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ऐपण बचपन से उनके जीवन का हिस्सा रहा है। त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों और पारिवारिक आयोजनों में घर की महिलाओं को पारंपरिक लाल गेरू और चावल के घोल से सुंदर आकृतियां बनाते देख उन्होंने इस कला को सीखा। समय के साथ उन्होंने इसे केवल पारंपरिक आंगन और चौकी तक सीमित न रखकर कैनवास, लकड़ी की प्लेट, दीवार सज्जा, उपहार सामग्री और कॉर्पोरेट गिफ्ट आइटम्स तक विस्तार दिया।
READ MOREगुच्छी मशरूम, जो प्राकृतिक रूप से हिमालयी क्षेत्रों में सीमित मात्रा में पाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत महंगा बिकता है। इसकी मांग देश-विदेश के होटल उद्योग और औषधीय उपयोगों में लगातार बनी रहती है। किंतु इसकी नियंत्रित और वैज्ञानिक खेती एक बड़ी चुनौती मानी जाती रही है।
READ MOREउत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के युगपुरुष, स्वर्गीय जीत सिंह नेगी की 99वीं जयंती की पूर्व संध्या पर उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा डीपीएमआई सभागार, न्यू अशोक नगर, दिल्ली में एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर नेगी जी के गीतों, संस्मरणों और उनके सांस्कृतिक अवदान को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया गया।
READ MOREउत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से पलायन वर्षों से एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बना हुआ है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस प्रवृत्ति को उलटकर नई राह बना रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले के छोटे से गांव गौरीकोट की रहने वाली सविता रावत ऐसी ही एक सशक्त महिला हैं, जिन्होंने ‘रिवर्स पलायन’ को केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सफल और टिकाऊ मॉडल बनाकर दिखाया है।
READ MOREकृषि तकनीक में तीव्र गति से परिवर्तन हो रहा है, ऐसे में विस्तार रणनीतियों में भी समयानुकूल बदलाव आवश्यक है। पारंपरिक एवं ‘रूढ़िवादी सोच’ से ऊपर उठकर किसानों के साथ कार्य करने के तरीकों और दृष्टिकोण, दोनों में परिवर्तन लाना जरूरी है।
READ MOREअल्मोड़ा ज़िले के पिओरा क्षेत्र का एक छोटा-सा गांव है — डायरी। पहाड़ों की गोद में बसा यह गांव बाहर से जितना शांत दिखता है, इसके भीतर उतनी ही गहरी सांस्कृतिक धड़कन छुपी है। इसी गांव में रहते हैं ललित, जो आज भी लकड़ी पर हाथ से पारंपरिक उत्तराखंडी डिज़ाइन तराशते हैं। मशीनों और तेज़ उत्पादन के इस दौर में वे उन गिने-चुने कारीगरों में से हैं, जो इस दुर्लभ और बहुमूल्य कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं।
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से उठी न्याय की एक आवाज अब देश की राजधानी तक पहुंचने की राह पर है। एक ओर जहां देश के जवान सीमाओं पर तैनात होकर राष्ट्र की सुरक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके परिवार के लोग अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
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हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (एचएनबीजीयू) का 12वां दीक्षांत समारोह 24 मार्च 2026 को आयोजित किया जाएगा। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है। यह भव्य समारोह विश्वविद्यालय के चौरास परिसर स्थित स्वामी मनमथन ऑडिटोरियम में संपन्न होगा।
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