
एयर मार्शल वीपीएस राणा
पूर्व एयर ऑफिसर इन चार्ज एडमिनिस्ट्रेशन
शिवानी के उपन्यासों और सुमित्रा नंदन पंत की कविताओं का पहाड़ अपने आप में एक अनूठा आनंद और रोमांच प्रदत्त करता है, लेकिन यथार्थ में उससे भी कहीं बेहतर है ये देवभूमि। इसके कई खूबसूरत इलाके अभी भी पर्यटन की परिधि से बाहर हैं जिनका अहसास एक स्वर्गिक अनुभूति से कम नहीं। उत्तराखंड के पर्यटन को चार मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है; धार्मिक पर्यटन, प्राकृतिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन और सांकृतिक पर्यटन। इन्हें विकसित करने के लिए भी इसी तरह श्रेणीबद्ध कर योजनाएं बनाने की जरूरत है। यहां मैं आपका ध्यान कुछ उन सुरम्य गंतव्यों की ओर ले जाना चाहूंगा जो ज्यादातर लोगों को पता नहीं है और जिन्हें पर्यटन के मानचित्र पर मुखर करने के लिए उत्तराखंड सरकार और स्थानीय लोगों को एकजुट होकर काम करना होगा।
धार्मिक पर्यटन
चारधामों के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड में कितने ऐसे धार्मिक और पौराणिक स्थल हैं जिनका वर्णन हमारे वेदों और शास्त्रों में किया गया है। ये सारे स्थल पर्यटन की दृष्टि से भी एक अनोखा आकर्षण हैं, लेकिन उन्हें अभी भी पूरी तरह से देखा समझा नहीं गया है। उनमें पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और उन्हें उसी तरह से विकसित करने की आवश्यकता भी है। ज्यादातर ये पौराणिक स्थल दूर दराज के इलाकों में हैं जहां जाने और रहने की सुविधाएं सीमित हैं।

प्रसिद्ध चारधामों बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री के अलावा कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो पौराणिक महत्व के अलावा बहुत ही रमणीक स्थानों में स्थित हैं। इनमें से ज्यादातर भगवान शिव के प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हैं जैसे, त्रिजुगी नारायण, बूढ़ा केदार, ऊखीमठ, जोशीमठ, श्रीनगर, उत्तरकाशी और खतलिंग। इसके अलावा मां भगवती, देवी, दुर्गा और अंबा के मंदिर भी हैं, जैसे सुरकंडा देवी, धारी देवी, चंद्रबदनी, नंदा देवी, गोल्लू मंदिर आदि जहां से देवी के पावन दर्शनों के अलावा प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। इनमें से कुछ संक्षिप्त में यहां वर्णित हैं।
उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 35 किलोमीटर दूर स्थित केंद्र, जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतता प्रदान कर रहे हैं। यहां लगभग 250 मंदिर हैं जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बडे 224 मंदिर स्थित हैं। कहा जाता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सर्वप्रथम आरंभ हुई। जागेश्वर को उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है और इसे भगवान शिव की तपस्थली भी माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग आठवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है और इसे योगेश्वर नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शिवलिंग पूजा के आरंभ का गवाह माना जाता है। इस धाम का उल्लेख स्कंद पुराण, शिव पुराण और लिंग पुराण में भी मिलता है।
केदारनाथ की सम्पूर्ण यात्रा पंच केदार के दर्शनों से होती है लेकिन समय की कमी के कारण लोग इसे पूरा नहीं कर पाते। ये पांच केदार हैं, केदारनाथ (11755 फीट), तुङ्गनाथ (12070 फीट), रुद्रनाथ (11677 फीट), मध्यमहेश्वर (11,450 फीट) और कल्पेश्वर महादेव (7,200 फीट)।

