उत्तराखंड विधानसभा में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरण में आ रहे बदलावों के कारण दोनोंनदियों की हिमालय से निकलने वाली 60 प्रतिशत जल धाराएं सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं।
प्रेम पंचोली, देहरादून
अस्सी के दशक में यमुना पर दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण शुरू हुआ, जो बाद में प्रतिबंधित हो गईं। तब ए योजनाएं क्रमशः 300 व 600 मेगावाट की बनने वाली थी। लगभग 40 साल के अंतराल के बादए योजनाएं पुनः निर्माण के लिए तैयार कीजा रही है। मगर इन योजनाओं का रूप यमुनामें पानी की भारी कमी के कारण आधा से भी बहुत कम हो गया है। यानि अब योजनाएं क्रमशः 90 व 160 मेगावाट बिजली का उत्पादन करेगी। इससे अनुमान लग जाता है कि यमुनाका पानी कितना कम हो गया है? यही नहीं यदि ए जलविद्युत परियोजनाएं तत्काल बन चुकी होती तो आज का नैनबाग बाजार भीपानी में समा चुका होता। क्योंकि इन योजनाओं का जीरो प्वांइट तत्कालीन नैनबाग मेंही था, जो अब 17 किमी पीछे हट गया है।
यह सच है कि पानी की कमी के कारण कई योजनाएं प्रभावित हुई है। गांव के गांव पानी के बिना दूसरी जगह बसने लग गए है। यही नहीं अब तो सरकारों के माथे पर भी पानी की समस्या की लकीरें दिखने लग गई है। कुछ समय पहले उतराखंड विधानसभा में नदियों के सूखने पर चिंता व्यक्त की गईथी। की देश की आधी आबादी से भी अधिक को जीवन देने वाली गंगा और यमुना नदियों पर संकट तेजी से बढ़ रहा है।
हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण यहां दोनों नदियों की सहायक जल धाराएं तेजी से सूख रही हैं। इससे नदियों के जल स्तर में भारी गिरावट आ रही है। यह बात तब सामने आई जब उत्तराखंड सरकार द्वारा विधानसभा पटल पर आर्थिक सर्वेक्षण कीएक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है। इस आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि बीते 150 वर्षों मेंगंगा और यमुना की 300 जल धाराएं पूरी तरह सूख चुकी हैं। यह भी बताया गया कि गंगा और यमुना नदियों की कुल 360 सहायक जलधाराएं थीं जिसमें से अब 300 पूरी तरहसूख चुकी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरण में आ रहे बदलावों के कारण दोनों नदियों की हिमालय से निकलने वाली 60 प्रतिशत जल धाराएं सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं। इस रिपोर्ट पर सदन में गहरी चिंता जताई गई है। मगर इसके समाधान के क्या उपाय हों इस पर कोई ब्लू प्रिंट अब तक सामने नहीं आ पाया है।
विधानसभा में पेश किए गए आंकड़े इसलिए पुख्ता हैं कि दोनो आंकड़े सरकारी और विकास के कामकाज से जुड़े है। इसमें किसी भी पर्यावरणविद् और जन आंदोलन की कोई बात नहीं जोड़ी गई है। यदि गंगा व यमुना के क्षेत्र के स्थानीय लोगों की बात को इस रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा तो सरकार के विकास का काला चिट्ठा सामने आजाएगा। यहां हम अभी यमुना की बात करेंगे तो पिछले 25 वर्षो तक यमनोत्री मंदिर के आस पास तीर्थयात्री यमनोत्री ग्लेशियर का भी दर्शन करते थे। मौजूदा समय में यहां कोई ग्लेशियर के नाम का एक छोटा सा बर्फ का टुकड़ा भी नहीं मिलता है। यमुना की धारा अपने मूल स्रोत से ही सूखने के कगार पर आ चुकी है। यमनोत्री से 14 किमी के आगे कीओर हनुमान चट्टी में यमुना से हनुमान गंगा संगम बनाती है। यहीं पर एक माइक्रोहाइडिल भी पिछले 10 वर्ष से बंद पड़ा है। क्योंकि जो हनुमान गंगा कभी यमुनाकी धारा को तीव्र गति से प्रवाहित करती थी उसकी धारा भी बहुत ही कमजोर हो चुकी है। इससे आगे यमुना से सैकड़ों जलधाराएं ऐसी थी जो वर्तमान में कहीं लुप्त प्राय ही हो चुकीहैं।
