिला के ऊपर अपने थनों का दूध निखार आती थी और घर में दूध नहीं देती थी इसलिए ग्वाला उस गाय से बहुत दुःखी था।

एक दिन ग्वाले ने गुप्त रूप से गाय का पीछा किया। प्रतिदिन की तरह गाय ने जब शिला के ऊपर दूध की धार गिराई तो ग्वाले को गुस्सा आ गया। उसने कुल्हाड़ी से उस शिला पर चोट मारी जिससे शिला का ऊपरी भाग छिन्न-भिन्न हो गया।

कालान्तर में चन्द्रवंशी राजाओं के शासन काल में राजा उद्योत चन्द पश्चिम दिशा में विजय करने के लिए प्रयाण कर रहे थे तो इसी गांव में ‘राजाटौ’ नामक स्थान पर उनका शिविर पड़ा। रात में राजा को स्वप्न में आज्ञा हुई कि “राजन् यहां घनी झाड़ी के नीचे विष्णु मन्दिर की मूर्ति है।

आप यहां पर उनका मंदिर बना कर पूजा-अर्चना की व्यवस्था करें। आप की विजय सुनिश्चित है।” प्रातः काल राजा ने मंत्रियों के समक्ष अपने स्वप्न को बताया। ढूंढने पर उन्होंने झाड़ी में खंडित मूर्ति को देखा। राजा ने संकल्प किया कि यदि वे अपने युद्ध अभियान में सफल हुए तो यहां मंदिर अवश्य बनाएंगे।

दैवयोग से राजा उद्योत चन्द अपने युद्ध प्रयाण में विजयी हुए। राजा ने इसी विजय के उपलक्ष्य में यहां मंदिर बना कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवाई। राजा ने अपने पुरोहित गंगोली के उप्रेती ब्राह्मणों को यहां भगवान् विष्णु की पूजा-अनुष्ठान के लिए नियुक्त किया।

नागार्जुन मंदिर में राजा उद्योतचन्द ने ताम्रपत्र द्वारा अपनी राजाज्ञा का लेखन भी करवाया है जिसमें समीपवर्ती कुछ गांव भी इस मंदिर को दान में दिए गए है और उस ताम्रपत्र में इन गांवों की रकम का अंश इस मंदिर के पुजारियों को देने का प्रावधान भी किया गया है।

जहां तक द्वाराहाट विकासखंड में स्थित इस पौराणिक मंदिर की भौगोलिक पृष्ठभूमि है, उसका स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखंड’ के ‘विभांडेश्वरमाहात्म्यम्’ में यह वर्णन मिलता है कि भगवान् शिव ने हिमालय की चोटियों पर अपने शिरों को रखकरॉ नील पर्वत पर कमरॉ नागार्जुन पर्वत पर दाहिना हाथ, भुवनेश्वर पर्वत पर बांया हाथ और दारुका वन में चरणों को स्थापित कर रखा है…

‘नागार्जुन’ का ‘विभांडेश्वर’ तीर्थ के साथ भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। ‘नागार्जुन’ नामक स्थान पर ही ‘देवधेनु’ सुरभि गाय का रूप त्याग कर नदी के रूप में बहने लगी थी और विभांडेश्वर महादेव के समीप पहुंची।

मैं पिछले अनेक वर्षों में ‘नागार्जुन’ मंदिर में होने वाले धार्मिक आयोजनों का प्रत्यक्षदर्शी भी रह चुका हूं तथा ऐसे कार्यक्रमों के प्रति शोधात्मक रुचि रखने के कारण पिछले वर्षों में इनकी विडियोग्राफी तथा फोटोग्राफी करने का सौभाग्य भी मुझे मिला है।

‘नागार्जुन’ मंदिर के ऐसे ही आयोजनों में से सन् 2008 में आयोजित शतचंडी महायज्ञ के आयोजन की स्मृतियां आज भी मस्तिष्क पटल में ताजा बनी हुईं हैं। बताना चाहूंगा कि आज भी दिल्ली, चंडीगढ़ पटियाला, हरियाणा आदि दूरदराज में बसे उत्तराखंड के प्रवासीजन अपने तीर्थ तुल्य ‘नागार्जुन’ देवस्थान के प्रति अगाध आस्थाभाव रखते हुए इस आयोजन को अपना तन-मन-धन से सहयोग देते आए हैं।

यह वर्ष इसलिए भी विशेष गौरवशाली वर्ष है कि नागार्जुन विष्णुमंदिर का भव्य देवालय बना है। इसके लिए नागार्जुन ग्राम तथा इसके निर्माण में तन-मन-धन से सहयोग देने वाले धर्मप्राण बंधुओं का विशेष अभिनन्दन है।

तेरह वर्ष पूर्व सन् 2008 के वार्षिक समारोह के अवसर पर पुराणकथा के साथ साथ सहस्रचंडी यज्ञ का भी जब भव्य आयोजन हुआ था तब उत्तराखंड के प्रसिद्ध संत मौनी महाराज जी का स्नेहपूर्ण सान्निध्य भी इस आयोजन को प्राप्त हुआ था। द्वाराहाट, रानीखेत, भिकियासेन के विधायक भी इस समारोह में उपस्थित हुए तथा भारद्वाज कुटी भासी से परमहंस रामचंद्र दास महाराज जी ने भी इस समारोह की शोभा को बढ़ाया।

क्षेत्र के गण्यमान्य साधुसंतों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति से ऐसा प्रतीत होता था मानो कि शिष्टता, अनुशासन और भक्तिभाव की इस त्रिवेणी में श्रद्धालुजन धर्माभिषेक कर रहे हों। इंद्रदेव भी मरुद्गणों के साथ अपनी द्रुतगति से इस शतचंडी महायज्ञ में आहुति देना चाहते थे इसलिए वे भी पुराण सप्ताह के दौरान धाराप्रवाह बरस कर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहे थे।

अनेक मित्रों की जानकारी हेतु मैं इस ‘विष्णु महापुराण कथा-सप्ताह’ के अवसर पर सन् 2008 में शतचंडी महायज्ञ के उपलक्ष्य में आयोजित ऐतिहासिक कलश शोभायात्रा, मंदिर परिक्रमा यात्रा आदि के दुर्लभ चित्रों को भी अवलोकनार्थ पोस्ट कर रहा हूं, ताकि जन सामान्य भी जान सके कि उत्तराखंड आज भी पुराण सप्ताह आदि धार्मिक आयोजनों को कितने उत्साह और श्रद्धाभाव से करता आया है।

आशा है इन चित्रों के माध्यम से इस भागवत कथा समारोह के अवसर पर उत्तराखंड के भव्य तीर्थ नागार्जुन देव और उनकी दिव्य महिमा का दर्शन दूर दराज़ के लोगों को भी हो सकेगा।

प्राकृतिक आपदाओं के इस संकट काल में, भगवान् विष्णु स्वरूप दीनबंधु नागार्जुन देव से प्रार्थना है कि वे परम कृपानिधान हम सब दुःखी जनों का कष्टनिवारण करते हुए हमारा कल्याण करें। पहाड़ में अन्न, धन और पशुधन की समृद्धि करते हुए हरियाली व खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करें।

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