सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है, “जिस तरह की प्रलयंकारी तबाही नेपाल में आई, क्या वैसी ही विभीषिका उत्तराखंड में भी आ सकती है?” डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘हिल-मेल’ पर वरिष्ठ पत्रकार विजय नेगी ने इसी गंभीर विषय पर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय (श्रीनगर) के भू-विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट से गहन वैज्ञानिक व तकनीकी वार्ता की। प्रो. बिष्ट ने यह साफ कर दिया कि भौगोलिक और भू-वैज्ञानिक रूप से नेपाल से लेकर उत्तराखंड तक सब एक ही संवेदनशील सूत्र में बंधे हैं।
नेपाल की भोटेकोशी घाटी में हुई तबाही केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक चेतावनी है। साक्षात्कार के पहले सवाल, “क्या नेपाल जैसी तबाही उत्तराखंड में भी आ सकती है?”, का जवाब देते हुए प्रो. बिष्ट ने सीधे तथ्यों पर बात की। उन्होंने कहा, “निश्चित तौर पर ! उत्तराखंड में ऐसी तबाही पहले भी कई बार देखी जा चुकी है।
हमारे पास 1893-1894 (बिरही गंगा/गौना ताल हादसा), 2013 की भीषण केदारनाथ आपदा और 2021 की ऋषि गंगा-धौलीगंगा (रैणी गांव) जल प्रलय के स्पष्ट ऐतिहासिक व वैज्ञानिक दस्तावेज मौजूद हैं। पिछले साल धराली और इस साल धौलीगंगा के तमाक क्षेत्र की घटनाएं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि यह खतरा हर पल सिर पर खड़ा है।
नेपाल, सिक्किम, भूटान, उत्तराखंड, हिमाचल या जम्मू-कश्मीर, पूरे हिमालयी बेल्ट की भू-आकृतियां, भूगर्भीय संरचना, भूकंपीय संवेदनशीलता और पारिस्थितिकी वातावरण बिल्कुल एक समान हैं। जो त्रासदी कल नेपाल में घटी, वह उत्तराखंड व हिमाचल में भी घट सकती है, इसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
भूविज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर एम.पी.एस. बिष्ट का मानना है, “पूरे हिमालयी बेल्ट में भूगर्भीय और मौसमी बदलाव एक जैसे पैटर्न पर काम करते हैं। नेपाल के ग्लेशियरों में जिस तरह का बदलाव देखा जा रहा है, ठीक उसी तरह की परिस्थितियां उत्तराखंड के ग्लेशियरों में भी बनी हुई हैं। ऐसे में नेपाल की आपदा को देखकर उत्तराखंड को भी अलर्ट मोड पर आने की सख्त जरूरत है, क्योंकि यह खतरा सीमा पार से पूरी हिमालयी घाटी तक फैला हुआ है। उत्तराखंड हर साल मानसून के दौरान किसी न किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का सामना करता है।”
“हिमालयी क्षेत्र में विकास और पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। नेपाल से लेकर उत्तराखंड तक, कुदरत बार-बार हमें चेतावनी दे रही है कि यदि हमने समय रहते वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, तो परिणाम और भी घातक हो सकते हैं।”- प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट, भू विज्ञान विभागाध्यक्ष, एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय
बढ़ते तापमान से सदियों पुराने हिमनद तेजी से गल रहे
प्रो. बिष्ट ने वार्ता के दौरान आम भाषा में उस विनाशकारी प्रक्रिया को समझाया, जिसे विज्ञान की दुनिया में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनद झील विस्फोट से उत्पन्न बाढ़ कहा जाता है। उन्होंने बताया,ग्लोबल वार्मिंग और स्थानीय तापमान वृद्धि के कारण सदियों पुराने हिमनद तेजी से गल रहे हैं और पीछे खिसकते जा रहे हैं। ग्लेशियर के पिघलने से उनके आगे और किनारों पर मलबे, पत्थरों और कच्ची मिट्टी का एक प्राकृतिक बांध बन जाता है, जिसके पीछे लाखों-करोड़ों घन मीटर पानी इकट्ठा होकर एक विशालकाय झील का रूप ले लेता है।
ये बांध सीमेंट या कंक्रीट के नहीं, बल्कि केवल ढीले बोल्डरों और बर्फ की पकड़ पर टिके होते हैं। जब अत्यधिक बारिश, बादल फटने या ऊपर से भारी हिमस्खलन से पानी का आयतन अचानक बढ़ता है, तो यह कच्चा तटबंध पानी के भारी दबाव को रोक नहीं पाता और फट पड़ता है। परिणाम यह होता है कि कुछ ही मिनटों के भीतर लाखों टन मलबा और पानी नीचे की घाटियों (डाउनस्ट्रीम) की ओर सुनामी की गति से दौड़ता है, जैसा कि केदारनाथ में चोराबाड़ी झील और चमोली के रैणी क्षेत्र में देखा गया था।
टिहरी बांध: कितना सुरक्षित और कितना बड़ा जोखिम?
