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हिमालय में सुरंगें: छिन्न-भिन्न हो रहा भूगर्भीय जल तंत्र 

उत्तराखंड के चमोली जिले में 520 मेगावाट की विष्णुगाड़-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की टेल-रेस सुरंग के भीतर हुआ हादसा केवल एक यांत्रिक विफलता या सामान्य इंजीनियरिंग चूक नहीं थी। यह घटना एक बार फिर इस बात का भयावह प्रमाण बनी है कि अत्यंत संवेदनशील और भंगुर हिमालयी क्षेत्र में बेतहाशा भूमिगत उत्खनन की कितनी भारी कीमत हमें चुकानी पड़ रही है। अचानक सुरंग का एक बड़ा हिस्सा ढह गया। इसके साथ ही अत्यंत उच्च दबाव वाले पानी, कीचड़ और भारी मलबे के भीषण विस्फोट ने सुरंग में बाढ़ पैदा कर दी। अचानक आई जल-प्रलय ने 22 श्रमिकों को आगोश में ले लिया, जिनमें से दस मजदूरों की असमय दर्दनाक मौत हो गई।

जयसिंह रावत, देहरादून

यदि हम निष्पक्ष भूवैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो इस संपूर्ण हिमालयी मोड़दार एवं भ्रंश क्षेत्र में जलविद्युत तथा परिवहन परियोजनाओं के लिए सुरंगों के निर्माण के दौरान भूमिगत प्राकृतिक जल-भंडारों के लगातार छिन्न-भिन्न होने का एक श्रृंखलाबद्ध पैटर्न नजर आता है। भारतीय हिमालय को ‘तीसरे ध्रुव’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसमें बर्फ के रूप में एक महासागर जितना पानी जमा है।

इसकी सतह पर दिखाई देने वाले ग्लेशियरों और जमी हुई बर्फ की परतों से परे, पहाड़ों की अगाध गहराइयों में एक अत्यंत जटिल, विस्तृत और आपस में जुड़ा हुआ प्राकृतिक जल-विज्ञान तंत्र छिपा हुआ है। भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच करोड़ों वर्षों से जारी और आज भी निरंतर चल रही टक्कर के कारण इसकी भूगर्भीय परतें अत्यधिक कुचली हुई, संकुचित और अनगिनत जोड़ों तथा दरारों से अटी पड़ी हैं।

सदियों से पिघलती बर्फ और बारिश का जल इन भूगर्भीय दरारों, भ्रंश रेखाओं और दबी हुई चट्टानी द्रोणियों में गहराई तक रिसता रहता है। इसी प्रक्रिया से पहाड़ों के भीतर अत्यधिक जल-दबाव वाले विशाल भूमिगत जलभृतों का निर्माण हुआ है। दरारों वाली चट्टानों के सूक्ष्म छिद्रों में फंसा पानी बाहर की ओर धकेलने वाला एक प्राकृतिक पोर-वाटर दबाव पैदा करता है।

यह आंतरिक जल-दबाव ऊपर स्थित विशालकाय पहाड़ों के अत्यधिक वजन को स्थिर रखने और उन्हें ढहने से रोकने के लिए एक अनिवार्य प्राकृतिक कुशन या सहारे का काम करता है। इसके साथ ही ये उच्च-दबाव वाले भूमिगत जल-भंडार सतह के पारिस्थितिकी तंत्र को निरंतर जीवन प्रदान करते हैं। यह जल अपनी प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण प्रणालियों के माध्यम से रिसकर पहाड़ों की सतह पर पारंपरिक पेयजल स्रोतों, जैसे कि धारों और जलभृतों से पोषित नौलों को निरंतर पानी उपलब्ध कराता है।

