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गढ़वाल हीरोजः मैदान के असली महारथी

अर्जुन एस. रावत, देहरादून क्या आपने अदिति चौहान या मनीष मैठाणी का नाम सुना है? ऐसा पूछने पर उत्तराखंड के अधिकतर लोग ‘न’ में ही जवाब देते हैं। अब अगर यह पूछें कि क्या आप जानते हैं कि भारत की महिला फुटबॉल टीम की कप्तान

अर्जुन एस. रावत, देहरादून

क्या आपने अदिति चौहान या मनीष मैठाणी का नाम सुना है? ऐसा पूछने पर उत्तराखंड के अधिकतर लोग ‘न’ में ही जवाब देते हैं। अब अगर यह पूछें कि क्या आप जानते हैं कि भारत की महिला फुटबॉल टीम की कप्तान कौन है? यह जानकारी भी महज फुटबॉल के प्रशंसकों तक ही सीमित है? अदिति चौहान भारत की महिला फुटबॉल टीम की कप्तान हैं और पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली हैं। वह इस समय यूरोप के एक क्लब की ओर से फुटबॉल खेल रही हैं। मनीष मैठाणी भी उत्तराखंड का उभरता फुटबॉल सितारा है और यूरोप की सेकेंड डिवीजन लीग के क्लब   में खेल रहा है। इन दोनों खिलाड़ियों में एक बात कॉमन है, दोनों ही दिल्ली के बहुचर्चित फुटबॉल क्लब ‘गढ़वाल हीरोज’ से निकले हैं।
क्या आप जानते हैं कि कुछ समय पहले जब गढ़वाल हीरोज ने सेकेंड डिवीजन की दिल्ली लीग का खिताब जीता था तो सैकड़ों उत्तराखंडी अंबेडकर स्टेडियम में मौजूद थे और पूरा स्टेडियम गढ़वाली गीत- संगीत और ढोल-दमो की धुन पर झूम रहा था। इस जीत के साथ ही गढ़वाल हीरोज ने आईलीग जैसे प्लेटफार्म के लिए क्वालीफाई किया। क्या आप जानते हैं कि दिल्ली की फुटबाल में उत्तराखंडी खिलाड़ियों का बड़ा योगदान रहा है, या कहें कि तमाम क्लब उन्हीं के दम पर चल रहे हैं। गढ़वाल हीरोज, गढ़वाल डायमंड, उत्तराखंड एफसी और उत्तरांचल हीरोज जैसे क्लबों का जिक्र आते ही उत्तराखंडियों की इस खेल में महारत की चर्चा होने लगती है। अब गढ़वाल हीरोज ने राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली और उत्तराखंड का झंडा थाम लिया है।

हालांकि यह सफर जितना चमकदार दिखता है, यह उतना ही पुराना भी है। 1953 में केसर सिंह नेगी ने दिल्ली में उत्तराखंड और विशेषकर गढ़वाल के युवाओं को फुटबाल के साथ जोड़ने के लिए गढ़वाल हीरोज क्लब की स्थापना की। उन्होंने जो पेड़ लगाया, वह धीरे-धीरे बढ़ते हुए आज एक बड़ा पेड़ बन गया है, जिसकी छांव में हजारों युवाओं को हुनर निखरा है।

