अगर आप ठान लें, तो पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं – सुरेश चंद्र पांडे

अगर आप ठान लें, तो पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं – सुरेश चंद्र पांडे

उत्तराखंड की प्रसिद्ध प्रवासी शख्सियत सुरेश चंद्र पांडे की गुजरात के वडोदरा में स्थापित भारत की अग्रणी इन्फ्रास्ट्रक्चर और सर्वेक्षण कंपनी एसकेपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपनी स्थापना के 25 साल पूरे कर लिए हैं। इस अवसर पर, हिल-मेल के संपादक वाई.एस. बिष्ट ने एसकेपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के सीएमडी सुरेश चंद्र पांडे से उद्यमिता के सफर पर विस्तार से वार्ता की। इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश:

एसकेपी प्रोजेक्ट्स के 25 वर्ष पूरे होने पर आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। कंपनी की स्थापना आपने कब की, और किन शहरों में इसके कार्यालय हैं?

आपका धन्यवाद। एसकेपी प्रोजेक्ट्स की स्थापना वर्ष 2000 में एक साधारण, लेकिन सुदृढ़ विज़न के साथ की गई थी,देश की आधारभूत संरचना के विकास में सार्थक योगदान देने के उद्देश्य से। आज मुझे अत्यंत गर्व है कि कंपनी ने 25 वर्षों की एक सफल, सशक्त और निरंतर विकास की यात्रा पूरी कर ली है।

हमने अपनी शुरुआत वडोदरा, गुजरात से की थी, जहां आज हमारा हेड ऑफिस है, जबकि हमारा कॉर्पोरेट कार्यालय नोएडा में स्थित है। समय के साथ कंपनी का विस्तार विभिन्न राज्यों और शहरों में हुआ है, और आज हमारे कार्यालय देश के कई हिस्सों में हैं – जैसे हल्द्वानी, लखनऊ, जयपुर, छिंदवाड़ा, नागपुर, गुवाहाटी, जोरहाट, अगरतला, सिलीगुड़ी, काकीनाडा, रायपुर, भुवनेश्वर, हैदराबाद और विशाखापट्टनम। यह हमारी टीम की मेहनत, प्रतिबद्धता और गुणवत्ता के प्रति हमारी निष्ठा का परिणाम है कि आज एसकेपी प्रोजेक्ट्स देशभर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुकी है।

कंपनी की स्थापना के दौरान आपको किन मुख्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा? आज जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं, तो इस यात्रा को आप कैसे देखते हैं?

शुरुआत में संसाधनों की कमी और तकनीकी चुनौतियां अपने आप में एक बड़ी परीक्षा थी। एक छोटे से कमरे से शुरू हुई यह यात्रा आज राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं तक पहुंच चुकी है। यह उपलब्धि हमारी प्रतिबद्ध टीम की अथक मेहनत, ईमानदारी और हमारे क्लाइंट्स के अटूट विश्वास की देन है।

इस पूरी यात्रा में हर मोड़ पर कठिनाइयां आईं, लेकिन हर संघर्ष ने हमें और अधिक मजबूत, परिपक्व और सक्षम बनाया। जब मैं आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो यह केवल एक व्यवसाय की स्थापना की कहानी नहीं है – यह उन सपनों की कहानी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद, असीम हौसलों के दम पर साकार हुए। यह सफर इस बात का प्रमाण है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो अभाव भी अवसर बन जाते हैं। हर चुनौती ने हमें नई सीख दी और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया।

आपकी रुचि शुरू से किस क्षेत्र में थी और आपने अपने करियर की शुरुआत कैसे की? सफलता की ओर आपकी यात्रा कैसी रही?

गांव के अन्य युवाओं की तरह मेरा भी सपना था कि मैं सेना में जाकर देश सेवा करूं। दुर्भाग्यवश, कई प्रयासों के बावजूद मेरा चयन नहीं हो पाया। लेकिन देश के लिए कुछ करने का जज्बा बना रहा। 1989 में मैं वडोदरा पहुंचा- एक अनजान शहर, एक नया सफर। मजबूरी में छोटे-मोटे काम करने शुरू किए। इसी दौरान ओएनजीसी फील्ड पार्टी में एक अस्थायी नौकरी मिली और नौकरी के साथ-साथ मैंने तकनीकी शिक्षा भी पूरी की। यह संतुलन आसान नहीं था, लेकिन हौसले बुलंद थे। कुछ समय बाद, नौकरी भी छूट गई। कोई विकल्प न होने के कारण मैंने ओएनजीसी में मिले अनुभव के आधार पर छोटे-छोटे सर्वे कार्य शुरू किए – यही मेरी शुरुआत थी।

