उत्तरकाशी जिले के धराली क्षेत्र में आई हालिया आपदा ने एक बार फिर 12 साल पहले केदारनाथ में वर्ष 2013 में हुए भीषण जलप्रलय की भयावह यादें ताजा कर दी हैं।
केदारनाथ आपदा के बाद सरकार और प्रशासनिक स्तर पर अर्ली वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) विकसित करने की चर्चाएं तो खूब हुईं, लेकिन 12 साल बीत जाने के बावजूद अभी तक यह व्यवस्था धरातल पर नहीं उतर सकी है। उत्तराखंड जैसे आपदा-संवेदनशील राज्य में यह लापरवाही किसी भी बड़े खतरे को न्योता देने के बराबर है।
आपदाओं से सबक नहीं ले पाया उत्तराखंड
2013 में केदारनाथ में आई त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हजारों श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की जान गई और बेशकीमती परिसंपत्तियां तबाह हो गईं। इसके बाद राज्य में अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया गया ताकि भविष्य में बाढ़, बादल फटने या अन्य प्राकृतिक आपदाओं से पहले चेतावनी देकर जान-माल की रक्षा की जा सके। लेकिन 12 वर्षों में कई बार यह मुद्दा उठा और फिर ठंडे बस्ते में चला गया।
अध्ययन तो हुए, कार्यान्वयन नहीं
फरवरी 2021 में चमोली जिले के रैणी गांव में आई आपदा के बाद एक बार फिर अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर चर्चाएं तेज हुईं। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) ने इस दिशा में कुछ कदम भी उठाए। ओडिशा और कर्नाटक जैसे राज्यों से सीख लेने के लिए अध्ययन दल भी भेजे गए, जहां इस तरह की व्यवस्थाएं पहले से ही प्रभावी रूप से काम कर रही हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि इन प्रयासों के बावजूद अब तक उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम को लेकर कोई ठोस पहल जमीन पर नहीं दिखती।
हर साल दोहराई जाती है त्रासदी
उत्तराखंड की भौगोलिक संरचना इसे प्राकृतिक आपदाओं के लिए अत्यंत संवेदनशील बनाती है। बादल फटना, भूस्खलन और नदियों में अचानक बाढ़ आना यहां आम घटनाएं बन चुकी हैं। हर साल जान-माल की भारी हानि होती है, लेकिन इसके बावजूद एक कारगर पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित नहीं हो पाई है।
धराली की आपदा फिर चेतावनी दे गई
धराली की हालिया आपदा इस बात का संकेत है कि समय रहते चेतावनी देने की कोई प्रणाली होती तो शायद नुकसान को टाला या कम किया जा सकता था। अब एक बार फिर यह विषय चर्चा में है और उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस बार इसे केवल फाइलों तक सीमित न रखे, बल्कि अमल में भी लाए।
सवाल अब भी कायम है
- केदारनाथ के बाद रैणी, और अब धराली… क्या इन त्रासदियों के बाद भी हम नहीं जागेंगे?
- आखिर क्यों अब तक अर्ली वार्निंग सिस्टम जैसे जरूरी तंत्र की स्थापना नहीं हो पाई?
- क्या हर आपदा के बाद सिर्फ जांच कमेटियां और अध्ययन दल ही बनते रहेंगे?
- उत्तराखंड के लोगों को अब सिर्फ आश्वासन नहीं, ठोस और टिकाऊ समाधान चाहिए।








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