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लद्दाख में चीनी घुसपैठ

जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में चीनी सैनिकों द्वारा घुसपैठ करके उसके दोहरे चरित्र का पता चलता है। एक ओर तो चीन के नेता भारत के साथ बातचीत करके सम्बन्धों को सुधारने की कोशिश करते हैं और दूसरी तरफ उनकी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी भारतीय सीमा के अंदर दाखिल हो जाती है। यह ताजा घटना हमें 15 अप्रैल को देखने को मिली। जब चीनी सेना की एक प्लाटून ने घुसपैठ करके डीबीओ (दौलत बेग ओल्डी) सेक्टर में करीब दस किमी. अंदर घुस आई। इसके बाद भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों ने 300 मीटर की दूरी पर अपना कैंप भी बना लिया। यहां के हालात को देखते हुए पहाड़ी युद्ध में प्रशिक्षित लद्दाख स्काउट्स को भी मौके पर रवाना किया गया। भारत सरकार ने इस घटना को बड़ी सख्ती से लिया। विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि मौजूदा विवाद पर भारत ने चीन को कहा है कि वह अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा का सम्मान करते हुए हद में रहे।

चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सीमा में घुसने की खबर के बाद 22 अप्रैल को रक्षा मंत्री ए के एंटोनी ने कहा कि सरकार लद्दाख के हित और उसकी सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी। इस बीच हालात का जायजा लेने के लिए थलसेना अध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह दो दिवसीय दौरे पर जम्मू कश्मीर पहुंचे। उन्होंने वहां पर जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से भी बातचीत की। जनरल सिंह ने जम्मू के नगरोटा में लेफ्निेंट जनरल के टी परनायक और लेफ्निेंट जनरल डी एस हूडा के अलाव आर्मी के सीनियर अधिकारियों के साथ बैठक की। घाटी पहुंचने पर जनरल बिक्रम ने जम्मू संभाग में एलओसी पर मौजूदा हालात का जायजा लिया। उन्होंने आतंकरोधी रोमियो फोर्स व डेल्टा फोर्स के मुख्यालय में सैन्य अधिकारियों के साथ भी बैठक की।

लद्दाख में चीन की घुसपैठ से चिंतित जम्मू-कश्मीर सरकार ने मामले को गंभीरता से लेने की बात कही है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि चीन की जगह अगर यही घुसपैठ पाकिस्तान ने की होती तो सरकार ने पाक के साथ व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ दिए होते। हम चीन के मामले में ऐसी तुरन्त कार्रवाई क्यों नहीं करते। लद्दाख के पूर्व सांसद थुप्स्तन छीवांग ने कहा कि चीन लद्दाख में काफी समय से हस्तक्षेप करता आ रहा है। हमारी ओर से कोई उचित कार्रवाई न होने के कारण उसे शह मिली है। इस बात को लेकर दोनों देशों में टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। वहीं चीन ने भी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि उसके सैनिकों ने सरहद पार नहीं किया है और भारतीय बेवजह हल्ला मचा रहे हैं। इसी बीच भारत और चीन के अधिकारियों के बीच हुई वार्ता में अभी तक कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है।

भारत के बारे में चीन की घोषणाओं का जो लहजा है, वह 1962 के हिंदी-चीनी भाई-भाई युग की याद दिलाता है। भारतीय क्षेत्र पर चीन का कोई अधिकार न होने के चीन के दावों का असल मतलब यह होगा कि जिन इलाकों पर वह दावा कर रहा है, वे उसी के हैं और उनका भारतीय क्षेत्र होने का कोई मतलब नहीं है। इसका ताजा नमूना हमें डीबीओ सेक्टर में देखने का मिल रहा है। जब इस प्रकार की सच्चाई सामने खड़ी हो, तब भारत को चीन की बातांे पर आंख मूंद कर भरोसा करने के रुख को त्यागना होगा। इससे पहले चीन ने समुद्र के चारों ओर से भारत को घेरने की कोशिश काफी पहले शुरू कर दी थी जब उसने पाकिस्तान, श्रीलंका और म्यानमार में बंदरगाहों का निर्माण करना शुरू कर दिया था भारत को चीन के इन इरादों को पहले ही भांप देना चाहिए था।

भारत और चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ज़मीनी हालात ठीक नहीं हैं। इस बात की पुष्टि अमरीकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर के एक अध्ययन में भी की गई थी। यह सेंटर, दुनिया की सोच बदलने वाले मुद्दों, दृष्टिकोणों और रुझानों पर जानकारी उपलब्ध कराता है। इसकी मध्य-अक्टूबर की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की प्रगति को चीन नकारात्मक मानता है, जिसका मतलब यह हुआ कि चीन सरकार ने इस नकारात्मक सोच को बदलने के लिए कुछ भी नहीं किया है, बल्कि उसे और हवा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत के प्रति दो तिहाई चीनी उत्तरदाताओं का रुख प्रतिकूल था, जबकि केवल 23 प्रतिशत को यह रूख अनुकूल लगा। रिपोर्ट की शायद सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि केवल 39 प्रतिशत लोग ही चीन के साथ भारत के सम्बंधों को सहयोगपूर्ण मानते हैं, जबकि 2010 में ऐसे लोगों का प्रतिशत 53 था।

वर्ष 2010 में एक बड़े चीनी व्यापार प्रतिनिधिमंडल के साथ चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा के बाद के घटनाक्रम के बाद प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा कराए गए एक मत-संग्रह के अनुसार, हालात बिगड़े ही हैं और इसी दौरान पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से लेकर पश्चिम में जम्मू-कश्मीर तक 4,000 किलोमीटर लम्बी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कुछ न कुछ होता रहा है। जियाबाओ की यात्रा से इस देश के साथ व्यापारिक सम्बंधों पर असर जरूर हुआ, लेकिन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर उसकी गतिविधियां – पूरे अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को दोहराने और जम्मू-कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान सेक्टर में कराकोरम हाईवे को चैड़ा करने और तेल तथा गैस पाइपलाइन के लिए सुरंगें खोदने के लिए सैन्य इंजीनियरों और तकनीशियनों की तैनाती, कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। वहीं कुछ समय पहले तक कश्मीरियों को नत्थी वीजा जारी कर वह भारत को चिढ़ाता भी रहा है। इस प्रकार से दोनों देशों के सम्बन्धों में जो सुधार हो रहे हैं उनमें कठिनाइयां पैदा हो सकती है।

भारत-चीन सम्बंधों में 1962 के चीनी हमले की तैयारी की पहचानी सी ध्वनि सुनाई पड़ रही है। कहीं ऐसा न हो कि लद्दाख में चीनी घुसपैठ उसके साथ सुधरते सम्बन्धों पर भारी पड़ जाये।

वाई एस बिष्ट

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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