1953 से लगातार सर्किट फुटबॉल खेलने के बाद गढ़वाल हीरोज ने 1986 में तहलका मचाते हुए दिल्ली लीग सीनियर टीम का खिताब जीता। उसके बाद सफल मिलाजुला रहा। गढ़वाल हीरोज के प्रेसीडेंट भगवान सिंह नेगी बताते हैं कि वह पहले क्लब के लिए खेला करते थे और साल 2001 में मैनेजमेंट कमेटी में शामिल हुए। उन्होंने  बताया कि पहले हमारा क्लब बी डिवीजन में था, उसके बाद हमने कडी मेहनत करके क्लब को ए डिवीजन में पहुंचाया। फिर दो साल हमें प्रमोट होने में लगे। हम ए डिवीजन से सीनियर डिवीजन में पहुंचे। सीनियर डिवीजन में पहुचंने में बाद हम तीन बार चैम्पियन भी रहे और 2003 से लेकर अब तक हर साल हम अंतिम चार में रहे हैं। हम दो बार रनरअप भी रहे। हमने बिहार के सिवान में जाकर ऑल इंडिया फुटबॉल टूनामेंट भी जीता। पौड़ी महोत्सव में तो हम 4-5 बार चैम्पियन हैं। देहरादून में दून वैली और धन सिंह खरोला टूर्नामेंट जीता है। हम पिथौरागढ़ और श्रीनगर में भी जीते। स्थानीय स्तर पर हमने काफी कामयाबी हासिल की। चंपावत में हम दो बार चैम्पियन रह चुके हैं। हमारी परफारमेंस के हिसाब से हमें देश और देश से बाहर जाने का भी मौका मिलता है या यह भी कह सकते हैं कि हमें बाहर जाने की इंट्री मिलती है।
नेगी बताते हैं कि गढ़वाल हीरोज फुटबाल क्लब से निकले 1000 से ज्यादा बच्चों की सरकारी नौकरियां लग चुकी हैं। अब हम जहां भी जाते हैं तो हम अपने वहां के पहाड़ी लड़कों को चुनकर लाते हैं। अभी हमारे पास दो पौड़ी के लड़के खेल रहे हैं, तीन चार बच्चे देहरादून से हैं एक मुनस्यारी का भी है। इसके अलावा हमारे पास पिथौरागढ़ के लड़के भी हैं। आईलीग खेलने के लिए तीन विदेशी खिलाड़ियों की भी जरूरत होती है। हमने उसका भी इंतजाम कर दिया है। अभी हमारे क्लब से दो नाइजीरियाई और एक जापानी खिलाड़ी खेल रहे हैं। क्लब को तीन ही खिलाड़ी खिलाने की अनुमति होती है और ये तीनों हमारे लिए खेल रहे हैं। पिछले 8-10 साल के अंदर 6-7 नाइजीरियाई लड़के टीम के लिए खेल चुके हैं।
भगवान सिंह ने बताया कि इंटरनेशनल टीम के लिए अभी हमारे क्लब से दो बच्चे खेल रहे हैं एक लड़का और एक लड़की। ये दोनों यूरोप के क्लब में खेल रहे हैं। एक अदिति चौहान गोलकीपर हैं जो इंडिया टीम की कप्तान भी है। इसके अलावा हमारी वीमैन टीम भी तीन बार दिल्ली सीनियर डिवीजन वीमन लीग के चैम्पियन रह चुकी है। इसके अलावा मनीष मैठाणी है जो आईएसबीएल लीग खेलता है। अभी वह यूरोप के बी डिवीजन क्लब के लिए खेल रहा है। मनीष पौड़ी के सिमली गांव का है और अदिति चौहान भी पौड़ी की रहने वाली है।
क्लब को चलाने के लिए पैसों की जरूरत के सवाल पर भगवान सिंह कहते हैं कि अगर ईमानदारी से बताऊं तो फाइनेंस की हमें हमेशा से ही दिक्कत रही है। हमारे खिलाडियों ने चाय मट्ठी खाकर मैच खेले हैं। हालांकि हम खिलाडियों से जो पैसा देने का वादा करते हैं वह हम उनको देर सबेर दे ही देते हैं इसलिए उनके बीच में हमारे क्लब की छवि अच्छी है। हमारे पास अगर पैसा पूरा नहीं होता है तो हम उसे धीरे-धीरे करके दे देते हैं और इससे खिलाडियों को बुरा भी नहीं लगता। हर गढ़वाली लड़के की सपना होता है कि वह गढ़वाल हीरोज के लिए खेले। हमारी भी एक लिमिटेशन होती है कि हम कितने बच्चों को क्लब में ले सकते हैं। हम कुछ मिलजुल कर और कुछ लोगों की मदद से फाइनेंस का इंतजाम करते हैं। ज्यादातर पैसा हम खुद ही इकट्ठा करके लगाते हैं। लेकिन अब हम इंडियन लीग खेल रहे हैं और इसके लिए हमें पूरे गढ़वाल के भाई बहनों से सहयोग की अपेक्षा है। गढ़वाल के 32 लाख लोग दिल्ली में हैं, अगर वे सौ रूपये भी अपना योगदान दें तो क्लब के लिए एक अच्छा सा पैसा जमा हो जाता है। इससे हम और आगे बढ़ेंगे।  हमारे यहां बहुत सारे उद्योगपति हैं, ब्यूरोक्रेट हैं, यह देख लो कि इंडिया के अंदर टॉप पोस्ट पर उत्तराखंड के लोग बैठे हुए हैं। इससे हमारा सिर गर्व से ऊंचा होता है कि हमारे लोग वहां बैठे हैं और उनका एक इशारा ही हमारे के लिए बहुत है। हम तो यह चाहते हैं कि जितनी भी क्लब की जरूरत है वह पूरी होती रहे।  अभी तो हम नेशनल लेवल पर हैं और हम इस क्लब को इंटरनेशनल लेवल पर ले जाना चाहते हैं। कई बार हमें बाहर से भी ऑफर आती है कि अपने क्लब को यूरोप में एक्जीबिशन मैच खेलने के लिए लाओ, लेकिन पैसों की कमी के चलते हम ऐसा नहीं कर पाते। हालांकि हमें उम्मीद है कि एक दिन हम ऐसा कर पाएंगे।