चिताली में गोल्लू देवता का प्रसिद्ध मंदिर कुमाऊं के सबसे लोकप्रिय मंदिरों में से एक है और अल्मोड़ा से यह 6 किमी की दूरी पर स्थित है यह स्थानीय देवता गोलू को समर्पित है, जिन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। यह 12 वीं सदी के दौरान बनाया गया था और परिसर में लटकी हुई सभी आकारों की कई पीतल की घंटियों इसकी विशेषता है। भक्तों द्वारा इच्छा या धन्यवाद के रूप में यहां घंटियां लटकाई जाती हैं। पीठासीन देवता को न्याय का देवता भी माना जाता है और इसलिए, आप अदालत में न्याय नहीं पाने वाले भक्तों द्वारा मंदिर की दीवारों पर लगे स्टांप पेपर देख सकते हैं।
सुरकंडा देवी मंदिर, धनौल्टी से मात्र 8 किमी की दूरी पर है। यह मंदिर लगभग 8500 फीट की ऊंचाई पर है और यहां पहुंचने ले लिए कद्दूखाल से 3 किमी का ट्रेक है। ये देवी के सिद्धपीठों में से एक है। मंदिर की अपनी खूबसूरती के अलावा यहां से हिमालय की सारी प्रमुख चोटियां दिखती हैं और दूर दूर तक का मंत्रमुग्ध करने वाली प्राकृतिक छटा है। यहां से टिहरी बांध की झीलभी दिखती है।
चंन्द्रबदनी मंदिर भी देवी सती के 52 शक्तिपीठों में से एक पवित्र हिन्दू मंदिर है, जो टिहरी जिले के, हिंडोलाखाल विकासखंड में, चंद्रकूट पर्वत पर समुद्रतल से लगभग 8000 फुट की ऊंचाई पर है। यह देवप्रयाग-टिहरी मोटर मार्ग तथा श्रीनगर-टिहरी मोटर मार्ग के बीच में स्थित है और यहां आसानी से जाया जा सकता है। यहां से हिमालय की सभी प्रमुख चोटियां, दूर दूर तक की प्राकृतिक छटा और टिहरी बांध की झील को भी देखा जा सकता है।

हेमकुंड साहिब जिसे हेमकुंठ भी कहते हैं, सिखों का एक प्रमुख गुरुद्वारा है जो 13650 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां जाने के लिए एक कठिन रास्ते से होकर जाना पड़ता है और ये स्थान, प्रसिद्ध फूलों की घाटी के पास है। यह स्थान सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी को समर्पित है। यहां पर एक ग्लेशियर झील है जो सात पर्वतों से घिरी है। यहां गोविंदघाट से पहुंचा जा सकता है जो बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। यह एक पूज्य स्थल होने के साथ साथ अपने आप में अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है और यहां का ट्रेक भी काफी चुनौतीपूर्ण है।
प्राकृतिक पर्यटन
वैसे तो उत्तराखंड के किसी भी कोने में आप जाएं तो प्रकृति के खूबसूरत नज़ारे देखने को मिलेंगे लेकिन कुछ स्थान बहुत ही रमणीक और दर्शनीय हैं जिनके बारे में अभी भी लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। चौकोरी, पिथौरागढ़ जिले में एक ऐसा ही खूबसूरत गंतव्य है जो हिमालय की तमाम ऊंचे पर्वतों से घिरा है। ये सीमांत जगह है जिसके उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल की सीमा है। यहां से हिमालय की बर्फ से आच्छादित पर्वत श्रृंखला पर सुबह की किरणें सुनहरा रंग बिखेरती हैं तो वो छटा देखते ही बनती है। यहां से पाताल भुवनेश्वर, कौसानी, बागेश्वर और अल्मोड़ा भी पास में ही हैं। यहां पर रहने ले लिए छोटी छोटी कॉटेज भी हैं।
