उत्तराखंड की संस्कृति, यहां का खानपान, संगीत, पहनावा, बोलचाल – ये सारी चीजें अपने आप में समृद्ध हैं, लेकिन कहीं ना कहीं आज के मॉडर्न हो रहे जमाने में वो अपनी पहचान खो रही हैं। ऐसे में पिछले एक साल में ओहो रेडियो ने इस खोती पहचान को संजोने की कोशिश की। यह कोशिश ‘सोच लोकल, अप्रोच ग्लोबल’ के विजन के साथ लोगों के सामने आई। संगीत, शिक्षा, साहित्य, स्पोर्ट्स, करियर, पलायन, समाज और उत्तराखंड की हर बात को ओहो रेडियो नए तरीके से पेश किया। ओहो रेडियो की लांचिंग के ऐलान की पहली वर्षगांठ को शानदार तरीके से सेलीब्रेट किया गया।

राज्य स्थापना दिवस के दिन ओहो उमंगोत्सव के रूप में सजाई गई इस शाम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, प्रख्यात कवि एवं लोक गायक गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी, लोकगायक पद्मश्री प्रीतम भरतवाण विशेष रूप से पहुंचे। इस मौके पर उत्तराखंड के कई कलाकारों ने अपने सुरों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। नैननाथ रावल, किशन महिपाल, कैलाश कुमार, संजय पांडे,लता तिवारी पांडे, रेशमा शाह, पूरन सिंह राठौर, टीम घुघूती जागर, मेघना चंद्रा जैसे कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर सीएम पुष्कर सिंह धामी ने विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान देने वालों को सम्मानित करते हुए कहा कि समाज हित में कार्य करने वाले लोग समाज को जोड़ने का भी कार्य करते हैं। उन्होंने अपनी लोक संस्कृति एवं लोक कला को बढ़ावा देने वालों के प्रयासों की भी सराहना की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, प्रीतम भरतवाण तथा नैननाथ रावल के साथ ‘बेडू पाको बारामासा’ लोकगीत भी गाया। सीएम धामी के आग्रह पर प्रीतम भरतवाण ने ‘सरूली मेरु जिया’ और नरेंद्र सिंह नगी ने ‘ठंडो रे ठंडो’ गीत पेश किया। 77 वर्षीय नैननाथ रावल ने जब मंच पर अपनी प्रस्तुति दी तो लोगों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया।

ओहो रेडियो की एक साल की यात्रा का जिक्र करते हुए सीओओ मोनिका सोलंकी ने कहा कि नौ नवंबर को हमने उत्तराखंड का पहला डिजिटल रेडियो लाने की घोषणा की थी। फरवरी, 2021 से इसका प्रसारण शुरु किया गया। लेकिन इतने कम समय में ओहो रेडियो को इसकदर पसंद किया जाएगा। इसकी हमें भी उम्मीद नहीं थी। यह उत्तराखंड की संस्कृति, लोक और परंपरा को नई पीढ़ी तक ले जाने का ईमानदार प्रयास था, जिसका अभी तक का सफर बेहद शानदार रहा है।

आरजे काव्य ने बताया कि फरवरी में लांच के बाद हम मार्च में हिल-यात्रा पर गए तो पता चला कि सुदूर इलाकों में भी ओहो रेडियो को लोग सुन रहे हैं, इसे पसंद कर रहे हैं। लोगों को हमसे काफी उम्मीदें हैं, हम उन पर खरा उतरने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे यहां 80 प्रतिशत गाने पहाड़ी होते हैं। हम नए कलाकारों को प्रमोट कर रहे हैं। हमें इस बात से काफी प्रोत्साहन मिलता है, जब कोई महिला सोशल मीडिया पर आकर यह कहती है कि हम घास काटने जाते हैं तो ओहो रेडियो सुनते हैं। अगले साल में कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी कंटेट पर काम करने वाले हैं।

काव्य ने कहा कि इस यात्रा में हिल-मेल का बड़ा सहयोग रहा। हिल-मेल के साथ हम लगातार समसामायिक मुद्दों पर चर्चा करते हैं। उत्तराखंड की कई नामीगिरामी और राष्ट्रीय स्तर की शख्सियतों ने इस ज्वाइंट प्रोग्राम में शिरकत की। कोरोना काल में हिल-मेल और ओहो रेडियो के लाइव ओपीडी को काफी सराहा गया। हिल-मेल ओहो उमंगोत्सव में मीडिया पार्टनर रहा। आज हम उत्तराखंड में कई जगह रेडियो पार्टनर बन रहे हैं। टिहरी लेक फेस्टिवल, कुंभ और मरचूला फेस्टिवल में हम पार्टनर रहे। सरकारी विभाग हमारे साथ कोलेबरेशन करना चाहते हैं। फरवरी में लांचिंग के बाद से पौने दो लाख डाउनलोड हो चुके हैं। आज दुनिया भर में एक हज़ार से ज़्यादा लोकेशंस पर लोग ओहो रेडियो ऐप के माध्यम से पहाड़ी गानों का लुत्फ़ उठा रहे हैं।


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