राजेंद्र ने मत्स्य विभाग के सहयोग से मछली पालन का काम शुरू किया था। शुरुआत में सीमित स्तर पर शुरू की गई यह पहल अब सात तालाबों तक पहुंच गई है। इन तालाबों में मुख्य रूप से पंगास और ग्रास कार्प मछलियों का उत्पादन किया जा रहा है। राजेंद्र वर्ष में दो से तीन बार मछली का उत्पादन करते हैं और तैयार मछली को स्थानीय बाजारों में बेचते हैं।
वर्तमान में एक उत्पादन चक्र में करीब चार कुंतल मछली का उत्पादन हो रहा है। स्थानीय बाजार में मछली की मांग होने के कारण उत्पाद की बिक्री में भी उन्हें विशेष परेशानी नहीं होती। राजेंद्र उत्पादन को और बढ़ाने के साथ मछली पालन में विविधता लाने की तैयारी में भी जुटे हैं। इसके तहत वह अब तालाबों में गोल्डन फिश का बीज डालने की योजना बना रहे हैं।
मछली पालन से होने वाली आय में से महिलाओं को भुगतान करने के बाद राजेंद्र सालाना करीब तीन लाख रुपये की बचत कर रहे हैं। उनके साथ काम कर रही महिलाएं भी इस गतिविधि से आमदनी अर्जित कर रही हैं। इससे उन्हें गांव में ही रोजगार मिलने के साथ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिल रहा है।
जिला मत्स्य अधिकारी अभिषेक मिश्रा के अनुसार, राजेंद्र चमोली पिछले करीब पांच वर्षों से प्रेरणा मत्स्यजीवी सहकारी समिति से जुड़े हुए हैं। मछली पालन शुरू करने से पहले वह सब्जी उत्पादन का कार्य करते थे। विभाग की ओर से सहयोग मिलने और मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत लाभान्वित किए जाने के बाद उन्होंने मछली पालन को स्वरोजगार के रूप में अपनाया।
राजेंद्र का कहना है कि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग कर ग्रामीण क्षेत्रों में रहकर भी रोजगार और आय के बेहतर अवसर तैयार किए जा सकते हैं। उनके प्रयास से गांव में अन्य लोगों को भी मछली पालन जैसी गतिविधियों को स्वरोजगार के रूप में अपनाने की प्रेरणा मिल रही है।
पौड़ी के ग्रामीण क्षेत्र में राजेंद्र चमोली की यह पहल स्वरोजगार, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और महिला रोजगार की दिशा में एक उदाहरण के रूप में सामने आई है। मछली उत्पादन के विस्तार के साथ वह अपनी आय बढ़ाने के साथ स्थानीय बाजार की मांग को पूरा करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।


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