एक और खूबसूरत जगह है चोपटा जिसे मिनी स्विट्जरलैंड के नाम से भी जाना जाता है। यहां के जंगल जिनमें खूबसूरत फूलों से सज्जित बुरांस, देवदार और बांझ शामिल हैं, इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। यह स्थान लगभग 8500 फीट की ऊंचाई पर है और यहां केदारनाथ राजमार्ग से पहुंचा जा सकता है। सुमित्रा नंदन पंत जी की जन्म भूमि कौसानी उत्तराखंड की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है जो बागेश्वर जिले में है। यहां से हिमालय की लगभग 300 किमी तक फैली हिमालय श्रेणी का सुंदर विहंगम दृश्य देखने को मिलता है, जिसमें नंदा देवी, त्रिशूल और पंचुली जैसी चोटियां सम्मिलित हैं।

खिर्सू एक छोटी सी जगह है जो पौड़ी से 19 किलोमीटर की दूरी पर लगभग 5500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और प्रदूषण से मुक्त एवं शांत जगह है। केवल पक्षियों की चहचाहट ही आस-पास के ओक, देवदार और सेब के बगीचों की शांति को तोडती है। खिर्सू के हिमाच्छादित पहाड़ केंद्रीय हिमालय का मनोरम दृश्य पेश करते हैं तथा बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यहां का घंडियाल देवता का प्राचीन मंदिर देखने लायक है। पर्यटक विश्राम गृह और वन विश्राम गृह में ठहरने की व्यवस्था उपलब्ध है।
धनौल्टी एक बहुत ही रमणीक और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर मसूरी की भीड़ भाड़ से थोड़ी ही दूर पर स्थित पर्यटक स्थल है जहां से हिमालय श्रेणी की सभी बर्फ़ से आच्छादित चोटियां दिखती हैं। यहां पर रहने की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। ऐसी ही एक और खूबसूरत जगह है चौबटिया जो अल्मोड़ा जिले में है। यह रानीखेत कैंट से लगभग 10 किमी दूर लगभग 6000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां बर्फ से आच्छादित हिमालय की प्रमुख पर्वत श्रेणियां नजर आती हैं।
भीमताल और नैनीताल के बारे सभी लोग जानते हैं लेकिन वहां की भीड़ भाड़ से दूर दो ऐसे ताल हैं जो उतने ही सुरम्य हैं। नौकुचियाताल, नैनीताल से 26 किमी और भीमताल से मात्र 4 किमी की दूरी पर है और लगभग 4000 फीट की ऊंचाई पर है।ये काफी गहरी और नौ कोनों से घिरी प्राकृतिक झील है जो लगभग 1 किमी लंबी, 700 मी चौड़ी और 40 मी गहरी है। दूसरी झील सात ताल है जो यहां से पास में ही है और आपस में जुड़े सात छोटी झीलों से मिलकर बनी है।
रहस्य, रोमांच और साहसिक पर्यटन
जहां उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है वहीं गढ़वाल क्षेत्र एडवेंचर गतिविधियों के लिए। उत्तरकाशी में स्थित नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (निम) के अलावा क्षेत्रीय स्तर भी कई ट्रेकिंग की सुविधाएं हैं जिनमें ग्लेशियल ट्रेक और कई ऊंचे स्थानों पर स्थित ताल भी सम्मिलित हैं। जिनमें ढोडी ताल, नचिकेता ताल, हेमकुंठ साहिब, केदार ताल आदि प्रमुख हैं। विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी का ट्रेक भी मनोरम होने के साथ साथ काफी साहसिक भी है।
टिहरी जिले की घनसाली तहसील में स्थित खतलिंग ग्लेशियर उत्तराखंड के पांच बड़े ग्लेशियर में से एक है। इसके अलावा पहले स्थान पर गोमुख, दूसरे पर मिलम, तीसरा पिंडारी और नामिक चौथे स्थान पर है। समुद्रतल से 12000 से लेकर 14000 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह ग्लेशियर ट्रैकर्स के आकर्षण का केंद्र रहता है। यहां से भिलंगना नदी का उद्गम है जो भागीरथी से टिहरी में मिलती है ।

