गढ़वाल राइफल्स लैंसडाउन और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर के सामूहिक प्रयास से विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार एक अभिनव पहल ‘रणभूमि सीमा दर्शन’ के रूप में की गई।
विश्वविद्यालय के 45 शोधार्थियों का दल 25 अक्टूबर को श्रीनगर से रवाना होकर सबसे पहले बद्रीनाथ पहुंचा। वहां छात्रों ने उत्तराखंड सरकार एवं भारतीय सेना द्वारा आयोजित माणा महोत्सव में भाग लिया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन करते हुए दो अलग-अलग विधाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया और कुल ₹1,50,000 का पुरस्कार जीतकर विश्वविद्यालय का नाम रोशन किया।
यह पहल कुलपति प्रोफेसर प्रकाश सिंह और गढ़वाल पलटन के ब्रिगेडियर विनोद सिंह नेगी की दूरदृष्टि और सोच का परिणाम है। इस अनूठे प्रयास के तहत विश्वविद्यालय के शोधार्थियों को पहली बार भारत-तिब्बत सीमा रेखा पर तैनात जवानों के मानसिक, शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन का अवसर प्राप्त हुआ। साथ ही उन्हें सैनिकों के रहन-सहन, भोजन, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन से जुड़ी अहम जानकारियां भी हासिल करने का अवसर मिला।

विकट भौगोलिक परिस्थितियों और कठिन मार्गों में चलकर दिन-रात देश की सीमाओं की रक्षा में जुटे इन वीर जवानों को शत-शत नमन। साथ ही शोध दल ने सीमा क्षेत्र के माणा, लता, मलारी, बाम्पा, गमशाली और नीति जैसे गांवों के पारिस्थितिक तंत्र और बदलते सामाजिक-पर्यावरणीय परिदृश्यों का भी अध्ययन किया।
लेखक का इस क्षेत्र में भ्रमण सन् 1986-87 से अनवरत जारी है। इस कार्य के लिए कुलपति ने उनके नाम का चयन किया। यह कहीं न लेखक के लिए देवभूमि के प्रति प्रेम और मां नन्दा देवी के आशीर्वाद का परिणाम है।

प्रो एमपीएस बिष्ट ने बताया कि पिछले 35-40 वर्षों में मुझे इस पावन धरती की गोद से निकलने वाली अनेक पवित्र नदियों — अलकनंदा, सरस्वती, धौली, गिरथी गंगा, ऋषि गंगा, कल्पगंगा, कर्मनाशा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, दुध गंगा, विरही गंगा, बालखिला, मंदाकिनी और नंदाकिनी के उद्गम स्थलों तक जाने का अवसर प्राप्त हुआ है।
जो कुछ भी मैंने इन यात्राओं में देखा और सीखा, वह आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे, इससे सुंदर अवसर मेरे लिए और क्या हो सकता है। मेरी कोशिश थी कि सीमित समय में मैं अपनी ज्ञान-गंगा की जितनी भी धाराएं हैं, उन्हें इस नई पीढ़ी तक पहुंचा सकूं।








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