उधर गंगा का साक्षात उदाहरण वर्तमान का टिहरी बांध है। जिसका जलाशय सिर्फ और सिर्फ बरसात के दिनों ही भरता है। बाकि समय में यह जलाशय सूख जाता है और गंगाकी जलधारा मृगमरीचिका जैसी दिखने लगती है। यही नहीं टिहरी बांध भी अपने वायदेके अनुरूप अब तक दो हजार मेगावाट विद्युत का उत्पादन नहीं कर पाया है। बजाय आधेसे भी कम का टिहरी बांध से विद्युत उत्पादन हो रहा है। इस पर संबधित विभाग काकहना है कि गंगा में पानी इतना कम हो चुका है कि विद्युत उत्पादन की मुख्य टरबाईनचल ही नहीं पा रही है। अर्थात अब तो स्पष्ट हो चुका है कि जब नदियों का पानी इतनाकम हो चुका है इन नदियों को फीडबैक करने वाली लगभग सभी जलधाराएं सूख चुकी है। अतएव यह तो एक प्रकार की समस्या है जिसे प्रमाणिक तौर पर बताया जा सकता है किबारहमास जीवित रहने वाली जलधाराएं सूख चुकी है। इसीलिए तो गंगा और यमुना केमाईके में पानी के लिए हाहाकार मचा रहता है।
इधर वैज्ञानिकों की माने तो वे स्पष्ट वक्तव्य देते हैं कि जलधाराओं का सूखना मौसम परिवर्तन का ही कारण है। जिसके लिए वे सुझाते है कि जैवविविधता का संरक्षण करना अनिवार्य हो चुका है। लोगो को अपने रहन-सहन में भोग विलासता को छोड़ना होगा। इस पर जानकारों का कहना है कि जनता के नुमाइंदो को भी विकास की योजनाओं को स्थानीयता को मद्देनजर रखते हुए बनानी चाहिए। वे कहते हैं कि स्थानीय पर्यावरण वप्रकृति के विपरित जब भी कोई योजना बनती है तो वे सीधा-सीधा प्राकृतिक संसाधनो परप्रहार करती है। जिसका खमियाजा आमजन को भुगतना पड़ता है। कुछ लोगो का मत है कि सरकारी स्तर पर जनता के नुमाइंदे बिना तैयारी के विकास की कहानी लिख देते है।जैसे बड़ी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं, कृषि विकास की बड़ी-बड़ी योजनाएं। इस तरह की योजनाओं से स्थानीयता पर गहरा घाव पड़ता है। ऐसी विशाल योजनाओं के कारण जल, जंगल, जमीन का अनियोजित दोहन होता है। सुझाव आया कि प्राकृतिक संसाधनो पर विशाल नहीं बल्कि छोटी व मंझौली योजनाएं बनाय जाए जिससे स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलेगा और साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनो का भी संरक्षण होगा।
अगले पांच वर्ष जल संरक्षण के
उतराखंड सरकार का दावा है कि अगले पांच साल में चार हजार जल स्रोत बचाए जाएंगे। गंगा और यमुना की जलधाराओं के सूखने और जमीन मेंपानी के स्तर में लगातार आ रही कमी को देखते हुए राज्य सरकार ने चार हजार जलस्रोतों को चिह्नित किया है। इनके जल स्तर में लगातार गिरावट आ रही है। इन जलस्रोतों को बचाने के लिए विशेष कार्य योजना तैयार की गई है। अगले पांच सालों में इसपर कार्य किया जाएगा। इसके साथ ही अन्य जल स्रोतों की मैपिंग भी कराई जा रही है।
व्यवस्था है पर प्रबंधन नहीं
अब तक की सरकारें नदियों के संरक्षण के लिए सिर्फ गाल बजाती ही दिखाई दी है। 2014 से नदी संरक्षण का हो-हल्ला और ही तेज हुआ है। मगर नदियों को बचाने की मुहिम कमजोर ही दिखाई दे रहीहै। नमामि गंगे जैसी योजना के तहत गंगा और यमुना के कैचमेंट एरिया में राज्य में 23, 372 वर्ग किमी यानी कुल 43 प्रतिशत क्षेत्र में वनीकरण कार्य होने थे। इसके लिए 2017-18 में केंद्र सरकार द्वारा 10 करोड़ 87 लाख रुपये दिए गए। लेकिन इसमें से साढ़े पांच करोड़ ही खर्च हो पाए हैं।


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