उत्तराखंड में हिमालय की वादियों के बीच मौजूद औली एक प्रसिद्ध सर्दियों में घूमने लायक जगह है, ये डेस्टिनेशन स्कीइंग के लिए भी जाना जाता है। जहां ये सर्दियों में पूरी बर्फ से ढक जाता है, वहीं गर्मी में यहां की बर्फ से घिरी चोटियां इस जगह को और भी ज्यादा खूबसूरत बना देती हैं। औली कई तरह की बर्फ की चोटियों और पहाड़ों का एक अप्रतिम दृश्य प्रस्तुत करता है, जैसे नंदा देवी चोटी, कामेट पर्वत, चौखम्बा चोटी, त्रिशूल चोटी, हाथी पर्वत, आदि। औली में दुनिया की सबसे ऊंची आर्टिफिशियल झील भी है। औली को मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है, क्योंकि पूरे साल आपको बर्फ देखने को मिल जाएगी। औली स्कीइंग में शामिल होने के लिए परफेक्ट जगह है। चाहे आप अनुभवी स्कीयर हों या शौकिया, यहां हर तरह के लोगों के लिए कुछ न कुछ जरूर है। ये ट्रेकिंग और कैंपिंग के लिए बहुत ही शानदार जगह है। यहां एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा और सबसे लंबा रोपवे भी है जो पहाड़ों का शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। यह एशिया में गुलमर्ग गंडोला राइड और गंगटोक की केवल कार के बाद कुल 4 किमी की दूरी के साथ दूसरा सबसे ऊंचा और सबसे लंबा रोपवे है। ये रोपवे जोशीमठ और औली के बीच है।
मुनस्यारी एक बहुत ही लोकप्रिय ट्रेकिंग आकर्षण है। यह लगभग 7200 फीट की ऊंचाई पर है और यहां से कई ट्रेक किए जा सकते हैं। इनमें सबसे अच्छा और साहसिक है खलिया टॉप का लगभग 2 घंटे का ट्रेक जिसमें हरियाली और बर्फीली चोटियों का सम्मिश्रण है। दूसरा ट्रेक है ठमरी कुंड जो थोड़ा सरल है। इसके अलावा लंबे ट्रेक भी किए जा सकते हैं जो मिलाम ग्लेशियर तक जाते हैं। यहां पर रहने के लिए होटल आदि की सुविधा है
कुछ और भी स्थान हैं जो अपनी अनोखे और रहस्यमयी अनुभवों के लिए जाने जाते हैं, जैसे टिहरी गढ़वाल में लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित खैट पर्वत जो आछरियों यानि परियों की जगह के लिए जाना जाता है।
मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि यहां आछरी अर्थात् परियां वास करती है। यह गुंबदाकार पर्वत थात गांव से करीब 5 किलोमीटर दूर है और इसकी सुंदरता आलौकिक है। कहते हैं यहां लोगों को अचानक ही कहीं भी परियों के दर्शन होने का आभास होता है। स्थानीय लोगों का ऐसा मानना है कि ये परियां आस-पास के सभी गांवों की रक्षा करती हैं।
ऐसे ही है पिथौरागढ़ जिले में गंगोलीहाट से 14 किमी दूर भुवनेश्वर गांव में स्थित पाताल भुवनेश्वर, जो एक लाइमस्टोन गुफा में है। स्थानीय किंवदंती है कि यहां भगवान शिव और तैंतीस कोटि देवता निवास करते हैं। यह मंदिर रहस्य और सुंदरता के बेजोड़ मेल के रुप में जाना जाता है। समुद्र तल से 90 फीट नीचे इस मंदिर के अंदर प्रवेश करने के लिए बहुत ही संकीर्ण रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। स्कंद पुराण में भी इस मंदिर की महिमा का वर्णन है। कहा जाता है कि त्रेता युग में राजा ऋतुपर्णा ने इस गुफा की खोज की थी जिसके बाद उन्हें यहां नागों के राजा के अधिशेष मिले थे।
केदार ताल जिसे शिवजी की झील भी कहा जाता है लगभग 16000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और ये केदार गंगा का उद्गम स्थल है। ये एक ग्लेशियर झील है जिसमें आस पास के प्रमुख पर्वत चोटियों जैसे थलय सागर, मेरू, भ्रुगुपंथ आदि से आकर बर्फ का पानी जमा होता है। केदार नदी आगे जाकर भागीरथी से मिलती है।

