साथी को बचाने के लिए गोलियों के सामने डट गए कैप्टन दीपक सिंह, शौर्य चक्र से अमर हुई वीरता

साथी को बचाने के लिए गोलियों के सामने डट गए कैप्टन दीपक सिंह, शौर्य चक्र से अमर हुई वीरता

देश की सुरक्षा में तैनात सैनिकों की बहादुरी की कहानियां केवल इतिहास का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, कर्तव्य और बलिदान की मिसाल बन जाती हैं। ऐसे ही एक अमर योद्धा थे कैप्टन दीपक सिंह, जिन्होंने आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान अपने साथी सैनिक की जान बचाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी अदम्य वीरता और निस्वार्थ कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया।

अगस्त 2024 में जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले के असर  क्षेत्र में आतंकियों की मौजूदगी की सूचना मिलने के बाद भारतीय सेना की 48 राष्ट्रीय राइफल्स की टीम को एक बड़े ऑपरेशन पर भेजा गया। इस ऑपरेशन की कमान कैप्टन दीपक सिंह संभाल रहे थे। घने जंगल, पहाड़ी इलाका और दुश्मन की छिपी गतिविधियों के बीच उन्होंने अत्यंत रणनीतिक तरीके से अपनी टीम को आगे बढ़ाया और आतंकियों की गतिविधियों पर नजर बनाए रखी।

रिपोर्टों के अनुसार, 13 अगस्त की शाम को आतंकियों की हलचल दिखने पर कैप्टन दीपक सिंह ने अपनी टीम को तत्काल सक्रिय किया और घेराबंदी कर जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। अंधेरा बढ़ने और आतंकियों के चट्टानों के बीच छिप जाने के बावजूद उन्होंने पूरी रात अपने जवानों के साथ मोर्चा संभाले रखा। अगले दिन सुबह उन्होंने सर्च ऑपरेशन को फिर तेज किया, जिसमें हथियार और गोला-बारूद बरामद किए गए।

लेकिन असली परीक्षा तब सामने आई जब घायल आतंकी ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी और एक साथी सैनिक सीधी गोलीबारी की चपेट में आ गया। उस निर्णायक क्षण में कैप्टन दीपक सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने साथी को बचाने का फैसला किया। उन्होंने तुरंत साथी सैनिक को धक्का देकर सुरक्षित स्थान की ओर पहुंचाया और खुद गोलियों का सामना किया। इस दौरान उन्हें कई गोलियां लगीं, लेकिन गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने जवाबी फायर जारी रखा और आतंकी को गंभीर नुकसान पहुंचाया। अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की।

कैप्टन दीपक सिंह की यह बहादुरी केवल सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह उस भावना का प्रतीक थी जिसमें सैनिक अपने साथियों और देश की सुरक्षा को अपने जीवन से ऊपर रखते हैं। उनका बलिदान भारतीय सेना की उस परंपरा को मजबूत करता है, जिसमें “सेवा परमो धर्म” केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य होता है।

मरणोपरांत प्रदान किया गया शौर्य चक्र उनकी वीरता का राष्ट्रीय सम्मान है। यह पुरस्कार उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने असाधारण साहस और कर्तव्य के प्रति सर्वोच्च समर्पण दिखाया हो। राष्ट्रपति द्वारा यह सम्मान कैप्टन दीपक सिंह को उनकी अद्वितीय वीरता, साथी सैनिक की जान बचाने और आतंकियों से मुकाबले में असाधारण साहस दिखाने के लिए दिया गया।

उत्तराखंड के इस वीर सपूत ने बहुत कम उम्र में देश सेवा का वह अध्याय लिख दिया, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल आदेश देने में नहीं, बल्कि सबसे कठिन परिस्थिति में सबसे आगे खड़े होने में होता है। कैप्टन दीपक सिंह का नाम भारतीय सेना के उन अमर योद्धाओं में हमेशा गर्व से लिया जाएगा, जिन्होंने अपने साथी की रक्षा और देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

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