ध्यान देने योग्य यह है कि हिमालय की सारी नदियों के स्रोत ग्लेशियर नहीं हैं। कुछ छोटी नदियों और नालों का स्रोत यही भूमिगत जल तंत्र है। लेकिन, जब आधुनिक निर्माण एजेंसियां टनल बोरिंग मशीनों अथवा भारी विस्फोट एवं ड्रिलिंग पद्धतियों के जरिए इन भूगर्भीय रूप से जटिल और संवेदनशील क्षेत्रों में कई-कई किलोमीटर लंबी सुरंगें खोदती हैं, तो वे इस प्राचीन और संतुलित जलतंत्र पर घातक प्रहार करती हैं। किसी जल-युक्त भ्रंश क्षेत्र या प्राकृतिक जल-भंडार को सुरंग खोदकर भेदना ठीक वैसा ही है जैसे किसी अत्यंत उच्च-दबाव वाले पानी के टैंक में नीचे से बड़ा छेद कर दिया जाए।

ऐसा होते ही वह सुरंग एक विशाल कृत्रिम निकासी पाइप में बदल जाती है। इससे अचानक बड़े पैमाने पर जल-निकासी होने लगती है और कुछ ही घंटों या दिनों के भीतर आसपास की चट्टानी परतों से करोड़ों लीटर शुद्ध प्राकृतिक जल बहकर बाहर निकल जाता है।

जब पहाड़ों के भीतर का यह प्राकृतिक द्रव-दबाव अचानक समाप्त हो जाता है, तो आंतरिक सहारे से वंचित हुई कमजोर चट्टानी संरचनाएं अपने ही अत्यधिक वजन के कारण नीचे बैठने लगती हैं। यही वह मुख्य भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके कारण सतह पर भीषण भू-धंसाव होता है और जोशीमठ के सैकड़ों घरों, सड़कों तथा खेतों में आई भयानक दरारों और जमीन धंसने के पीछे भी यही मुख्य कारण काम कर रहा था।

बार-बार दोहराई जाने वाली मानवनिर्मित आपदाएं 

पहाड़ों में भूमिगत जल-भंडारों का इस तरह फटना कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह बार-बार दोहराई जाने वाली मानवनिर्मित आपदा है। दिसंबर 2009 में, जब पास ही स्थित तपोवन-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना की टनल बोरिंग के दौरान सतह से 900 मीटर से भी अधिक गहराई में स्थित एक अत्यधिक दबाव वाले प्राकृतिक जलभृत फट गया था।

उस भीषण पंक्चर के बाद कई महीनों तक 600 से 700 लीटर प्रति सेकेंड की आश्चर्यजनक दर से भूजल बहकर बर्बाद हो गया और इसका सीधा असर आसपास के पहाड़ी इलाकों के पारंपारिक जलस्रोत और धारे नालों पर पड़ा। पीपलकोटी में हुआ हालिया हादसा इस बात का दुखद प्रमाण है कि हमने अतीत की इन भीषण गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रेल अवसंरचना जोखिमों को निमंत्रण

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग होती हुई रेल लाइनों को 3,000 मीटर से भी अधिक ऊंचाई पर स्थित पवित्र धामों, बद्रीनाथ और केदारनाथ तक विस्तारित करने की महत्वाकांक्षी योजनाएं प्रस्तावित हैं। इतनी अत्यधिक ऊंचाई पर उच्च-हिमालयी क्षेत्रों में रेल अवसंरचना का निर्माण करना अभूतपूर्व भूवैज्ञानिक और जल-वैज्ञानिक जोखिमों को निमंत्रण देना है।

इन विशालकाय परियोजनाओं के समर्थक अक्सर चीन की ल्हासा-तिब्बत रेलवे जैसी उच्च-पर्वतीय रेल प्रणालियों का उदाहरण देकर इनकी इंजीनियरिंग साध्यता को साबित करने की कोशिश करते हैं। परंतु वास्तविकता यह है कि तिब्बत मुख्य रूप से एक अत्यंत स्थिर, कठोर, समतल और प्राचीन महाद्वीपीय पठार है। वहां रेलें मुख्य रूप से खुले समतल धरातल पर चलती हैं और उन्हें सक्रिय भूकंपीय भ्रंश रेखाओं को काटकर गहरी सुरंगों से गुजरने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