ट्रेकिंग के हिसाब से डोडीताल झील भी बहुत दिलचस्प है। यह उत्तरकाशी जिले में लगभग 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यहां से अस्सी गंगा का उद्गम होता है जो गंगोरी के पास भागीरथी नदी से मिलती है। यहां वन विभाग से परमिट लेकर उनके विश्राम गृह में रहने की सुविधा है और लगभग 9 से 10 किमी का ट्रेक है।
नचिकेता ताल उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के उत्तर-पूर्व में समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ताल 7 फिट गहरा और लगभग 200 मीटर लंबा और 30 मीटर चौड़ा है। झील के लिए प्राकृतिक नालियां पानी का एकमात्र स्रोत हैं। घने देवदार और बांज के जंगलों के बीच बसे नचिकेता ताल बहुत ही मनोहारी है। यह ताल गंगोत्री से 131 किमी और उत्तरकाशी से 29 किमी की दूरी पर स्थित है। एक स्थानीय किंवदंती के अनुसार, यह झील उद्दालक द्वारा बनाई गई थी और इसका नाम उनके बेटे नचिकेता के नाम पर रखा गया था। 10 वर्षीय नचिकेता ने नरक और जीवन और मृत्यु के पीछे के द्वार की स्थापना की। यह नाग देवता को समर्पित एक छोटा मंदिर है, जहां नागपंचमी के दौरान ग्रामीणों द्वारा पूजा अर्चना की जाती है।
ट्रेकिंग की दृष्टि से सबसे कठिन ट्रेक है रूपकुंड ट्रेक। रूपकुंड त्रिशूल पर्वत की तलहटी में लगभग 15500 फीट की ऊंचाई पर है और चारों तरफ से पत्थरों से भरे ग्लेशियर से घिरी है। ये सिर्फ 40 मी चौड़ी झील है जो सर्दियों में पूरी तरह जमी होती है। इस झील की तलहटी में पुराने नर कंकाल दिखते हैं जिसकी वजह से इसे स्केलेटन लेक भी कहते हैं।
सांस्कृतिक पर्यटन
उत्तराखंड में मुख्यत दो मंडल हैं गढ़वाल और कुमाऊं। दोनों में सांस्कृतिक समानताएं भी हैं और कुछ कुछ भिन्नताएं भी। उत्सव और त्योहारों में भी समानताएं भी हैं और थोड़ा थोड़ा बदलाव भी। उत्तराखंड की भूमि से जुड़ी संस्कृति को महसूस करने के लिए गांवों में रहना आवश्यक है। आजकल इस तरह के पर्यटन का काफी चलन है जिसमें पर्यटक गांवों में होम स्टे करके वहां की संस्तुति को आत्मसात करते हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से उत्तराखंड का एक और क्षेत्र है जो थोड़ा भिन्न है, वह है देहरादून से लगा जौनसार बावर। उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पहलू उत्सव के खेल और नृत्य हैं, जैसे ’बरदा नाटी’ / हरुल / रासो / सभी उत्सव के अवसरों के दौरान लोक नृत्य। ’माघ मेला’ जौनसार का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। जौनसार बावर अपनी अनोखी संस्कृति, भेषभूषा रहन-सहन के लिए प्रसिद्ध है। भारत सरकार द्वारा 1967 मै जौनसार बावर को जनजातीय क्षेत्र घोषित किया गया था। यह विशिष्ट क्षेत्र हिमाचल और उत्तराखंड दो जुड़वा प्रदेशों के बीच स्थित है जिसमें टिहरी जिले का जौनपुर, उत्तरकाशी का रवांईं, देहरादून का जौनसार बावर तथा हिमाचल का एक बड़ा भू-भाग शामिल है

सरकार और स्थानीय लोगों का दायित्व
उत्तराखंड सरकार पर्यटन के क्षेत्र में काफी प्रयत्नरत है और इसका प्रभाव देखने को भी मिल रहा है, लेकिन अभी भी बहुत सी और भी संभावनाएं हैं जिससे ये एक रोजगार का कारगर साधन बन सकते हैं। इससे कहीं कम सुंदरता वाले देश पर्यटन के जरिए बहुत अधिक धनार्जन करते हैं।
