कोटद्वार गढ़वाल वन प्रभाग के दीवा रेंज मुख्यालय धुमाकोट में करीब 22 दिनों से पिंजरे में कैद एक नर गुलदार की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गुलदार को रेस्क्यू सेंटर भेजने या फिर जंगल में छोड़ने को लेकर समय पर निर्णय नहीं हो सका। विभागीय अधिकारियों द्वारा उच्चाधिकारियों से लगातार दिशा-निर्देश मांगे जाते रहे, लेकिन स्पष्ट आदेश नहीं मिलने के कारण गुलदार लंबे समय तक पिंजरे में कैद रहा और आखिरकार 25 जुलाई को उसने दम तोड़ दिया।
मामला नैनीडांडा क्षेत्र के सल्ड महादेव इलाके के बणासी गांव का है। यहां 65 वर्षीय सुशीला देवी, पत्नी स्वर्गीय अनूप सिंह, को गुलदार ने हमला कर मार डाला था। घटना के बाद ग्रामीणों में दहशत फैल गई और वन विभाग पर आदमखोर गुलदार को पकड़ने का दबाव बढ़ गया। वन विभाग की टीम ने घटनास्थल से महिला के शव के पास मिले सैंपल एकत्र कर जांच के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) भेजे।
इसी बीच 3 जुलाई की रात घटनास्थल के पास लगाए गए पिंजरे में एक नर गुलदार कैद हो गया। वन विभाग की टीम ने उसे धुमाकोट स्थित दीवा रेंज मुख्यालय में शिफ्ट कर दिया। पकड़े गए गुलदार के सैंपल भी डीएनए मिलान के लिए डब्ल्यूआईआई भेजे गए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि वही गुलदार महिला की मौत के लिए जिम्मेदार था या नहीं।
जांच रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और जटिल हो गई। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट में घटनास्थल से लिए गए सैंपल और पकड़े गए गुलदार के सैंपल का मिलान नहीं हुआ। इससे स्पष्ट हो गया कि पिंजरे में कैद गुलदार के हमले में शामिल होने की पुष्टि नहीं हो सकी। इसके बाद गढ़वाल वन प्रभाग के अधिकारियों के सामने सवाल खड़ा हो गया कि गुलदार को रेस्क्यू सेंटर भेजा जाए या उसे किसी सुरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ा जाए।
बताया गया कि डीएफओ गढ़वाल ने इस संबंध में उच्चाधिकारियों से दिशा-निर्देश मांगे थे। हालांकि, अंतिम निर्णय और लिखित आदेश का इंतजार लंबा खिंचता गया। इस दौरान गुलदार धुमाकोट रेंज मुख्यालय में पिंजरे में ही कैद रहा।
वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, पकड़ा गया नर गुलदार लगभग 8 से 10 वर्ष का था। 6 जुलाई को पशु चिकित्सकों ने उसका स्वास्थ्य परीक्षण किया था, जिसमें वह पूरी तरह स्वस्थ पाया गया था। हालांकि, गुलदार काफी आक्रामक था। पशु चिकित्सकों ने अपनी रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया था कि उसे लंबे समय तक छोटे पिंजरे में कैद रखना उचित नहीं होगा।
समय बीतने के साथ गुलदार की हालत बिगड़ती गई। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, पिंजरे में लगातार संघर्ष करने के दौरान उसने खुद को चोटिल कर लिया था। उसका उपचार भी कराया गया, लेकिन उसकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका। करीब 22 दिनों तक कैद रहने के बाद 25 जुलाई को गुलदार की मौत हो गई।
डीएफओ गढ़वाल महातिम यादव ने बताया कि गुलदार पिंजरे में लगातार संघर्ष कर रहा था और उसने स्वयं को घायल कर लिया था। विभाग की ओर से उसका उपचार कराया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। वहीं, रेंज अधिकारी सुभाष घिल्डियाल के अनुसार, गुलदार की मौत के बाद दो पशु चिकित्सकों के पैनल से उसका पोस्टमार्टम कराया गया। जांच के लिए विसरा सुरक्षित रख लिया गया है। आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद गुलदार के शव का निस्तारण कर दिया गया।
यह घटना वन्यजीव प्रबंधन और विभागीय निर्णय प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी जंगली जानवर को पकड़ने के बाद उसके पुनर्वास, उपचार या स्थानांतरण को लेकर समयबद्ध निर्णय जरूरी होता है। लंबे समय तक पिंजरे में कैद रहने से वन्यजीवों में तनाव, आक्रामकता और शारीरिक चोट का खतरा बढ़ सकता है।
गुलदार की मौत के बाद स्थानीय लोगों और वन्यजीव प्रेमियों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। एक ओर ग्रामीण क्षेत्र में गुलदार के हमलों से सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोग पकड़े गए जानवरों के समयबद्ध प्रबंधन और विभागीय जवाबदेही की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट और विसरा जांच से गुलदार की मौत के वास्तविक कारणों का पता चल सकेगा।








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