काम के दौरान मैंने महसूस किया कि सर्वेक्षण, इन्फ्रास्ट्रक्चर और सिविल कंस्ट्रक्शन जैसे क्षेत्रों में विकास की अपार संभावनाएं हैं । मैंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ इसी दिशा में कार्य करना शुरू किया। कड़ी मेहनत, अनुशासन और जमीन से जुड़ी सोच ने ही मुझे आगे बढ़ने की राह दिखाई। आज मुझे संतोष है कि मैं अपने कार्य के माध्यम से उसी देशभक्ति की भावना को जी पा रहा हूं, जिसे कभी सेना में शामिल होकर निभाना चाहता था। मेरे सपने ने भले ही रूप बदला हो, उद्देश्य वही रहा – देश की सेवा।

उत्तराखंड में आप सड़क और भवन निर्माण के प्रोजेक्ट्स पर कार्य कर रहे हैं। फिलहाल आपकी कंपनी किन क्षेत्रों में सक्रिय है और किस तरह के निर्माण कार्य किए जा रहे हैं?

उत्तराखंड में एसकेपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बीते कई वर्षों से सक्रिय रूप से कार्यरत है। हमने यहां सड़क निर्माण, भवन निर्माण, जल आपूर्ति, जल निकासी, विद्युत व्यवस्था एवं अन्य बुनियादी ढांचों से संबंधित अनेक परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा किया है। हमारी प्रमुख विशेषता यह है कि हम पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियों को गहराई से समझते हैं और उन्हीं के अनुरूप योजनाओं का निर्माण व क्रियान्वयन करते हैं।

हमारी टीम ने उत्तराखंड में टोपोग्राफिकल सर्वे, जियोटेक्निकल इन्वेस्टिगेशन, अंडरग्राउंड यूटिलिटी मैपिंग , कैडस्ट्रल मैपिंग, फिजिबिलिटी स्टडीज , डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट प्रिपरेशन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। हमने पीडब्ल्यूडी, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, जल निगम, शहरी विकास, सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग, ऊर्जा विभाग, सार्वजनिक उपक्रमों एवं निजी संगठनों के साथ मिलकर विभिन्न महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर कार्य किया है।

वर्तमान में हम उत्तराखंड के जिलों, जैसे अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून, हरिद्वार और नैनीताल में विभिन्न अवस्थापना परियोजनाओं पर कार्यरत हैं। हमारा उद्देश्य केवल निर्माण कार्य करना नहीं, बल्कि टिकाऊ, पर्यावरण-संवेदनशील और स्थानीय सहभागिता आधारित विकास को प्रोत्साहित करना है। हमारी टीम न केवल स्थानीय युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर प्रदान कर रही है, बल्कि उन्हें व्यवहारिक ज्ञान देकर सशक्त भी बना रही है, ताकि विकास की यह प्रक्रिया वास्तव में समावेशी और स्थायी बन सके।

एसकेपी प्रोजेक्ट्स की आने वाली योजनाएं क्या हैं? आप किन क्षेत्रों में विस्तार की योजना बना रहे हैं?

हम वर्तमान में अपने देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ आसपास के देशों में भी सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। हमारी आगामी योजनाओं में अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में अपनी भागीदारी को और विस्तार देना शामिल है। इसके साथ ही हम लिडार सर्वेक्षण, जीआईएस मैपिंग, ग्रीन एनर्जी, जल आपूर्ति और शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य है कि कटिंग-एज तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नवाचार और स्थानीय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से विकास को एक नई दिशा और गति प्रदान की जाए।

एक सफल उद्यमी के रूप में आप किस मूल्य को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं?

मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण मूल्य हैं- ईमानदारी, प्रतिबद्धता और जमीनी स्तर से जुड़ा रहना। मेरा मानना है कि कोई भी सफलता तब तक टिकाऊ नहीं हो सकती जब तक उसमें पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व न हो। ईमानदारी केवल व्यवहार में नहीं, बल्कि निर्णयों, कार्यशैली और सोच में भी झलकनी चाहिए। प्रतिबद्धता का अर्थ है- अपने लक्ष्य, टीम और समाज के प्रति पूरी निष्ठा के साथ खड़ा रहना, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। साथ ही, जमीनी जुड़ाव बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है -ताकि हम अपने काम का प्रभाव केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में भी देख सकें। मेरा मानना है कि जब कोई संगठन इन मूल्यों को आत्मसात करता है, तभी वह केवल व्यावसायिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी सफल बनता है।

उत्तराखंड के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए सरकार और निजी क्षेत्र में किस प्रकार की साझेदारी होनी चाहिए, इस पर आपका क्या विचार है?