क्लब के लिए टैलेंट पूल बनाने और बच्चों को छांटने के सवाल पर नेगी बताते हैं कि जब हमारी टीम कहीं मैच खेलने जाती है तो वहां हमें जो बच्चा अच्छा खेलते हुए लगता है, हम उसे यहां बुलाते हैं और मैच के दौरान उसके हुनर को परखते हैं।  गढ़वाल हीरोज के एप्रोच करने पर अधिकतर बच्चे आ ही जाते हैं। हमारे एक और तरीका है, ग्रासरूट से बच्चों को मांझने का। हमारा एक क्राइटेरिया है कि हमारे पास एक एकेडमी होनी चाहिए। इसके लिए हमने बाईचिंग भूटिया फुटबॉल स्कूल से एग्रीमेंट किया हुआ है। वहां से जो बच्चे निकलते हैं, 17-18 साल में वे मैच्योर खिलाड़ी हो जाते हैं। बाकी जगह जाकर हम बच्चों की तलाश करते रहते हैं विदेशियों को छोड़कर हमारी प्राथमिकता गढ़वाली बच्चों पर रहती है। इसमें पूरे उत्तराखंड के बच्चों को लिया जाता है। गढवाल हीरोज क्लब का नाम है। कई गढ़वाली बच्चे ऐसे हैं, जो नेशनल लेबल तक खेले हैं, वे भी हमारे क्लब के लिए खेलते हैं। हम पूरे उत्तराखंड को कवर करते हैं लेकिन क्लब का नाम गढ़वाल हीरोज फुटबाल क्लब है। लक्ष्मण बिष्ट भी हमारे क्लब से खेल चुका है। हमारे यहां के कई बच्चों ने नेशनल टीम में खेला है और कई खेल भी रहे है। सुनील छेत्री ने बहुत शुरुआती दौर में हमारे क्लब के लिए खेला है। भारत की महिला फुटबॉल टीम की कप्तान हमारे यहां से निकली है और उसने हमारे क्लब से खेला है। इंडिया की नेशनल टीम में हमारे क्लब की स्वाती रावत, मारिया खान भी खेल चुकी हैं। आईएसएल से मुनमुन, मनीष मैथाणी से खेल चुके हैं। हमारी नर्सरी से काफी बच्चे निकल रहे हैं। ये विभिन्न एज ग्रुप के होते हैं जैसे 13, 14, 15 साल की उम्र वाले बच्चे होते हैं।
क्लब से बच्चों को जोड़ने के सवाल पर भगवान सिंह नेगी बताते हैं कि क्लब में तो सीनियर बच्चे ही लिए जाते हैं लेकिन जो हमारी एकेडमी है उसमें 8 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को लिया जाता है। कई बच्चों के पैरेंट्स तो 8वीं क्लास तक बच्चे को भेजते रहते हैं और जब उनका बच्चा नौवीं या दसवीं में चला जाता है तो वह उस बच्चे को ड्राप कर देते हैं। जिन बच्चों में टैलेंट होता है वह बच्चा तो सीख जाता है लेकिन जिन बच्चों में टैलेंट की कमी होती है वह बच्चा वहीं से अपना रास्ता बदल लेता है। लेकिन अब खुशी की बात है कि बच्चे प्रोफेशनल फुटबॉलर बन रहे हैं।
नेगी बताते हैं कि गढ़वाल हीरोज की स्थापना करने वाले केसर सिंह नेगी धुमाकोट के नैनीडांडा ब्लॉक के थे और वह दिल्ली में ही सरकारी नौकरी करते थे। उन्होंने नौकरी के साथ-साथ फुटबॉल भी खेला। उस समय तो उनको भी नहीं मालूम रहा होगा कि एक दिन गढ़वाल हीरोज फुटबाल क्लब इस मुकाम को छूएगा। दिल्ली में अभी तक 66-67 फुटबाल क्लब हैं कुछ हमारे से भी पुराने हैं पर वे इतनी तरक्की नहीं कर पाये जितना हमारे क्लब ने किया है।
भगवान सिंह नेगी पौड़ी गढ़वाल की पट्टी सितुनस्यूं के डांडापाणी के कठूड़ गांव के रहने वाले हैं। उनकी  शुरुआत शिक्षा पहाड़ से ही हुई। छठी क्लास से स्कूल में फुटबॉल खेलना शुरू किया और 12वीं तक की पढ़ाई के बाद रोजगार की तलाश में दिल्ली आना पड़ा। तीन साल तक नौकरी के लिए संघर्ष चला और फुटबॉल नहीं खेल सके। साल 1983 में यूपीएससी के जरिये नौकरी मिली और तब कुछ समय मिलने के लगा तो फिर से फुटबॉल खेलना शुरू किया। उसके बाद मैंने नेगी ने ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की। नेगी खुद बताते हैं कि वह 42 साल की उम्र तक दिल्ली में क्लब फुटबाल खेलता रहे। उसके बाद गढ़वाल हीरोज से जुड़ा और साल 2001 से गढ़वाल हीरोज फुटबाल क्लब का प्रेजीडेंट हूं।

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