इसके ठीक विपरीत, उच्च भारतीय हिमालय की भौगोलिकी तीखी, अस्थिर, अत्यंत ढलान वाली वी-आकार की घाटियों और पूरी तरह कुचली व पिसी हुई चट्टानों से भरी पड़ी है। बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसे ऊंचे धामों तक रेल सुरंगों का विस्तार करने का सीधा सा अर्थ है,पहाड़ों के मुख्य जल-संग्रहण और उच्च-पर्वतीय जलभृतों के पुनर्भरण क्षेत्रों को सीधे तौर पर काट देना। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग 125 किलोमीटर लंबी रेल लाइन का 100 किलोमीटर से भी अधिक हिस्सा पहले से ही जमीन के भीतर सुरंगों में समाया हुआ है।

तिब्बत से तुलना बेमानी

चीन का ल्हासा-तिब्बत रेलवे मॉडल भारतीय हिमालय की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों से बिल्कुल अलग है तिब्बत मुख्य रूप से स्थिर, कठोर, समतल और प्राचीन महाद्वीपीय पठार है, जहां अधिकांश रेल लाइन खुले धरातल पर है तिब्बत में रेल नेटवर्क को सक्रिय भूकंपीय भ्रंश रेखाओं को काटकर गहरी सुरंगों से गुजारने की आवश्यकता नहीं पड़ती भारतीय उच्च हिमालय तीखी ढलानों, कच्ची एवं भंगुर चट्टानों और गहरी वी-आकार की अत्यंत संवेदनशील घाटियों से बना है बद्रीनाथ-केदारनाथ तक रेल सुरंगों के विस्तार से उच्च-पर्वतीय जलभृतों और जल-संग्रहण क्षेत्रों के नष्ट होने का गंभीर खतरा है ऋषिकेश-कर्णप्रयाग 125 किमी रेल लाइन का 100 किमी से अधिक हिस्सा पहले से ही भूमिगत सुरंगों में समाया हुआ है

पारंपरिक सिविल इंजीनियरिंग मॉडल पूरी तरह सफल नहीं

हिमालय में बार-बार होने वाली ये भीषण दुर्घटनाएं, तेजी से घटता भूजल स्तर, सूखते पारंपरिक पेयजल स्रोत और ढहती हुई सुरंगें इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि हमारा पारंपरिक सिविल इंजीनियरिंग मॉडल पूरी तरह सफल नहीं है। यह मॉडल पहाड़ों को केवल कंक्रीट और पत्थरों का एक निर्जीव व स्थिर ढांचा मानने की भारी भूल करता है। केवल ऊपरी धरातली सर्वेक्षण और नाममात्र के कुछ परीक्षण बोरहोल पहाड़ों की गहराइयों में, भ्रंश रेखाओं के पीछे छिपे इन उच्च-दबाव वाले जलभृतों का सटीक पता लगाने में पूरी तरह असमर्थ रहते हैं।

जब तक हम उच्च हिमालय के अत्यंत संवेदनशील पेट में सैकड़ों किलोमीटर लंबी सुरंगें खोदने की इस अंधी दौड़ को नहीं रोकते, और जब तक निर्माण से पूर्व वास्तविक समय की त्रिआयामी जल-भूवैज्ञानिक मैपिंग तथा अग्रिम जांच-ड्रिलिंग को पूरी तरह अनिवार्य नहीं करते, तब तक हम उस असीम भूमिगत जल-वास्तुकला को हमेशा के लिए नष्ट करते रहेंगे, जो न केवल पर्वतीय क्षेत्रों बल्कि पूरे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के जीवन और नदियों का मूल आधार है।

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