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में आधारभूत संरचना के विकास को केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। इन क्षेत्रों की भौगोलिक, पर्यावरणीय और सामाजिक जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है। सरकार की भूमिका इस दिशा में निर्णायक होनी चाहिए। उसे दीर्घकालिक और समेकित योजना बनाकर कार्य करना चाहिए, जिसमें स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों का सृजन, शिक्षा व तकनीकी प्रशिक्षण, और सड़क, जल, बिजली, स्वास्थ्य व संचार जैसी आधारभूत सुविधाओं में निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इन पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियां ऐसी हैं कि बिना स्थानीय भागीदारी के विकास स्थायी नहीं हो सकता।

वहीं, निजी क्षेत्र को भी केवल लाभ के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक संवेदनशीलता को समझते हुए आगे आना चाहिए। उन्हें सतत विकास, नवाचार, और स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी के साथ योजनाओं को क्रियान्वित करना चाहिए। इससे न सिर्फ परियोजनाओं की गुणवत्ता और स्थायित्व बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय लोगों में भरोसा और जुड़ाव भी विकसित होगा। सरकार और निजी क्षेत्र, यदि एक साझेदार के रूप में कार्य करें, तो उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में न केवल संरचनात्मक विकास होगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी प्रभावी प्रगति सुनिश्चित की जा सकती है।

आपके साथ सैकड़ों लोग कार्यरत हैं, और आपने उत्तराखंड के युवाओं को विशेष रूप से प्राथमिकता दी है। यह विचार आपके मन में कैसे आया?

मैं उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से आता हूं, इसलिए मैं बखूबी समझता हूं कि पहाड़ी क्षेत्रों के युवाओं को किन संघर्षों और अवसरों की कमी का सामना करना पड़ता है। जब मैंने अपने सफर की शुरुआत की थी, तब न संसाधन थे, न मार्गदर्शन और न ही स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा मंच, जो हुनर को पहचान दिला सके। शायद यही अनुभव मेरे भीतर यह भावना पैदा करता है कि मैं ज्यादा से ज्यादा उत्तराखंड के युवाओं को अवसर दूं, ताकि वे अपने गृह राज्य से जुड़कर विकास की मुख्यधारा में आ सकें। मेरा मानना है कि प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, बस उसे अवसर, दिशा और विश्वास की जरूरत होती है।

मेरे लिए एसकेपी सिर्फ एक कंपनी नहीं, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये मैं स्थानीय युवाओं को रोजगार, प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ने का अवसर दे सकूं। जब मैं किसी युवा को हमारी टीम का हिस्सा बनते हुए आगे बढ़ते देखता हूं, तो मुझे लगता है जैसे मेरा सपना भी थोड़ा और आगे बढ़ गया। उत्तराखंड के युवाओं में सामर्थ्य, अनुशासन और मेहनत करने की विलक्षण क्षमता है। मुझे गर्व है कि एसकेपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड आज उन युवाओं के लिए एक मंच बन सका है, जो कभी सिर्फ सपने देखते थे और अब उन्हें साकार भी कर रहे हैं।

कृपया अपने जीवन के शुरुआती दिनों के बारे में बताएं, आपकी जन्मभूमि, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि और आपके जीवन के संघर्षों के बारे में?

मेरा जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के एक छोटे-से गांव बरतोली में हुआ। पहाड़ों के बीच बसा वह गांव प्राकृतिक रूप से सुंदर है, लेकिन सुविधाओं के लिहाज से बेहद सीमित। वहां बेसिक शिक्षा के लिए भी मीलों पैदल चलना पड़ता था। मैंने 10वीं से 12वीं तक की पढ़ाई के लिए रोजाना 12 किलोमीटर का सफर तय किया। न कोई विशेष सुविधा थी, न कोई असाधारण प्रतिभा, मैं बस एक साधारण विद्यार्थी था, लेकिन सपनों से भरा हुआ। गांव के अन्य युवाओं की तरह मेरा भी सपना था कि मैं सेना में जाकर देश सेवा करूं। लेकिन दुर्भाग्यवश, प्रयासों के बावजूद मेरा चयन नहीं हो पाया। देश सेवा का जज्बा मेरे अंदर था, इसलिए मैंने तय किया कि मैं अपने काम के जरिये देश के विकास में योगदान दूंगा।

शिक्षा पूरी करने के बाद, 15 अगस्त 1989 की रात 8:45 बजे, मैं वडोदरा पहुंचा। एक नये जीवन की शुरुआत करने के लिए। कुछ ही समय बाद मेरे भाई साहब, जो सेना में थे, उनका तबादला हो गया और मैं इस अनजान शहर में अकेला रह गया। शुरुआती दिनों में छोटे-मोटे काम किए, फिर ओएनजीसी फील्ड पार्टी में एक अस्थायी नौकरी मिली। इसी दौरान मैंने तकनीकी शिक्षा भी पूरी की।