उत्तराखंड की जलविद्युत परियोजनाओं और विशेषकर एशिया के सबसे ऊंचे बांधों में शामिल टिहरी बांध को लेकर लंबे समय से सुरक्षा से जुड़े प्रश्न उठते रहे हैं। साक्षात्कार में जब यह सवाल उठा कि क्या भविष्य में कभी ऐसी नौबत आ सकती है कि ऊपर से आए सैलाब के दबाव में टिहरी बांध को गंभीर नुकसान पहुंचे या वह टूट जाए, तो प्रो. बिष्ट ने एक बेहद संतुलित लेकिन सतर्क भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखा।
उनका कहना है, टिहरी बांध एक अर्थ एंड रॉक-फिल डैम है, जो कंक्रीट बांधों की तुलना में भूकंप के झटकों को सहने में अधिक सक्षम माना जाता है। बांध का ढांचा भले ही भूकंपरोधी तकनीक से तैयार किया गया हो, लेकिन यदि ऊपरी कैचमेंट क्षेत्र (भागीरथी और भिलंगना घाटियों) में एक साथ कई बड़े बादल फटने या विशाल हिमनद झील विस्फोट से उत्पन्न बाढ़ की चरम मौसमी घटना घटती है, तो जलाशय में गाद और पानी का दबाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ सकता है।
बांध की तकनीकी क्षमता से अधिक बड़ा सवाल यह है कि यदि भारी अंतर्वाह के चलते स्पिलवे के सारे गेट्स एक साथ पूरी क्षमता से खोलने पड़े, तो देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार और मैदानी इलाकों की घनी आबादी पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। प्रो. बिष्ट के अनुसार, सुरक्षा का पैमाना केवल बांध की दीवार का सुरक्षित रहना नहीं है, बल्कि डाउनस्ट्रीम में बसे लाखों इंसानों की जिंदगी को सुरक्षित रखना भी है।
प्रोफेसर बिष्ट के अनुसार, “टिहरी बांध के जलस्तर का सटीक प्रबंधन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं। यदि ऊपरी इलाकों में ग्लेशियर टूटते हैं या बादल फटते हैं, तो बांध के रिजरवायर में पानी का दबाव अचानक बढ़ता है। ऐसे में वैज्ञानिक चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन टीमों के बीच त्वरित समन्वय ही किसी भी बड़े संभावित जोखिम को टाल सकता है।
हिमालयी क्षेत्र में विकास और पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। नेपाल से लेकर उत्तराखंड तक, कुदरत बार-बार हमें चेतावनी दे रही है कि यदि हमने समय रहते वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, तो परिणाम और भी घातक हो सकते हैं।”
सैटेलाइट नहीं, जमीनी फील्ड-वर्क से ही मिलेगी सुरक्षा
आपदा प्रबंधन की आधुनिक कार्यप्रणाली पर प्रो. बिष्ट ने बेहद कड़ा और साहसिक रुख अपनाया। वर्तमान में सरकारी एजेंसियां आपदा पूर्व चेतावनी के लिए मुख्य रूप से रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजरी पर निर्भर रहती हैं। इस पर सवाल उठाते हुए भूविज्ञानी ने कहा, “सैटेलाइट तस्वीरें बादलों, मौसम और तकनीक की उपलब्धता के भरोसे रहती हैं।