स्थानीय लोगों को पर्यटन से जोड़ना बहुत जरूरी है। इसके लिए शिक्षा, व्यवसाय और नीति सभी के समागम की आवश्यकता है। उत्तराखंड पर्यटन से मूल रूप से जुड़े एक वोकेशनल ट्रेनिंग मॉड्यूल और डिप्लोमा तैयार करने की जरूरत है जिससे स्थानीय युवा अपने व्यवसाय का प्रारूप तैयार कर सकें। इसके अलावा सरकारी नीतियों में स्थानीय लोगों की भागेदारी और उनके आर्थिक विकास को ध्यान में रखने की जरूरत है जिसमें पर्यटकों को रहने और खाने की सुविधा के लिए होम स्टे या पेइंग गेस्ट के तौर पर या बीएंडबी मॉडल पर रखने की सुविधा हो जिसे सरकारी पर्यटन पोर्टल से जोड़ा जा सके। इससे सांस्कृतिक पर्यटन का स्वरूप भी दिया जा सकता है जिससे सैलानी गांवों की जीवन शैली के बारे में जानें।
प्रदेश के बाहर बहुत से लोग उत्तराखंड की नैसर्गिक सुंदरता को महसूस करना चाहते हैं लेकिन उन्हें पूरी जानकारी नहीं होती। इसलिए सबसे बड़ी जरूरत है लोगों को आवश्यकतानुसार जानकारी मुहैया कराने की और उनकी अलग अलग जरूरतों को ध्यान में रख कर सरकार द्वारा निर्धारित मूल्यों पर आवश्यकतानुसार पर्यटन पैकेजेज बनाने की, जिसमें रहने, खाने और यातायात की सम्पूर्ण सुविधा और पर्यटकों की चाहत के अनुसार जगहों को सम्मिलित किया जा सके। इसमें सभी सरकारी विभागों जैसे पर्यटन और वन विभाग, ग्राम पंचायतों और स्थानीय व्यवसायियों आदि में सामंजस्य बिठाने की खास जरूरत है। इससे सुविधा के अलावा लोगों को सांत्वना भी रहेगी कि उन्हें हर सुविधा उचित मूल्यों पर मिलेगी और कोई भी असुविधा होने पर उनका खयाल रखा जाएगा।
इसके अलावा कुछ प्रमुख ट्रेक्स को चुनकर वहां के रास्तों और अन्य सुविधाओं, जैसे कैंपिंग और खाने की व्यवस्था आदि को विकसित करने से पर्यटन की दिशा में हम प्रगति कर सकते हैं। स्थानीय लोग भी गांवों को स्वच्छ रख कर, उनके गांव के आस पास के ट्रेकिंग रूट्स को विकसित कर और सुविधाजनक होम स्टे बनाकर इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं
हमारी इस प्राकृतिक सुंदरता को फिल्मों के माध्यम से भी लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश सरकार इस दिशा में बहुत काम कर रही है, इसी प्रकार उत्तराखंड सरकार को फिल्म उद्योग के साथ मिलकर इस तरह की योजनाएं और नीतियां बनायें जिससे अधिक से अधिक फिल्मों और सीरियल्स की शूटिंग उत्तराखंड के इन रमणीय स्थानों में हों। उत्तराखंड की संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता को राज्य के बाहर अन्य प्रदेशों में भी कार्यशालाओं के द्वारा प्रदर्शित करने की भू जरूरत है जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिल सके।
हमारा उत्तराखंड सुंदरता और आध्यात्म से भरपूर है जिसे पर्यटन के माध्यम से हम देश विदेश के बाकी लोगों से साझा कर सकते हैं और साथ ही रोज़गार के भी अवसर भी जुटा सकते हैं।
ये मेरा गढ़वाल है प्यारा,ये मेरा प्यारा कुमाऊं।
जी नहीं भरता देख इसे,मैं देख देख इतराऊं।।
कल कल करती नदियां,झर झर झरते झरने।
वन वन डोले पंछी सारे,मैं देख देख इठलाऊं।।
गांव गांव और शहर शहर,बस मंदिर और शिवाले।
देव भूमि ये मिट्टी मेरी, माथे पे अपने सजाऊं।।
दिलों में इतना प्यार लिए, सांसों में ठंडी बयार लिए।
एक भी पल जो जीयूं यहां, हज़ार पलों से बेहतर पाऊं।।


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