1994 में पिताजी की इच्छा से मेरी शादी हुई। शादी के बाद जब उन्होंने चाहा कि मैं घर पर रहूं, तो मेरी पत्नी ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने न सिर्फ हौसला बढ़ाया, बल्कि मायके से मिले पैसे भी मुझे दिए ताकि मैं वडोदरा जाकर कुछ नया शुरू कर सकूं। यही मोड़ मेरी जिदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बन गया। वडोदरा लौटने के बाद मुझे नौकरी भी गंवानी पड़ी, लेकिन हार नहीं मानी। कई जगह कोशिश की, लेकिन कहीं काम नहीं मिला। ऐसे में, ओएनजीसी फील्ड पार्टी में मिले अनुभव के आधार पर, मैंने खुद छोटे-छोटे सर्वे कार्य करना शुरू किया। संसाधन नहीं थे, न जीपीएस, न गाड़ी, न आधुनिक उपकरण, लेकिन विश्वास था, उम्मीद थी, और मेहनत का जज्बा था। 26 जून 2000 को एसकेपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना हुई, जो केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि मेरे संघर्ष, परिश्रम और विश्वास की परिणति है।

हमारी पत्रिका का उद्देश्य है – ‘एक अभियान, पहाड़ों की ओर लौटने का।’ इस दिशा में आप उत्तराखंड के लिए क्या कार्य कर रहे हैं और भविष्य में आपकी क्या योजनाएं हैं?

मैं स्वयं उत्तराखंड की धरती से जुड़ा हुआ हूं और इसलिए इस अभियान का भाव मेरे हृदय के बहुत निकट है। मेरा मानना है कि ‘पहाड़ों की ओर लौटना’ केवल भौगोलिक वापसी नहीं है, बल्कि यह एक सोच है, अपने मूल से जुड़ने की, अपनी जड़ों को संवारने की, और पर्वतीय समाज को फिर से आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की। इसी सोच को आधार बनाकर हमने उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में युवाओं को रोजगार देने, तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध कराने और उन्हें स्थानीय संसाधनों के अनुरूप रोजगार सक्षम बनाने की दिशा में काम किया है। एसकेपी प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड में हम हमेशा यह प्रयास करते हैं कि हमारी हर परियोजना में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिले- चाहे वह इंजीनियरिंग हो, सुपरविजन या फील्ड लेवल का कोई भी कार्य।

हमारी आगामी योजनाओं में उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में स्थायी विकास के मॉडल पर कार्य करना शामिल है, जिसमें ग्रीन एनर्जी, जल प्रबंधन, लैंड मैपिंग और अर्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी परियोजनाएं प्रमुख हैं। इसके अलावा हम चाह रहे हैं कि स्थानीय तकनीकी युवाओं को एआई, जीआईएस, लिडार जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़कर उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्षम बनाया जाए। हमारा उद्देश्य यह है कि उत्तराखंड का युवा अपनी मिट्टी से जुड़कर भी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके। हम चाहते हैं कि उन्हें रोजगार के लिए मैदानों या महानगरों की ओर न जाना पड़े, बल्कि रोजगार और अवसर पहाड़ों तक पहुंचें। इस दिशा में हमारा हर प्रयास – केवल एक कंपनी का नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार पहाड़ी नागरिक की भूमिका निभाने का प्रयास है।

आज की युवा पीढ़ी, विशेष रूप से उत्तराखंड के युवाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तराखंड के युवाओं में वह जज्बा, अनुशासन और जमीनी समझ है, जो किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकता है। मैंने स्वयं एक छोटे से पहाड़ी गांव से चलकर यह अनुभव किया है कि जब आपके भीतर कुछ कर गुजरने की आग हो, तो संसाधनों की कमी भी आपको रोक नहीं सकती। मेरा संदेश यही होगा- अपने मूल्यों और जड़ों से कभी दूर मत होइए। आज की पीढ़ी के पास तकनीक, अवसर और वैश्विक सोच है, लेकिन साथ ही जरूरत है संकल्प, धैर्य और प्रतिबद्धता की। सिर्फ तेज भागने से मंजिल नहीं मिलती, उसकी दिशा भी सही होनी चाहिए। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। हर कदम पर संघर्ष होगा, ठोकरें लगेंगी, लेकिन वही आपको निखारेंगी। अपनी शिक्षा, कौशल और सोच को केवल नौकरी तक सीमित मत रखिए, नेतृत्व करना सीखिए, समाज के लिए सोचिए, और अपने गांव, अपने राज्य, अपने देश के लिए कुछ करने का सपना देखिए। उत्तराखंड का युवा सिर्फ पहाड़ों से नहीं, संभावनाओं से भी भरा हुआ है। आपको सिर्फ खुद पर विश्वास करने की ज़रूरत है। याद रखिए, अगर आप ठान लें, तो पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं।

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