गोपेश्वर में स्कूल जा रही छात्राओं पर भालू के हमले से इलाके में दहशत फैल गई। एक छात्रा बेहोश हो गई, जबकि दूसरी बाल-बाल बची। घटना के बाद वन विभाग की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। अभिभावकों ने स्कूलों के आसपास गश्त और ठोस इंतजाम की मांग की है।
उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर में मंगलवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब स्कूल जा रही छात्राओं पर एक भालू ने अचानक हमला कर दिया। यह घटना राजकीय बालिका इंटर कॉलेज गोपेश्वर के समीप हुई, जिसने पूरे इलाके को दहशत में डाल दिया है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, छात्राएं रोज़ की तरह सुबह स्कूल जा रही थीं, तभी जंगल की ओर से अचानक भालू आबादी क्षेत्र में आ गया और छात्राओं पर झपट पड़ा। इस दौरान छात्रा राधिका रावत किसी तरह सतर्कता दिखाते हुए बचने में सफल रहीं, जबकि दूसरी छात्रा भालू से बचने की कोशिश में भागते हुए गिर गई और बेहोश हो गई।
घटना के तुरंत बाद स्थानीय लोगों और स्कूल प्रशासन की मदद से दोनों छात्राओं को जिला अस्पताल गोपेश्वर पहुंचाया गया। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, दोनों छात्राओं की हालत फिलहाल स्थिर है और चिकित्सकों की निगरानी में उनका इलाज जारी है।
सूचना मिलते ही स्कूल प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधि और ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक भालू जंगल की ओर भाग चुका था। घटना के बाद से पूरे क्षेत्र में भय का माहौल बना हुआ है। खासतौर पर अभिभावकों में भारी चिंता देखी जा रही है, जो अब अपने बच्चों को स्कूल भेजने को लेकर आशंकित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। गोपेश्वर और आसपास के इलाकों में आए दिन भालू, तेंदुए और अन्य जंगली जानवरों की आवाजाही देखी जा रही है। कई बार इसकी सूचना वन विभाग को दी गई, लेकिन स्थायी और प्रभावी कदम अब तक नहीं उठाए गए।
लोगों का आरोप है कि वन विभाग की गश्त सिर्फ कागजों तक सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नजर नहीं आते। स्कूल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास न तो नियमित पेट्रोलिंग हो रही है और न ही कोई चेतावनी या सुरक्षा तंत्र लगाया गया है।
इस घटना ने राज्य सरकार और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने मांग की है कि स्कूलों के आसपास नियमित गश्त, सुरक्षा दीवार, अलार्म सिस्टम, सीसीटीवी कैमरे और त्वरित रेस्क्यू टीम की व्यवस्था की जाए। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में कोई बड़ी और दुखद घटना भी हो सकती है, जिसकी जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होगा। यह घटना एक बार फिर चेतावनी है कि वन्यजीव और मानव संघर्ष अब पहाड़ी इलाकों में एक गंभीर संकट बन चुका है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।








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