इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति डॉ. मनमोहन सिंह चौहान द्वारा विश्वविद्यालय के विभिन्न कार्यक्रमों में नाबार्ड द्वारा किये जा रहे योगदान की प्रशंसा की गयी तथा शोध, प्रसार एवं आधारभूत संरचनाओं के सुदृढ़ीकरण करने के लिए और अधिक वित्तीय सहयोग हेतु आह्वान किया गया। उनके द्वारा देश में खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में विश्वविद्यालय द्वारा किये गये योगदान पर प्रकाश डाला गया। साथ ही उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक समस्याओं, छोटी जोत एवं कृषि में लगे हुए लोगों की कम आमदनी के ऊपर भी ध्यान आकर्षित किया गया। नाबार्ड का स्वयं सहायता समूह विशेषकर महिलाओं को आर्थिक सहायता पर बल दिया गया।
उन्होंने विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण तथा समय-समय पर आयोजित किये जाने वाले कार्यशालाओं तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आर्थिक सहयोग एवं परियोजनाओं के माध्यम से शोध कार्यों के संचालन हेतु आर्थिक सहायता को और बढ़ाये जाने पर बल दिया। वर्ष 2023 को मिलेट वर्ष मनाए जाने के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा घोषित 10 मोटे अनाजों में से 5 मोटे अनाज उत्तराखंड राज्य में पाये जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मोटे अनाजों की ऐसी प्रजातियां विकसित हो जोकि पोशक तत्वों के साथ-साथ सुपाच्य भी हों जिससे कि वे आम लोगों के बीच शीघ्र लोकप्रिय हो जाएं।
इस अवसर पर विनोद कुमार बिष्ट ने बताया कि नाबार्ड द्वारा मुख्य रूप से सहायता तीन रूपों यथा मानव संसाधन के विकास, शोध एवं विकास कार्य तथा शोध से प्राप्त परिणामों को कृषकों के मध्य प्रचार-प्रसार के लिए उपलब्ध करायी जाती है। पूर्व में विष्वविद्यालय के साथ एमओयू हुआ था और जनवाणी में जिंगल कार्यक्रम और नाबार्ड चेयर तथा आयोजित किये जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों हेतु नाबार्ड के द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की जाती रही है। उनके द्वारा भी उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं पर प्रकाश डाला गया तथा स्वयं सहायता समूहों और किसान उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देने और उनके उत्पादों के लिए विपणन सुविधाओं की उपलब्धता पर बल दिया।
उन्होंने बताया कि मिलेट वर्ष 2023 के उपलक्ष में मोटे अनाज वाली फसलों के अधिक बीज उत्पादन, उनके संवर्धन, विपणन, कौशल उन्नयन, महिला सशक्तिकरण, स्वयं सहायता समूहों को उच्च श्रेणी का प्रशिक्षण तथा उनके तकनीकी ज्ञानवर्धन हेतु भ्रमण नाबार्ड की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि नाबार्ड देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों तथा अन्य विश्वविद्यालयों को भी विभिन्न कार्यों हेतु वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है और पन्तनगर विश्वविद्यालय के कृषि के क्षेत्र में किये गये विशिष्ट योगदान हेतु नाबार्ड द्वारा और अधिक वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। इस अवसर पर उत्तराखंड नाबार्ड के राजीव प्रियदर्शी एवं राकेश सिंह कन्याल तथा विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता एवं निदेशकगणों ने भी अपना-अपना परिचय कराते हुए शोध, प्रसार आदि के क्षेत्रों में आ रही वित्तीय समस्याओं के बारे में अपने विचारों को साझा किया।


Leave a comment