जब भयंकर मानसून में आसमान घने बादलों से ढका होता है, तब सैटेलाइट भी जमीन की वास्तविक स्थिति को समय पर नहीं दिखा पाता। इसके विपरीत,वैज्ञानिकों का वास्तविक ‘फील्ड-वर्क डेटा’ आपके अपने हाथ में होता है।
जब वैज्ञानिकों और तकनीकी टीमों को वास्तविक ग्लेशियरों पर भेजा जाएगा, तभी पता चलेगा कि किस झील में कितना पानी बढ़ रहा है, मलबे की दीवार में कहां दरारें आ रही हैं और खतरा कितना वास्तविक है। केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर आपदा की सटीक चेतावनी नहीं दी जा सकती। जितनी जल्दी जमीनी स्तर पर तैयारी होगी, उतनी ही जल्दी हम लोगों को सुरक्षित निकाल पाएंगे।”
सुरंगें, चारधाम ऑल वेदर रोड और पर्यावरण की वहन क्षमता
उत्तराखंड के संवेदनशील पहाड़ों के सीने को चीर कर बनाई जा रही सैकड़ों किलोमीटर लंबी सुरंगों, रेल परियोजनाओं और अंधाधुंध सड़क चौड़ीकरण पर भी प्रो. बिष्ट ने गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा, हिमालय दुनिया की सबसे युवा और कच्ची पर्वत श्रृंखला है।
भारी ब्लास्टिंग और मशीनी ड्रिलिंग से पहाड़ों की आंतरिक जल शिराएं सूख रही हैं और पहाड़ अंदर से खोखले व अस्थिर हो रहे हैं। विकास की अंधी दौड़ में पहाड़ों की प्राकृतिक ढलानों को समकोण (90 डिग्री) पर काटा गया है, जिसके चलते हर मानसून में सड़कें मलबे में तब्दील हो जाती हैं और पूरा जनजीवन हफ्तों तक ठप पड़ जाता है।
पर्यटन का अनियंत्रित दबाव: “हम प्रकृति की प्रक्रिया को खुद तेज कर रहे हैं” साक्षात्कार के अंतिम चरण में प्रो. एमपीएस बिष्ट ने राज्य की अनियंत्रित पर्यटन और तीर्थाटन नीति पर सीधा प्रहार किया। धार्मिक भावनाओं का आदर करते हुए भी उन्होंने इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को स्पष्ट वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया।
प्रो. बिष्ट के अनुसार, बद्रीनाथ, केदारनाथ और अन्य उच्च हिमालयी धामों पर अपनी पारिस्थितिकीय वहन क्षमता से कई गुना अधिक लाखों लोगों को पहुंचाया जा रहा है। इन अत्यंत संवेदनशील क्षेत्रों में हर यात्री के शरीर की गर्मी, निरंतर उड़ने वाले हेलीकॉप्टरों का गर्म धुआं, खच्चर-घोड़ों की भारी आवाजाही, हीटर, जनरेटर, लकड़ी और केरोसिन का धुआं मिलकर वहां के सूक्ष्म-जलवायु को अचानक गर्म कर रहे हैं।
प्रो. बिष्ट ने साफ शब्दों में आगाह किया, “ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर पहले ही तेजी से पिघल रहे हैं, लेकिन हम अपनी अनियंत्रित गतिविधियों से उस विनाशकारी प्रक्रिया को और ज्यादा तेज कर रहे हैं। यदि हम इसमें मात्र दो प्रतिशत की भी कृत्रिम वृद्धि कर रहे हैं, तो वह हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए घातक है। काश, हम समझ पाते कि इस मानवीय दबाव को दो प्रतिशत भी कम करना हमारा सबसे बड़ा योगदान होता, लेकिन दुर्भाग्य से जमीनी स्तर पर इसका ठीक उल्टा हो रहा है।”





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