उत्तराखंड में कृषि, बागवानी, पशुपालन और इससे जुड़े क्षेत्रों के अगले 20 वर्षों के विकास की दिशा तय करने के लिए राज्य सरकार ने व्यापक ‘उत्तराखंड कृषि रोडमैप’ तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। रोडमैप का प्रारंभिक मसौदा अगले तीन माह में तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें राज्य के सभी 13 जिलों की भौगोलिक, जलवायु और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रवार विकास रणनीति तैयार की जाएगी।
गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के कुलपति डॉ. शिवेन्द्र कुमार कश्यप को उत्तराखंड कृषि रोडमैप के समन्वयक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस पूरी पहल का नेतृत्व सचिव कृषि, उत्तराखंड शासन डॉ. एस.एन. पाण्डेय कर रहे हैं।
विश्वविद्यालय के कुलपति सभाकक्ष-2 में आयोजित प्रेस वार्ता में डॉ. कश्यप ने बताया कि रोडमैप का उद्देश्य प्रदेश की कृषि एवं संबद्ध अर्थव्यवस्था को आगामी 20 वर्षों के लिए व्यावहारिक, क्रियान्वयन योग्य और मापन योग्य लक्ष्यों के साथ नई दिशा देना है। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र को केवल उत्पादन तक सीमित न रखते हुए रोजगार, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने से जोड़ा जाएगा।
रोडमैप तैयार करने के लिए कृषि, बागवानी, पशुपालन, वानिकी, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, पलायन और रोजगार सृजन समेत 21 विषयगत क्षेत्रों में विशेषज्ञ समितियां गठित की गई हैं। इन समितियों में देश-दुनिया के विशेषज्ञों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। प्रारंभिक कार्यक्रम में करीब 170 विशेषज्ञ एवं प्रतिनिधि ऑनलाइन माध्यम से जुड़े और उत्तराखंड के कृषि विकास की भावी दिशा पर विचार-विमर्श किया।
सभी समितियों के सुझावों और कार्यों में बेहतर समन्वय के लिए विश्वविद्यालय ने एक डिजिटल डैशबोर्ड भी तैयार किया है। इस प्लेटफॉर्म पर सभी टीमें अपने सुझाव और प्रगति साझा करेंगी। इससे विभिन्न समितियों के कार्यों को एक-दूसरे से जोड़ते हुए समन्वित तरीके से तीन माह के भीतर रोडमैप का प्रारंभिक मसौदा तैयार करने में मदद मिलेगी।
कुलपति ने बताया कि कृषि रोडमैप की सबसे बड़ी विशेषता इसका जनपदवार और क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण होगा। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उनकी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग रणनीति बनाई जाएगी, जबकि तराई और मैदानी क्षेत्रों में खाद्यान्न उत्पादकता बढ़ाने के साथ कृषि प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर विशेष जोर दिया जाएगा। देहरादून और नैनीताल जैसे मिश्रित भौगोलिक स्वरूप वाले जिलों में भी क्षेत्रवार कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
रोडमैप में प्रत्येक जिले की वर्तमान स्थिति का आधारभूत आकलन किया जाएगा। इसके बाद 2031, 2036, 2041 और 2046 के लिए मापन योग्य लक्ष्य निर्धारित किए जाएंगे, ताकि कृषि क्षेत्र में होने वाली प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन किया जा सके।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में शीतोष्ण बागवानी, औषधीय एवं सुगंधित पौधों, जैव विविधता संरक्षण और कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना है। वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन रोकने, बंजर एवं परती भूमि को दोबारा खेती के उपयोग में लाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
डॉ. कश्यप के अनुसार, रोडमैप तैयार करने के दौरान न्यूजीलैंड, आयरलैंड और चीन के सफल कृषि विकास मॉडलों का भी अध्ययन किया जा रहा है। हालांकि उत्तराखंड के लिए तैयार होने वाला मॉडल पूरी तरह प्रदेश की भौगोलिक, जलवायु और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप होगा।
रोडमैप में किसानों, जनप्रतिनिधियों, सरकारी विभागों, शिक्षण संस्थानों तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सुझावों को भी शामिल किया जाएगा। प्रेस वार्ता में निदेशक संचार डॉ. जे.पी. जायसवाल, सहायक निदेशक संचार डॉ. अर्पिता शर्मा काण्डपाल समेत मीडिया प्रतिनिधि मौजूद रहे।








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